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युएसए
का प्रवासी साहित्य
कर्ज़
प्रतिभा
सक्सेना
उस दिन मैं मर गया होता तो आज को तुम विधवा होतीं । ये बच्चे
अनाथ
...।'
'बस
अब कुछ मत कहना,.' हाथ से बरजते हुये
रमना बीच में बोल पड़ी ,' ये तो अपनी-अपनी
क़िस्मत है ।'
'क़िस्मत
?अरे, मेरी मौत
उसने अपने सिर ले ली ।अस्पताल में कितनी पीड़ा झेल कर मरा है
वह।'
'खर्चा
तो सारा तुम करते रहे !'
'क्या
पैसा ही सब कुछ होता है ? कितनी भग-दौड़,
दिनरात की सेवा उन लोगों ने की ! मानसिक कष्ट
उन लोगों ने झेला और ज़िन्दगी भर झेलेंगे । अरे,
मैं तो आधा हिस्सा ही देता हूँ । अगर तुम पर यह मुसीबत पड़ी
होती तो...कैसे क्या होता सोच कर ही दहल जाता हूँ ?'
'बस,
चुप करो ! अशुभ बातें मुँह से मत निकालो ।'
'तुम्हें
सुनना भी सहन नहीं होता ,और वह जो झेल
रही है, मेरी व़जह से ! '
'किसी
की व़जह से कोई नहीं मरता । जिसकी लिखी होती है उसी की आती है
।'
'यह
तुम्हें लगता है न ! उसके साथ कैसे क्या हुआ मुझे मालूम है ।
मैंने जो देखा है, जो बीती है मुझ पर
वह तुम नहीं जानतीं और जान सकती भी नहीं । तुम वहाँ होतीं तब
जानतीं । मैं जो कर रहा हूँ वह कितने साल ?
उसके लड़के कमाने लगेगे तब क्या वह कुछ लेंगे
हमसे १'
प्रकाश के मुँह से अनायास निकलता चला जा रहा था,
'वह
तो अभी भी कहती है - भाई साहब दुकान डलवा दीजिये,
लड़का बैठेगा पर मैं सम्हालूँगी । आपने बहुत
किया पर आपकी अपनी गिरस्थी है । मैं बहिन के सामने सिर नहीं
उठा पाती ।'
'तो
दुकान डालने में क्या हर्ज़ ?'
'उसके
सपने थे एक बेटे को डाक्टर एक को वकील बनायेगा,
मैं कम से कम उन्हें पढ़ने-लिखने में मदद कर
सकता हूँ । आगे वो जो करें वह उनकी क़िस्मत! उस दुखी विधवा को
देख मुझे तुम्हारा ध्यान आता है, वह
दुख मुझसे सहन नहीं होता ।'
'मत
कहो । आगे से कभी मेरे लिये ये शब्द मत बोलना ।'
'उन
बच्चों के चेहरे देखे हैं तुमने ?
कितने खुश थे पहले । अब कैसे हो गये हैं-क्यों ?
कभी समझने की कोशिश की तुमने ? नहीं न
? अपने बच्चे होते इस हालत मैं तब ..
..।'
कानों पर हाथ रख लिये रमना ने,
चीख उठी,' बस करो ! नहीं सुना जाता
मुझसे। मेरे बच्चों के लिये मत कहो ऐसे !'
'ओह
,सुन कर मन इतना इतना खराब हो जाता है।
अगर ..ख़ैर जाने दो ।....और वह - जो दूसरे का दुर्भाग्य
ज़िंदगी भर झेलेगी ? उसका कर्ज़दार तो
मैं हूँ ।'
रमना सन्न बैठी है ।
'तुमने
वह नहीं देखा जो मैंने देखा है ।अपनी मौत देखी मैंने ,तुम्हें
.बच्चों को कैसै-कैसे देखा- क्या-क्या सुना...कैसी गुज़री मेरे
ऊपर , तुम कुछ नहीं जानतीं ।'
अवसन्न-सी रमना को देख प्रकाश चुप हो गया ।
अब भी,
चन्दू की मृत्यु की चर्चा सुनता है, तो
सिर घूमने लगता है - कानों में आवाज़ें आने लगती हैं।
तमाम लोग इकट्ठा हैं। हाँ,
पुलिसवाले,
अखबारवाले और जाने कौन-कौन । खोज-बीन चल रही है।
लोग कह रहे हैं 'प्रकाश
वर्मा मर गया ।...चेहर पहचान में नहीं आ रहा ।... 'च्च्चच्
चच्च' हो रही हं ।.....,उधर
देखो पिछली सीटवाला आदमी हिल रहा है... लगता है होश आ गया
।...क्या नाम है ?...ये जाकेट में पर्स
और कुछ कागज़-पत्तर निकले हैं ।हाँ,चन्द्रभान
है...। चन्द्रभान होश में आ गया है ।...और प्रकाश ?
