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प्रवासी
अकं के बहाने कुछ निजी मंतव्य
आदित्य प्रकाश सिंह
मैंने सोचा नहीं था कि कभी
किसी गंभीर साहित्य की पत्रिका के विशेषांक का अतिथि संपादक
बनाया जाऊँगा । यदि यह संभव हुआ है तो सृजनगाथा जैसी
बहुराष्ट्रीय पहुँच वाली ऑनलाईन और नियमित पत्रिका के संपादक
के आत्मीय आग्रह के कारण । मैं अब तक नहीं समझ सका हूँ कि
उन्होंने इतना गुरुत्तर भार अमेरिका में बड़े रचनाकारों के
रहते मुझे ही क्यों सौंपा
? यह मेरे लिए रहस्यवादी
कविता की तरह ही है । ज़ाहिर है इसमें मेरी स्वीकृति भी है कि मैं अमेरिका
के सभी प्रवासी रचनाकारों, संपादकों, हिंदी सेवियों से कहीं कम
योग्य हूँ। यह प्रकारांतर से भी विनम्र शब्दों में मेरा
अहंकार नही, वास्तविकता है । सो मैं अपनी बात रखने से पहले
उनके प्रति आदरांजलि भेंट करना चाहता हूँ।
उनका यह प्रस्ताव मेरे लिए सचमुच अत्यंत महत्वपूर्ण लगा । इस
नाते भी कि इसके माध्यम से अमेरिका के साहित्य को एक साथ
अंतरजाल पर रखा जा सकेगा । उसे विश्वभर के पाठक और हिंदी के
रचनाकार, शोधकर्ता भी देख-परख सकेंगे । इसी बहाने अमेरिका के
प्रवासी साहित्य को बारीकी से देखने-पढ़ने का सुअवसर भी मिलेगा
। शायद यह भी उत्साह मेरी सहमति का कारण बना कि मैं स्वयं
अमेरिका के समकालीन प्रवासी साहित्य से गुज़र सकूँगा ।
यद्यपि अभी प्रवासी साहित्य को आलोचक और
स्वयं भारतीय रचनाकार भी संदेह की दृष्टि से देखते हैं तथापि
यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि अमेरिका के प्रवासी साहित्यकारों ने
सदैव अपनी साधना को जीवंत बनाये रखा है । भाँति-भाँति की
चुनौतियों के बीच भी । गैर हिंदी देश, वह भी अँगरेज़ी सभ्यता
वाले अमेरिका में जहाँ साहित्य और हिंदी की संस्कृति को बचाये
और बनाये रखना कम जटिल नहीं वहाँ भी हिंदी, भाषा, साहित्य और
संस्कृति के उन्नयन में संलग्नरत संस्थाओं ने सदैव
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका को सफल सिद्ध किया है ।
इन्हें याद करना लाज़िमी होगा । अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति,
न्यास एवं हिदीं युएसए इस दिशा में अपनी सक्रिय और सदाशयी
उपस्थिति और सक्रियता के लिए पहचानी जाने वाली संस्था हैं ।
हिंदी युएसए ने इधर ज़मीनी स्तर पर काफी कार्य किया है ।
जिनके स्वयंसेवी हिंदी पढ़ाने का बीड़ा उठाये हुए हैं, जो
मंदिर, स्कूल, एवं निजी स्तर पर हिंदी शिक्षा दान कर रहे हैं ।
यह भविष्य में हिंदी को बचाये रखने के लिए अहम् कार्य है ।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति कवि सम्मेलनों के माध्यम से आम
हिंदी भाषियों के प्रति भाषायी राग को निरंतर बनाने में
कटिबद्ध है । समिति द्वारा कुछ विश्वविद्यालयों में
हिंदी-अध्यापन हेतु आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराती है ।
अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन
ज़रूर हो रहा है किन्तु सबके अपने-अपने पाठ्यक्रम हैं । हिंदी
साहित्य को उसके मूल और गतिमान स्वरूप में पाठ्यक्रम में शामिल
किया जाना अभी प्रतीक्षित है । अमेरिका में हिंदी और साहित्य
के संवर्धन हेतु आवश्यक होगा कि मुख्य शहरों में हिंदी पुस्तक
मेलों का आयोजन हों । हिंदी के दैनिक या फिर साप्ताहिक अख़बार
निकालने पर भी कुछ सार्थक क़दम उठाये जायें । साहित्यिक
समितियों और संगठनों में कविता पाठ के अलावा गद्यात्मक विधाओं
पर भी काम हाथ में लिये जायें ।
अच्छा तो यह होता कि सामूहिक प्रयासों से कोई लघु-पत्रिका ही
निकाली जाय । इधर कुछ समय से डैलास से प्रसारित रेडियो सलाम
नमस्ते ने भारतीय भाषाओं सहित हिंदी को प्रोत्साहन दिया है और उसकी अनुगूँज दूर देशों तक भी पहुँचने लगी
है । कवितांजलि जैसे कार्यक्रम ने यहाँ के प्रवासी रचनाकारों
को नया मंच दिया है । बीच-बीच में साहित्य के कई प्रकाशन हुए
हैं जिसे भारतीय साहित्यकारों ने भी नोटिस में लिया है । यूँ
तो कई साहित्यकार ऐसे हैं जिनकी रचनाएँ भारत से प्रकाशित होने
वाली स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं किन्तु
अमेरिका में हिंदी प्रकाशन की बेसिक सुविधा के अभाव के कारण
यहाँ उस तरह की स्थिति नहीं है कि दस-बीस लघु-पत्रिकाओं के
माध्यम से नये रचनाकारों को आलोचकीय दृष्टि से तराशा जा सके ।
रचनाकारों के एकल और सकल संकलन भी प्रकाशित होते रहे हैं
किन्तु इसमे से अधिकांश का प्रकाशन भारतीय प्रकाशकों की
मेहरबानी से ही संभव होता रहा है ।
हिंदी और उसके साहित्य को अमेरिका या किसी भी प्रवासी देशों
में लोकप्रिय बनाने के लिए उस देश के प्रवासी हिंदीसेवियों को
ही आगे आना होगा । चाहे वे उद्योगपति हों या फिर छोटे-मोटे
काम-धंधों में लगे संघर्षधर्मी लोग । सच तो यही है कि यही
मध्यमवर्ग चेतना और सृजन में अधिक संवेदनशील रहा है । भाषा और
उसके माध्यम से संस्कृति की रक्षा या बचाव स्वयं ऐसे ही
संवेदनशील मनुष्य का कर्तव्य होना चाहिए । इसे सामुदायिक रूप
से विमर्श कर भी तय किया जा सकता है । क्योंकि परदेशियों की
भाषा के लिए कोई भी विदेशी सरकार इतनी दयावान नहीं हो सकती
जितना हम दावा करते हैं या आकांक्षा पालते हैं ।
हिंदी भाषा-शिक्षा के लिए सबसे कारगर साबित हो सकती हैं -
माँएं, जिन्हें पहली पाठशाला कहा जाता है। घर में भी नियमित
रूप से हिंदी या मातृभाषा का प्रयोग हो तो कोई भी कामकाज़ी भाषा
मूल भाषा को नहीं लील सकती । यह प्रत्यक्षतः है। समकालीन हिंदी
और साहित्य से सतत् रूबरू होने के लिए अंतरजाल एक प्रभावी
माध्यम की तरह उभरा है जिसका अधिकाधिक प्रयोग महत्वपूर्ण हो
सकता है । संस्कृति से जुड़े रहने के लिए और अपनी रचनात्मकता
को जाँचने-परखने के लिए भी । क्या हुआ अमेरिका में हिंदी की
किताबें लायब्रेरियों में उपलब्ध नहीं हैं तो
!
