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युएसए
का प्रवासी साहित्य
सड़क के उस
पार
रेखा द्विवेदी
वह
फुटपाथ पर खडी थी और उस सड़क को देख रही थी जो स्वर्ग और नर्क
के बीच थी। बस स्वर्ग और नर्क के बीच
सिर्फ़
एक सड़क का फासला था। स्वर्ग की तरफ नज़र डाली तो पाया खुली खुली
सड़क जिसमें,
दोनों तरफ पेड़ थे,
उस पर इक्के-दुक्के
सजे-धजे स्त्री पुरुश,
साफ सुथरे बच्चे धीरे धीरे चल रहे थे। नर्क
की तरफ नज़र डाली तो उस तरफ के फुटपाथ पर ढेरों गंदगी बदबू और
उस गंदगी में खेलते कोई पचास-साठ बच्चे जो लगभग देखने में एक
से लग रहे थे। उसने सोचा जब यह नर्क के लोग ही स्वर्ग की सफाई
कर उसे साफ सुथरा रखते हैं तो फिर एक जुट होकर नर्क की भी सफाई
क्यों नहीं कर डालते। अगर वह ऐसा कर डाले तो शायद नर्क न उतना
नर्क रहेगा न स्वर्ग उतना स्वर्ग रह जाएगा। उसे लगा संभवत: इन
जगहों को अलग अलग ऐसे ही रखा जाता होगा। फिर उसे अपनी सोंच पर
हँसी आ गयी। कितनी अच्छी व्यवस्था है नर्क के लोग स्वर्ग में
जाते हैं वहाँ की व्यवस्था चलाये रखने में मदद करते हैं और
बदले में स्वर्ग के लोग इन्हें कुछ पैसे और कभी-कभार
कपड़े व भोजन भी देते हैं। सेल्फ सस्टेंड सिस्टम। अगर
''यमराज''
को या फिर इन्द्र देवता को यह सिस्टम समझ
में आ जाता तो वह बेचारे व्यर्थ ही इतना परिश्रम करते। बेकार
ही नर्क के लोगों
को प्रताड़ित करने के लिए बड़े-बड़े तेल के कड़ाहे में डालते (तेल
और एनर्जी दोनों बचते) या फिर आग में झोंकतें। (यह विचार एक
कलेन्डर में देखी तस्वीरों के आधार पर है)। एक दूसरे के सपोर्ट
सिस्टम के आधार पर सब चलता रहता और उन्हें परिश्रम भी न करना
पड़ता। आराम से एयर कंडीशन्ड
ऑफिस में बैठते। उस समय की सरकार को भी नर्क के लिए यमराज व
स्वर्ग के लिए इन्द्र की व्यवस्था न करनी पड़ती। बस एक ही पोस्ट
से काम चल जाता। उस व्यक्ति को भी एलेक्षन का वक्त छोड बाकी
समय स्वर्ग व नर्क में दोनों की ही चिंता न करनी पड़ती। न नर्क
वालों को सताने के लिए मेहनत करनी पड़ती न स्वर्ग वालों का
मनोरंजन करने के लिए तरह तरह के उपाय करने पड़ते। इन्द्र को
क्या बस मेनकायें ही तो चाहिए होती थी। वह भी नर्क से आ जाती।
स्वर्ग वाले नर्क वालों की व्यवस्था कर ही लेते।
वह आई तो विदेश
से थी भले ही सूरत देशी
थी पर देश
पहली बार देखा था। देश
को समझने बूझने आई थी। शायद स्वयं को ही कहीं खोजने आई थी अपनी
जड़ों को खोजने के बहाने। अत:
B-5
और वसन्त
कुँज
में घर ले लिया था। जो स्वर्ग में था। अब उसे यह तो न पता था
कि उसकी जड़ें स्वर्ग में थी या नर्क में पर अपनी आर्थिक
स्थितियों के अनुसार घर स्वर्ग में ही लिया था। रात को सोने
योग्य व्यवस्था किसी परिचित ने ही कर दी थी अत: जेटलैग्ड होने
के बावजूद वह सो गयी थी। दरअसल
20
घंटों की फ्लाइट में उसने धरती छोड़ और कुछ
भी नहीं चाहा था। उस धरती पर यदि एक मात्र बिस्तर मिल जाय तो
फिर और क्या चाहिए। शायद जो धरती पर होते हैं वह धरती का सुख
नहीं जानते, वह उड़ना चाहते हैं।
सुबह उसकी नींद घर की घंटी बजने पर खुली थी। उसने उठकर दरवाज़ा
खोला ही था कि सामने दो अप्सराएं खड़ी थी। उसे लगा वह सचमुच
स्वर्ग में हैं।
पूछने
पर उनमें से एक बोली मेरा नाम मामुनी है और दूसरी ने अपना नाम
सीमा बतलाया,
साथ ही यह जोड़ दिया कि भइया ने भेजा है आपके घर काम करने।
उसने पूछा,
''दोनों को''
उनमें
से मामुनी बोली,
''नहीं मुझे भेजा है,
यह मेरी सहेली है''
वह चूंकि नींद में थी अत: बाली,
भइया ने तुम्हें यहाँ नाच करने भेजा है?