बुरी तरह घायल - शरीर की दशा देखो ज़रा ,,
उफ़ देखा नहीं जात..पता नहीं बचेगा या नहीं
,होश ही नहीं है ।... जाकेट में रखे
पर्स से और कागजों से पहचान हो गई है ।
'
प्रकाश' नाम सुनकर
कुछ-कुछ होने लगता है ,अंदर कुछ हिल
जाता है ।
क्षत-विक्षत
,बेहोश
और मृत ! कितने नाम लिये जा रहे हैं पर एक यही नाम जाकर
बार-बार मन से टकराता है, कानों में
बार-बार गूँजता है ।' प्रकाश'
,' चन्द्रभान ' कितने
जाने-पहचाने नाम । कौन हैं ये ? मैं
कौन हूँ ?
सब कह रहे हैं मैं चन्द्रभान हूँ - हो सकता हैं । भारी चोट लगी
है सिर पर अभी तक चक्कर खा रहा है । कैसा अजीब अजीब लग रहा है
। दिमाग़ मे कुछ आता है,
फिर एकदम गायब हो जाता है ।
बोलने की कोशिश करता है गले में आवाज़ नहीं,
जीभ हिलती नहीं।
आवाज़ें ही आवाज़ें । बस सुन रहा है ।
'हाँ
होश आ गया -चन्द्रभान को ...बस में उछल गया ऊपर सिर टकराया
था..., पाँव पर कुछ भारी चीज़ गिरी है
।उँगली से खून बह रहा है बिल्कुल पिच गई ।'
वह अपना पाँव देखने की,
हिलाने की कोशिश करता है । आँखें खुलती नहीं,
शरीर पर वश नहीं।
सारे इन्द्रिय-बोध कुंठित हो गये हैं,
शरीर विल्कुल सुन्न । कुछ जानने-समझने में
सामर्थ्य चुक गई-सी !
आज भी प्रकाश की नज़र अपने पाँव पर जाती है ।उसे भ्रम होने
लगता है -यह उँगली किसकी है -पिची हुई उँगली चन्द्र भान की थी
?और फिर मैं..?
याद कर उसी मनस्थित में पहुँच जाता है ।भ्रम होने लगता मैं कौन
हूँ?
प्रकाश ?चन्द्रभान
?
सिर घूमने लगता है सब कुछ भूल जाता है सोचने -समझने की क्षमता
ग़ायब हो जाती है । मैं कौन हूँ
?
पहचानने की कोशिश करता है। चारों ओर देखता है
। कुछ अपना नहीं लगता । घर, पत्नी
? ध्यान से देखता है सबको । सब
अपरिचित-से ।
उस काल उसके भीतर का
'मैं'
कुछ नहीं रहता, कहीं
नहीं रहता ।जैसे विलीन हो गया हो - न वर्तमान,
न अतीत -कहाँ होता है कुछ पता नहीं ।
समय का कौन सा विभाग है जो सब निगल लेता है । जहाँ जाकर
बार-बार फँस जाता है प्रकाश
?
***
बड़ी आसानी से टिकट मिल गया था उस दिन। बस भरने में भी अधिक
समय नहीं लगा । अभी तो घाटी में काफ़ी दूर चलेगी । पहाड़ों के
पास आते ही ठंडक बढ़ने लगेगी । थोड़ी चाय अभी थर्मस में है ।
पी ली जाय । प्रकाश उठा और टँगा हुआ थर्मस उतारने पीछे घूमा
,बस के झटकों में बैलेन्स बना रहा था कि पीछे
से आवाज़ आई -
'अरे,
प्रकाश !तुम भी चल रहे हो ?'
पीछे घूम कर देखा उसने -
'वाह
चन्दू, तुम कहाँ से टपक पड़े ?'