कुछ ऐसे संगठनों की आवश्यकता अब भी है अमेरिका में जो हिंदी के
रचनाकारों के मध्य ही बनें तथा जो साहित्य के अनुशीलन में
निष्पक्ष और निरंतर समय निकाल कर जनसहयोग से आलोचनात्मक विकास
के लिए कार्ययोजना पर अमल करें। उत्सवधर्मिता औऱ आयोजनधर्मिता
के मोह में फँसे बिना ।
भाषा (हिंदी) और साहित्य को एक गंभीर कर्म मानते हुए ।
मैं बहुधा भारतीयों को अशुद्ध उच्चारण करते हुए सुनता हूँ । यह
स्वाभाविक है किन्तु शब्द अपनी ध्वनिगत शुद्धता से ही सार्थक
और प्रभावशाली होते हैं । शब्द को ब्रह्म भी कहा गया है । यदि
वे शुद्ध हैं तभी ब्रह्म हैं । मिलावट उतना ही ठीक है जिससे
जीवन में संकट न हो किन्तु विदेशी ज़मीन और भूगोल का तर्क देकर
अपनी भाषा की अस्मिता के साथ जानबूझकर खिलवाड़ करना अपनी माता
के साथ अत्याचार करना भी है ।
भाषा ही मनुष्य की चेतना है । भाषा में ही हम सब सीखते हैं ।
इसलिए भाषा माँ भी है । जैसे धरती, जहाँ हम जनमते हैं, माँ
कहलाती है । माँ के प्रति हिकारत या गैरगंभीरता किसी भी दृष्टि
से बुरी बात ही होगी । तर्क चाहे जो भी गढ़ लें । जो भाषा को
पेट से ही जोड़ते हैं वे भाषा की संस्कृति को कुछ न कुछ नकारते
भी हैं फिर किसी अन्य या पेट चलाने की भाषा की बाध्यता में यह
कहाँ शामिल है कि अपनी मातृभाषा के साथ हम बलात्कार देखने के
लिए विवश है । इस विवशता का कोट तो हमीं ने पहन रखा है जिसे
उतारना ही होगा । अन्यथा जिस तरह अँगरेज़ी की संस्कृति हिडन
तरीके से सारे विश्व में रोपी जा रही है वह दिन दूर नहीं जब हम
एक भी हिंदी शब्द सही नहीं कह पायेंगे । न लिख पायेंगे । न समझ
पायेंगे । और यह विदेशों में रहने वाले भारतीय परिवारों का
संकट बन भी चुका है ।
अक़्सर सुनने को मिलता है कि
प्रवासी हिंदी साहित्य को भारतीय आलोचक गंभीरता से नहीं लेते
हैं । इस दिशा में एकांगी नहीं सोचते हुए हमें रचनात्मक और
आलोचनात्क दृष्टि विकसित करनी होगी। हममें से अधिकांश की
रचनाओं में मूल्यगत, और भाषागत त्रुटियाँ रहती हैं जिसे अध्ययन
और साधना से दूर करना ही होगा । रूप और कौशल के नाम पर हम कई
बार मुगालते में भी रहते हैं । क्योंकि मनोरंजन के लिए या टाइम
पास करने के लिए लिखे जाने वाले साहित्य और साहित्य के
सरोकारों को केंद्र में रखकर लिखे जाने वाले साहित्य में
पर्याप्त अंतर होता है जिसे हम प्रवासी रचनाकारों को गंभीरता
से लेना ही होगा । परिस्थिति, भावभूमि, भाषिक स्थिति भिन्न
होने के बावज़ूद भी इस बात को स्वीकारना होगा कि हमारे बहुत
सारे प्रवासी साहित्यकारों का रचा-लिखा गया साहित्य जब भारतीय
आलोचकों, अध्येताओं, गंभीर संपादकों या पाठकों के पास पहुँचता
है तो वह उसे नवलेखन कहकर बाद में पढ़ने की गरज़ से अपने
आलमारी में सरका देता है । मैं जब यह कह रहा हूँ तो मेरा
उद्देश्य और दृष्टि साहित्य के गंभीर लोगों की ओर ही है । जो
साहित्य की गंभीरता को समझते भी हैं ।
मैंने और सृजनगाथा के संपादक जयप्रकाश जी ने
इस विशेषांक की तैयारी में अमेरिका के लगभग 130 साहित्यिकारों,
हिंदी सेवकों, अध्यापकों को ई-मेल किया जिसमें कुछ खास नाम हैं – अनुराधा आमेलकर, अनुराधा
चंदर, डॉ. उषादेवी विजय, डॉ कमला चौहान कोठारी, डॉ. कल्पना
सिंह चिटनिस, किरण सिंहा, कुसुम टंडन, आनंद स्वरूप , कुसुम
रस्तोगी, कुसुम सिन्हा, निधि शर्मा, नीना सुनेजा, नेहा गुप्ता,
पन्ना नायक, प्रीतिसेन गुप्ता, डॉ. प्रेमलता वैष्णव, डॉ.