उनमें से एक हँस दी थी,,
बोली ''नाच करने
नहीं,, काम करने भेजा हैं।''
प्रवासिनी ने सोंचा अप्सरायें तो नाचने आती
थी। यहाँ काम करना क्या? वहाँ
यूएस
में तो न कोई नाचने आता है,
न काम करने।
ख़ुद
तो वह बड़े-बड़े सूटकेस लाई थी जिनमें अपना एप्रेन,
चापिंग बोर्ड,,
चाकू वगैरह लेकर आई थी सोचा था सारा काम
ख़ुद
करेगी। प्रवासिनी ने पूछा था,
''तुम कहाँ रहती हो?
उनमें से एक बोली,
जो सच्ची और ईमानदारी लग रही थी,
मैं सड़क के उस पार रहती हूँ।''
प्रवासिनी ने कहा,
''उस पार मतलब नर्क में।''
उस लड़की के चेहरे पर न समझने का भाव आया
था। तभ प्रवासिनी ने अपनी जीभ काट ली थी यह सोचकर कि गलती हो
गई।
घर में कुछ सामान तो था नहीं अत: प्रवासिनी ने पैसे दिये थे और
फिर सामान की लिस्ट बनाकर अप्सराओं को दी वह दोनों जाकर सामान
ले आये। घर की सफाई से लेकर चाय खाने सब का कार्यक्रम चल निकला
था।
मुश्किल
से
16
साल की उस लड़की ने पूरा अच्छा भला खाना पका
दिया था।
प्रवासिनी ने पूछा,
''तुमने खाना पकाना कहाँ सीखा''?
वो बोली,
''होटल में काम किया ''और
फिर उसने जोड़ा, ''मैं
अँग्रेज़ी
भी बोल लेती हूँ।''
प्रवासिनी ने कहा,
''अँग्रेज़ी
कैसे जानती हो''।
मानुनी बोली, ''एक रषियन के यहाँ
काम किया था। तभी सीख गई।''
ओह,
''तो तुम स्वर्ग वालों की भाषा भी सीख गयी
हो।'' उस अप्सरा ने उसे बड़े आष्चर्य
से देखा था कि यह कह क्या रही है। प्रवासिनी भी उतनी ही
कन्फ्यूज्ड थी कि अप्सरायें तो स्वर्ग में होती थी पर यह तो
नर्क से आई है। स्वर्ग की जो अप्सराएं हैं वह तो कभी इतनी
सुंदर नहीं दिखती क्योंकि उनमें एक बनावटीपन और अहंकार होता है
पर यह नर्क की अप्सरा तो धान के खेत में खिले कुमुदिनी के फूल
जैसी लगी उसे। फिर ऊपर से उसमें प्यार की भावना तो थी ही खाना
पकाया और घर के काम भी अच्छी तरह से किये स्वर्ग की अप्सराएं
तो कोई काम करना ही नहीं जानती। अपने काम भी स्वयं नहीं करती
तो दूसरों के काम क्या करेगी। नाचना,
शायद वह नाचती भी नहीं जानती है। वह कला भी
नहीं जानती। शाम को जब वह जाने को हुई तो बोली, ''एक
काजग पर लिख कर दे दीजिए कि मैं आपके यहाँ काम करती हूँ।''
प्रवासिनी के चेहरे पर आष्चर्य की रेखाएं खिंच गई उसने प्रष्न
सूचक दृष्टि से देखते हुए पूछा,
''फिर तुम सुबह यहाँ कैसे आई''?