उसका बचपन का दोस्त चन्द्रभान। चलो,
रास्ता अच्छा कटेगा ।
चन्दू उठ कर चला आया ।
'तुम
कब आये ?मैंने देखा नहीं ।'
'बस
भरनेवाली थी ,वो तो ये कहो सीट मिल गई
।पीछे ही सही , बैठने को तो है ।'
प्रकाश की सीट पर दोनों आगे पीछे होकर बैठ गये ।
'कितनी
अच्छी जगह पाये हो ।तीनों तरफ का व्यू बस तुम्हारा ही है।
प्रकाश को आगे ड्राइवर के साइड में सीट मिली थी ।सामने का पूरा
व्यू ।साइड के शीशे भी अपने।
पहाड़ों पर पहली बार जा रहा था चन्दू । दृष्य देखने का लोभ
प्रकाश की सीट पर खींच लाया था।
'इधऱ
बैठना है ?'
'नेकी
और पूछपूछ ।'
मेरा तो महीने में एक चक्कर लग ही जाता है इसलिये कुछ नया नहीं
लगता । कल रात जगना पड़ा,
आँखें बंद हुई जा रही हैं ।
'तो
तू चला जा मेरी सीट पे ।आराम से सोइयो ।'
'ठीक
है ।तू चाहे तो खुशी से बैठ यहाँ । मैं उधऱ सो लूँगा ।पहली बार
जा रहे हो ऊपर ?'
'हाँ
,नीचे तो हमेशा घूमता रहा हूँ । ऊपर
जाने का मौका नहीं लगा ।एक बार हो आऊँ फिर बीवी-बच्चों को भी
घुमा दूँगा ।'
'तो
मैं जा रहा हूँ तुम्हारी जगह ।पर इधर वो शीशे की सँध से बला की
ठंडी हवा आयेगी फिर मत कहना कि...।'
'नहीं
कहूँगा, नहीं कहूँगा तेरी सीट की बला
मेरे सिर ! बस और कुछ ?
पहाड़ों की परिक्रमा करती बस आगे बढने लगी थी । हरियाली से
भरी घाटियाँ और ढलानो से ऊपर उठते पेड़,
जिन पर लिपटी लतायें कहीं कहीं माला जैसी लटक रही थीं । कहीं
ऊपर से गिरते झरने, कहीँ छोटे छोटे
गाँव ।
सामने की हवा खिड़की की सँधों से आ रही थी । प्रकाश को झुरझुरी
हो आई ।
'
सामने बैठोगे तो रात पड़ते ही ठिठुर जाओगे ।'
'जाकेट
पहन लूँगा । तुम फ़िकर मत करो ।'
पहाड़ों पर पहली बार जा रहा था वह। दृष्य देखने का लोभ था
प्रकाश की सीट से सब कुछ दखाई देता है न । प्रकाश उठ कर चल
दिया ।फिर घूम कर बोला-
अरे,
मेरी जाकेट सीट पर रह गई देखना ,मोटी
है पहन लेना नहीं तो कुल्फ़ी जम जायेगी ।'
'कोई
बात नहीं मेरी भी उधर है ,ऐसे ही उठ कर
चला आया था । पहन लेना ज़रुरत हो तो ।'
'ठीक
है, मुझे क्या ?फिर
जैसा हो तुम्हीं निपटना, मुझे दोष मत
देना ?
'कह
दिया न तेरी बला मेरे सिर अब तू जा,
निश्चिंत सो ।!'
और मेरी बला उसने अपने सिर ले ली । उसे क्या पता मेरी सीट पर
क्या बला टूटने वाली है।उसने तो भावी जीवन के कितने अरमान
सँजोये थे ।सब बताता था मुझे । वे सारी बातें मुझे याद हैं ।पर
अचानक सब बदल गया । मेरी जगह वह चला गया ।
***
बड़ा मुश्किल लगता है,
रमना को । कभी-कभी तो असहनीय हो उठता है । प्रकाश से नहीं कहे
तो किससे कहे ?
रहा नहीं गया तो बोली -
'जाने
कैसी छाया-सी छाई गई है हमारे घर पर ।'
'छाया
ही छाई है न ? वज्रपात तो नहीं हुआ
? किस पर गिरनी थी और किसने झेल ली ।
जिस पर गिरी उस की सोचो ।'
क्यों कहते हैं ऐसा
?
क्यों कहता है प्रकाश
?
वज्रपात हुआ था उस दिन । हुआ था उसी जगह.... पर किस टूटना था
किस पर टूट पड़ा । ...