पुष्पा सक्सेना, डॉ. पूर्णिमा गुप्ता, बबिता श्रीवास्तव,
बिन्दु सिंह, डॉ. बिंदेश्वरी अग्रवाल, भावना ग्यारे, मधु
माहेश्वरी, मंजुराय, माधुरी मित्तल, मीरा गोयल, रचना रम्या
अग्रवाल, रजनी, राजश्री, राधेकिशन किंशुक, रागिनी श्रीवास्तव,
रानी नगिन्दर, डॉ. रेखा द्विवेदी, रेणु राजवंशी, विजयलक्ष्मी,
डॉ. स्वदेश राणा, सारिका सक्सेना, सीमा खुराना, सरोजनी शर्मा,
अनंत कौर, अंशु, सुदर्शन सुनेजा, डॉ. सुधा ओम धींगरा, सुधा
राठी, सुमन गुप्ता, सुषमा वेदी, डॉ. शकुन्तला बहादुर, डॉ.
अब्दुल्लाह, आग्स्तय कोहली, अजय कुलश्रेष्ठ, डॉ. अफ़रोज ताज़,
अशोक पी. सिंह, अशोक व्यास, आनंद आहुजा, अभिनव शुक्ला, ओम आनंद
शर्मा, उमेश अग्निहोत्री, गुलधर मधुर, डॉ. तरूण कोठारी,
देवेन्द्र पाल परिहार, धनंजय कुमार, ध्रुव कुमार, नरेन्द्र
टंडन, डॉ. पी. जयरामन, राम बाबू गौतम, डॉ. ल. सि. ठाकुर, वेद
बटुक, डॉ. सत्यपाल आनंद, सरदार सिंह, डॉ. सुमन वरदान, एस.
तिवारी, ड़ॉ. सुरेश राय, सौमित्र सक्सेना, एच. बिंदल आदि ।
कुछ ने हमें तत्काल रचना भिजवा दी । कुछ व्यस्ततावश हमें रचना
नहीं भेज सके। हम सबका आभार मानते हैं कि उन तक इस विशेषांक की
बात किसी न किसी माध्यम से पहुँची और वे अपने लेखन के प्रति
किसी न किसी कोण से कुछ न कुछ सोच सके होंगे । आख़िर समाचार भी
क्रियाशीलता के लिए वातावरण तो तैयार करता ही है ।
इस विशेषांक में जो भी है आपको समर्पित है । कुछ रचनायें हमें
मिली ज़रूर लेकिन जिसे तकनीकी कारणों से हम यहाँ प्रकाशनार्थ
नहीं रख सके । इसके अलावा और, जिसे होना चाहिए और वह यदि नहीं
है तो यह हमारी ही कमी है जिसे आप उदारता से लेंगे । हमें
विश्वास है कि आपकी प्रतिक्रिया मिलेगी जो हमारे लिए भविष्य
में और कुछ खास करने की ज़मीन तैयार करेगी ।
ai
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