मामुनी
बोली,,
''भइया अन्दर तक छोड़ गए थे।''
प्रवासिनी
''ओह
तो तुम्हें अन्दर आने के लिए पासपोर्ट और वीजा की जरूरत पड़ती
है।
मामुनी,
''बोली मैं समझा नहीं।''
उसके चेहरे पर न समझने के भाव आये।
प्रवासिनी ने पूछा,
''तुम कहाँ की रहने वाली हो।''
यह प्रष्न उसने ने दूसरी बार पूछा था।
वह बोली,
''बंगाली हूँ। मैं माल्दा की रहनेवाली हूँ
लेकिन यहाँ की पुलिस सब बंगालियों को बांग्लादेशी
समझती है। हम लोग डरते हैं। कहीं रात को पुलिस उठा न ले जाये।''
प्रवासिनी बोली,
''अनऍथराइज्ड़ इमीग्रेंट्स यानी कि
बांग्लादेश
से भारत तो आ जाते हैं पर सड़क के उस पार से इस पार आने के लिए
वीसा चाहिए।
उसने अपने आप से कहा,
''नर्क से स्वर्ग में इंट्री। वैसे ही जैसे
अमरीका में हिस्पैनिक्स हैं।
उसके पास कोई च्वाइस नहीं थी अत: डायरी से एक कागज़ निकाल कर
प्रवासिनी ने लिखा
''मामुनी
नाम की लड़की क्र्वाटर न0
410
में काम करती है। इसे अन्दर आने की इज़ाजत दी जाये।''
प्रवासिनी ने कहा,
''लो अपना वीसा।''
फिर दोबारा उसके हाथ से काजग लेते हुए कहा
कि लाओ नीचे दस्तख़त कर दूँ। उसने दस्तख़त किये।
अगली सुबह वह फिर आई थी। कुछ सामान जो अब तक घर पर नहीं था वह
लाई थी।
प्रवासिनी ने देखा था कि यह लड़की खुश
रहती थी। घर में होती तो लगता जैसे चारों तरफ
ज़िंदगी
बिखर जाती। वह दौड़कर दरवाज़ा भी खोलती,
खाना भी पकाती,
जब मौका मिलता तो गाने सुनती और साथ ही नाच भी लेती। उसे जो
देखता खुश
होता,
तारीफ करता। सारे स्वर्ग के रहने वाले उसकी
तारीफ करते न थकते। भले रंग सांवला व चेहरा गोल था पर वह
दिल्ली वालों की तरह अपने सीधे बाल खुले रखती व अच्छे कपड़े
पहनती। रोज़ शाम को काम खत्म करके नहाती व तैयार होती तब अपने
घर जाती।
एक दिन सारे काम के बीच प्रवासिनी से उसने कहा।
''मैं
पूजा में अपने गाँव जाऊँगी।
प्रवासिनी ने पूछा,
''कहाँ है तुम्हारा गाँव?''
वह बोली,
''बताया तो था 'माल्दा'
में है आप भूल गई।''
प्रवासिनी बोली ''पूजा
तो अक्टूबर में होती है। अभी तो छह महीने हैं।''
वह बोली,
''हाँ मैंने सोंचा आपको पहले ही बतला दूँ।''
वह बोली,
''ठीक है चले जाना''
प्रवासिनी ने पूछा,
''वहाँ कौन है?''
वह बोली,,
''तीन साल पहले तो हम यहाँ आए हैं।''
हमारे बाबा (पिता) मर गये थे हार्टअटैक से
तभी हमारी माँ हमें यहाँ ले आई। तब से हम यहीं काम करते हैं।
घर पर नाना-नानी, मामा-मामी,
वही हैं। प्रवासिनी ने पूछा, ''तुम्हें
कहाँ अच्छा लगता है यह दिल्ली या गाँव।''
उसने आष्चर्य से इस तरह देखा जैसे कहाँ हो
यह भी कोई पूछने की बात है। गाँव अच्छा लगता है।
प्रवासिनी ने पूछा क्यों?
