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वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। मीडिया ।।

 

 

हिन्दी पत्रकारिता : ये कौन सी भाषा है भाई ?


शिशिर द्विवेदी

 

ज हिन्दी पत्रकारिता क्षेत्रों में सफलता के झंडे गाड़ रही है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उसका खेल इतना विस्तृत हो गया है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसका दखल स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यदि गम्भीरता पूर्वक विचार करें तो समाचारों की मौलिकता, उसकी भाषा की अलंकारिता के साथ कहीं न कहीं बहुत बड़ा मज़ाक शायद हमने ही शुरू किया। हिन्दी, अँगरेज़ी शब्दों का जो घालमेल शुरू हुआ है चकित करता है। आज बड़े-बड़े नामों को जिस ढंग से शार्ट कर परोसा जा रहा है वह कहीं न कहीं हमारी गुलाम मानसिकता का प्रतीक है।

 

वास्तव में हम सस्ती लोकप्रियता पाना चाहते हैं जो हिन्दी पत्रकारिता तथा उसके पाठक वर्ग के साथ किया जा रहा वह षड्यंत्र है जिसके शिकार सबसे पहले हम स्वयं होंगे। इस अंधी दौड़ में हम इन विषयों पर सोचते ही नहीं या फिर तात्कालिक सफलता को भुलावे में सच को जानना ही नहीं चाहते। ये बात अलग है कि समाचार जल्दी में लिखा गया साहित्य है पर इतनी भी जल्दी नहीं है कि उसे भोंडे ढंग से परोसा जाए।

 

अगर हिन्दी पत्रकारिता का क्षेत्र व्यापक हुआ है तो उसकी जिम्मेदारियाँ भी बढ़ी हैं। पहले जब हम आज़ाद नहीं थे तो हमारी शिक्षित आबादी तीस प्रतिशत भी नहीं थी फिर भी उस समय के समाचारपत्र एवं उनकी भाषा की शुद्धता इस बात का प्रमाण थी कि हमारे सम्पादक से लेकर पत्रकारिता से जुड़ा हर व्यक्ति इन तथ्यों पर अपनी सजग दृष्टि रखता था। पर आज जब इस देएश की आबादी एक अरब से ज़्यादा है, लगभग पैंसठ प्रतिशत शिक्षित हो चुकी है, ऐसे में यदि इस तरह की त्रुटियाँ, आए दिन समाचारपत्रों में मिले तो यह खेद का विषय है।

 

हमने ये जो नई भाषा विकसित की है उसका दुष्परिणाम हमें देखने को मिल रहा है। आज पढे़-लिखों की भीड़ तो दिखाई देती है, पढ़ा-लिखा नहीं दिखाई देता है।

 

 भाषा और उसकी तारतम्यता की जब बात आती है तो बड़े-बड़े लेखक ऐसी भूल करते हैं कि उन्हें देखकर अफ़सोस होता है। इसका सबसे बड़ा कारण दिन-प्रतिदिन समाचारपत्रों की भाषा का क्षरण है जो हमें आए दिन उन्हीं शब्दों से दो-चार करता है जो कि आज व्यवहार की भाषा बन गई है। इस तरह हम यह कह सकते हैं कि हमने अपने ही हाथों अपनी भाषा का गला घोंटा है। फिर भी अगर हम नहीं समझते तो आने वाला समय और समाज एक ऐसी अधकचरी भाषा का आदि जाएगा जो न तो हिन्दी भाषा होगी न ही अँगरेज़ी।

 

हिन्दी पत्रकारिता में आई गिरावट केवल यहीं ख़त्म नहीं होती। भाषा के साथ तो हम जो कर रहे हैं वह तो अब आम बात हो गई है, उसके साथ जिस तरह के समाचारों को महत्ता दी जा रही है, उसमें हम देखते हैं कि एक समाचारपत्र को सम्पूर्ण देश की जनता की आवाज़ को मुखर रूप से प्रस्तुत कर अपनी नैतिक जिम्मेदारी का निर्वाह करना चाहिए परन्तु यह दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि मानवीय जीवन के वास्तविक संघर्षों का साक्षी आज का समाचारपत्र नहीं बनना चाहता । यह कहें कि आम आदमी की आवाज़ आज उसके कानों तक नहीं पहुँच रही है। जिन खबरों में आकर्षण नहीं वह खबर नहीं बनती। क्योंकि अब समाचारपत्रों के मंत्र पहले जैसे नहीं रहे। अब तो जो दिखता है वही बिकाता है की परिपाटी पर समाचार बनते और बिकते हैं अगर समाचारों, खबरों के यही मानक हैं तो मत बेचिए ऐसी खबरों को जो समाज को कोई नैतिक संदेश न देती हों। क्योंकि समाज के प्रति हमारी भी कुछ जिम्मेदारी है। जो खबर आम आदमी को सुख न दे सके उनके हित की बात न करें जो उनके जीवन में परिवर्तन न ला सके ऐसे समाचार किसी काम के नहीं। हमे अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। हिन्दी पत्रकारिता को उसी मार्ग पर लाना होगा जो हमारे मनीषियों, पूर्वजों का सपना था। लेकिन हमने तो अपना कोई मॉडन तैयार ही नहीं किया और जो मॉडल था उसे मने उन्नीस सौ सैतालीस में अपने हो हाथों खत्म कर दिया। उपरोक्त तथ्यों पर यदि विचार किया जाए तो किसी तासरे ने हमारा कुछ किया या नहीं ये दूसरी बात है पर हमने स्वयं अपनी जड़ों को हर कदम पर खोखला किया है। यदि हम सचेत नहीं हुए तो फिर  उसी गुलामी की जंजीरों में जकड़ें जाएँगे। अंतर बस इतना होगा तब हमारे तन गुलाम थे अब मन गुलाम होगा।

शिशिर द्विवेदी

द्वारा डॉ. पी. एन. द्विवेदी

रामबाग, गांधीनगर, बस्ती, (उप्र) - 272001

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