चन्दू ने कहा था-
'तेरी
बला मेरे सिर । जा, निश्चिंत सो जा ।'
और वह निश्चन्त सो गया था ।
चन्दू की सीट कोज़ी लगी थी,
सामने वाली ठण्डी हवा की सिहरन यहाँ नहीं थी ।
पहाड़ों पर बस चक्कर खाती घूम-घूम कर चल रही थी ।कभी खाई इधऱ,
पहाड़ उधऱ, कभी पहाड़
इधऱ खाई उधऱ ।
नीचे घरघराती बहती नदियाँ काफ़ी दूर साथ चल कर ओझल हो जाती थीं
। जलधार धूप में चमकती कभी पथरीली सतह पर फुहारे बिखेरती ।
चन्दू कभी सामने शीशे से देखता फिर सिर घुमा कर साइड से दृष्य
को पकड़ने की कोशिश करता । कितने सुन्दर दृष्य हैं अबकी बार
बसन्ती और बच्चों को पहाड़ की सैर करा दूँगा,'
चन्दू बोला था ।
जाने कब प्रकाश की आँख लग गई । पता नहीं कितनी देर सोया ।
अचानक बड़े ज़ोर के झटके से उछल गया । प्रकाश का सिर छत से जा
टकराया । लोग ऊपर-नीचे झोंके खाते चिल्ला रहे थे। ऊपर रखा
सामान लोगों के ऊपर आ-आ कर गिर रहा था । चारों ओर -चीख पुकार ।
प्रकाश गिरा तो अपने को सम्हाल नहीं पाया,
एकदम वहीं गिर पड़ा । एक हाथ इधर दूसरा नीचे
दबा, पाँव बीच के रास्ते में फैले
हुये।फिर क्या हुआ कुछ नहीं मालूम। चेत आया तो सीट पर टिका था
। किसी ने साध कर सीट पर कर दिया था। '
क्या हुआ' -प्रकाश के मुँह से निकला
?
धीरे-धीरे समझ पाया ।
उनकी बस की टक्कर हो गई थी, दूसरी
बस तो झटका खाकर नीचे खड्ड में जा गिरी।
ज़रा स्थिर हुआ तो देखा चारों ओर ख़ून ही ख़ून।साइड का शीशा
टूट कर यात्रियों के खुले अंगों हाथों और चेहरों को घायल कर
गया था । कुछ लोग बेहोश पड़े थे चीखें ओर कराहें चारों ओर गूँज
रही थीं । चन्दू कहाँ है?
कुछ पता नहीं । छत की टक्कर से सिर में घुमनी आ रही हैं ।
पाँवों पर कोई भारी चीज़ ऊपर से आ गिरी थी कितना दर्द ।पाँव
हिलाते नहीं पाता कहीं हड्डी तो नहीं टूट गई
?
पता नहीं चन्दू कैसा है ! इतनी बुरी टक्कर थी -आगे की सीटों की
हालत सबसे खराब है । पता नहीं कितने बचेंगे ! इधर ये 6-7 बुरी
तरह घायल हैं । कुछ थोड़ा होश में हैं ।बाकी तो..।'
आगे के कुछ लोग बुरी तरह घायल,
उनका बचना मुश्किल है । इस तरफ़ पाँच-छः तो गये !
और चन्दू आगे बैठा था । चन्दू को पुकारना चाहता है ।मुँह से
आवाज़ नहीं निकलती । सिर घूम रहा है । कैसा-कैसा लग रहा है ।
चन्दू का बार-बार ध्यान आ रहा है । कैसा है वह
?
जो लोग सामने बैठे थे,
उनके बारे में जानना चाहता है । पर मुँह से आवाज़ नहीं निकल
रही ।.बार बार सुन रहा है आगेवालों को सबसे ज़्यादा चोट आई
-बहुत बुरा हुआ उनके साथ ।
अब भी इस कटी उँगली को देखते ही प्रकाश को याद आ जाता है
। चंदू की उँगली है सब कह रहे थे,
और जो शरीर खून से लथपथ निश्चेष्ट पड़ा था वह मेरा । कभी-कभी
सचमुच लगने लगता है प्रकाश मर गया था उस दिन। यह जो ज़िन्दा है
चन्द्रभान है, चन्दू !