वह बोली,,
क्यों क्या?
यहाँ तो सब हमको बाँग्लादेशी
समझते हैं। हमारे गाँव में हमें कोई बाँग्लादेशी
नहीं समझता है। हम वहाँ पुलिस से थोड़े ही डरते हैं। (उसके
चेहरे पर अपने ही देश
में अपनी पहचान खोने का दर्द उभर आया था।) उनके बीच वार्तालाप
चल ही रहा था कि कि फिर
दरवाज़े
क़ी घंटी बजी। हमेषा की तरह दौड़कर दरवाज़ा मामुनी ने खोला था। पर
दरवाज़ा खोलकर लौट आई थी। बोली,
देखो, एक औरत
बाहर खड़ी है। प्रवासिनी ने बाहर झाँककर देखा था,
एक और सजी-धजी,,
दुबली-पतली लड़की सी औरत बाहर खड़ी थी। उससे थोड़ा हटकर आदमी बाहर
खड़ा था। प्रवासिनी ने पूछा, ''तुम
कौन हो? उसने
प्रश्नसूचक
दृष्टि से देखा। वह बोली,
''मैं मालिश
करने वाली हूँ। इससे पहले जो इस घर में रहते थे उनकी भी मालिश
करती थी। आप मालिश
करवा लीजिए।''
प्रवासिनी ने सोचा यह तो सचमुच स्वर्ग है।
यहाँ इच्छा करो और पूरी हो जाती है। वह टखनों में दर्द की वजह
से कल ही तो मालिश
करवाने के बारे में सोच रही थी।
प्रवासिनी कुछ कहे उसके पहले वह घर के अंदर थी और रसोई में
घुसकर मामुनी की मदद से सरसों के तेल में लहसुन चला रही थी। जब
उसने मालिश
शुरू की तो बार बार बोले जा रही थी,
''आपको पता है मेरी उम्र 28
साल है पर मेरे पाँच बच्चे हैं। चार
बेटियाँ के बाद अब जाकर बेटा हुआ है। मेरी सास को तो बेटा ही
चाहिए था।
प्रवासिनी बोली,,
''अरे आजकल तो 22
साल में शादी होती है और तुम्हारे पाँच
बच्चे। दिमाग खराब है तुम्हारा।''
फिर उसने सोचा यह नर्क वालों को हर काम की जल्दी रहती है। पर
प्रष्न उसने पूछाा, ''क्या तुम
आदमियों को भी मालिश
कर देती हो।''
वह बोली,, ''हाँ,
कच्छे के अंदर नहीं करती बाकी सब जगह कर
देती हूँ।'' प्रवासिनी बोली
''अच्छा चुप रहो''।
पर उसने सोचा यह अपसराएँ नाचती नहीं है पर थोड़े से पैसों के
लिए मालिश
भी कर देती है। इस तरह उसने पाया,
सुबह कूड़े वाला,
अखवार वाला, दूध वाला,
सड़क साफ करने वाला,
यहाँ तक की गेट पर खड़े दरबान सब नर्क के वाशिन्दे
हैं और स्वर्ग को स्वर्ग बनाये रखने के लिए काम करते हैं और उस
प्रक्रिया में स्वयं भी जिंदा रहते हैं। यूँ दोनों की दुनिया
इतनी अलग है कि लगता ही नहीं वह एक ही ग्रह के रहने वाले हैं।
भले ही दोनों के बीच
सिर्फ़
एक सड़क है पर उन्हें इधर आने के लिए पासपोर्ट,
वीसा चाहिए होता है। इधर आने वाले उधर जाना
नहीं चाहते। बस कारों में बैठकर उस गन्दगी को अनदेखा कर निकल
जाते हैं। उन्हें यह बात क्यों समझ नहीं आती कि अनदेखा करने से
यह सच तो नहीं बदल जाता कि डेंगू के मच्छर और प्लेग के कीटाणु
स्वर्ग और नर्क दोनों जगह बिना वीजा व पासपोर्ट के जाएंगें।
सिर्फ़
अपना घर या मोहल्ला साफ रखने से तो कोई बच नहीं जाएगा।
प्रवासिनी ने सोचा कि वह तो इंडिया अपनी जड़ें खोजने आई थी,
और अपनी आत्मा खोजने के लिए आई थी उसे यह
समझ में नहीं आ रहा था कि वहा कहाँ अपनी आत्मा खोजे और कहाँ
अपनी जड़ें खोजें स्वर्ग में या नर्क में। आजकल वह जहाँ रहती है
उसे स्वर्ग कहा जा सकता है परन्तु उसके पुरखे तो बिहार से
मज़दूर बन कर ही गये थे। तो क्या पता उसकी जड़े इसी नर्क में
हों।
वह सोच में डूबी थी तभी मामूनी चाय बनाकर ले आई थी। प्रवासिनी
को लगा मामूनी कुछ कहना चाहती है। उसने कहा,
''क्या बात है?''
मामूनी बोली, ''आमिर
के साथ बाहर जाना है।'' उसे कुछ समझ
में नहीं आया। उसने मामूनी को एक कन्फ्यूज्ड़ लुक दिया। मामूनी
बोली, ''आप भी,,
आमीर मेरा ब्वाय फ्रेंड है।''
प्रवासिनी बोली,
''पर मेरा ख्याल है तुम तो हिन्दू हो।''
वह बोली,
''है तो क्या''
प्रवासिनी बोली,
''जाओ''
वह बोली,
''नहाकर जाऊँगी।''
मामूनी तैयार होकर नहाकर चली गई। प्रवासिनी सोचती रही,
रीटा बंगाली,
उसका पति उड़िया, विमला बंगाली उसका
पति बिहारी और मामूनी का ब्वाय फ्रेंड मुसलमान। यहाँ तो पूरा
साम्प्रदायिक सद्भाव है। लोग कहते हैं यही सद्भाव आप स्वर्ग
में भी देख सकते हैं। यह बात अलग है कि स्वर्ग और नर्क वालों
के बीच शादी-विवाह जैसे संबंध बनते नहीं दिखते परन्तु संबंध तो
बनते हैं।
नर्क वाले स्वर्ग वालों के लिए काम करते रहते हैं और उन्हें
किसी काम के लायक नहीं छोड़ते। न वह अपना खाना स्वयं पका सकते
हैं,
न घर साफ कर सकते हैं,
न कूड़ा फेंक सकते हैं,
और न कार साफ कर सकते हैं। हाँ,
अपना मोटापा कम करने के लिए भी या तो नर्क वालों से मालिश
करवाते हैं या पार्क में घूमते हैं। अपनी बरबादी के बदले अपनी
जेब हल्की करते हैं। नर्क वाले मेहनत मशक्कत करके भी कम खाते
हैं और गम खाते हैं बिना अलग से पार्क में टहले दुबले पतले
रहते हैं ।
तभी घंटी बजी थी और और उसकी
सोच
का क्रम टूट गया था। उसने सुना दो बार जल्दी-जल्दी
घंटी बजी थी कि उसने सोंचा कि मामूनी होगी। मामुनी ही थी।
प्रवासिनी ने कहा,
''मामुनी जरा सामान की लिस्ट बनाओं,
मैं नहाकर आती हूँ।''
मामुनी बोली, ''मुझे
तो लिखना नहीं आता।'' प्रवासिनी
अवाक होकर मामूनी की ओर देखती रह गई। वह सोचती है इतनी स्मार्ट
लड़की जो
अँग्रेज़ी
समझ लेती है,
पर लिख नहीं सकती। प्रवासिनी ने स्वयं कागज
पेन लिया लिस्ट में सबसे ऊपर लिखा किताबें,
कलम, कॉपी फिर
उसके बाद मामूनी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
रेखा
द्विवेदी
4301,
केंटवरी ड्राइव,
बेथेस्डा,
मेरी लैंड,
यू0एस0-
20814
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