उसे लगता है वह न इधर में है न उधर में ।
***
विवाह के बाद चन्दू मिलता था तो भावी जीवन की योजनायें बताता
था । उसकी शादी प्रकाश से दो साल पहले हुई थी । दो बच्चे हो
गये थे -प्रकाश के बच्चों से बड़े । साधारण क्लर्क की चाहना थी
एक डाक्टर बने
और दूसरा बेटा इंजीनियर,
सी.ए. या औऱ कुछ। कोई बढ़िया लाइन । सब को पढा-लिखा कर...औरे
क्या क्या .कहता था ?..एकदम उतर गया
उसके दिमाग से । क्या सोच रहा था याद नहीं आ रहा ।
सिर मे ऐसी घुमनी आई
,
सब ओझल हो गया ।
बार बार सुनाई देता है प्रकाश वर्मा की मृत्यु हो गई ।जाकेट की
जेब से पर्स निकला उसी से पहचान हो रही है ।पत्नी और बच्चों की
फ़ोटो देख कर लोग
'चच्च्चच'
कर रहे हैं ।यह स्त्री विधवा हो गई,
बेचारी को पता भी नहीं । बच्चे अनाथ हो गये । अरे ,कोई
घर पर ख़बर भेजो । अब तो लाश ही पहुँचेगी । उसे अपनी विधवा
पत्नी और अनाथ बच्चे दिखाई देने लगते हैं ये सब क्या कह रहे
हैं । प्रकाश मर गया, ओफ़ सिर घूम रहा
है । मैं मर गया हूँ, मरने के बाद ऐसा ही लगता है क्या
? बहता खून शीशों से बिंधा घायल विरूपित चेहरा,
यह मैं हूँ ?
सब कह रहे हैं प्रकाश का शरीर है - कुछ बचा ही नहीं इसमें
।
कितने लोग इकट्ठा हैं - सब कह रहे हैं प्रकाश मर गया । मैं कौन
हूँ
?
सब धुँधला गया है ,कुछ भी भान नहीं ।
प्रकाश ? यह नाम बड़ा परिचित है । नाम
तो कई लिये जा रहे हैं इस नाम से मैं क्यों चौंक रहा हूँ ।
बार-बार क्या हो रहा है मुझे ? जैसे
आँखों के सामने से सब कुछ ग़ायब, अजीब
सी सनसनी । मरने पर ऐसा ही होता है ?
कानों में आवाज़ आ रही है - चंद्रभान के सिर में चोट लगी है ।
हाँ होश में है -थोड़ा-थोड़ा ।
चंद्रभान
?
चन्दू ! लोग उसके पास आ गये हैं । नाक के आगे हाथ लगा कर देख
रहे है साँस चल रही है । यह तो मैं हूँ । मैं ..मेरा नाम ..?
ये लोग चंद्रभान कह रहे हैं ।
औह सिर घूम रहा है । कौन हूँ मैं
,कहाँ
हूँ ?
जो चंद्रभान है,
ज़िन्दा है, प्रकाश
मर...लेकिन
मैं
?मैं
कौन - सोचते ही सब गड्मड्ड होने लगता है,
सिर के अन्दर कैसे झटके से उठते हैं । चारों
तरफ़ भनभन की आवाज़ सुनाई देने लगती है ।मैं जिन्दा हूँ या मर
गया ? कुछ समझ में नहीं आता । रोशनी
है ,अँधेरा है क्या है । क्या हो रहा
है सब घूम रहा है ?अरे,
मेरे साथ सब घूम रहा है । ये चक्कर छोटे,और
छोटे, और छोटे होते जा रहे हैं
,जैसे बहुत अंदर से कुछ खिंचा जा रहा है
। झकझोरा देती चेतनायें क्षीण होती जा रही हैं ,
साथ छोड़ती जा रही हैं ।पता नहीं क्या हो रहा
है - बेबस, अकेला,
निरुपाय!
***
वह उदास रहता है -हर समय कुछ सोचता-सा ।-- मेरी बला उसने अपने
सिर ले ली । उस बेचारे को भान भी न होगा कि इस सीट पर क्या बला
टूटने वाली है । अन्दाज़ तो मुझे भी नहीं था पर जो हुआ वह
मेरे लिये था । भावी जीवन के कितने अरमान सँजोये थे उसने ।
शादी के शुरू के कुछ साल तो पत्नी ससुराल में रही थी ।दो बहनों
की शादी होनी थी। चन्दू सबसे बड़ा बेटा था ।सब बताता था मुझे ।
अब बसन्ती को साथ रखूँगा ।पर अचानक सब बदल गया । मेरी जगह वह
चला गया दिमाग़ में !और भी बहुत कुछ बराबर घूमता रहता है ।
रमना पढ़ी-लिखी है समझदार। पर मन नहीं मानता । हज़ार तरह के
तर्क सामने रखता है - बीतती उसी पर है जिस पर बी |