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वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। मीडिया ।।

 

 

बहुत बदल जाएगा मीडिया का चेहरा-मोहरा


संजय द्विवेदी

 

 पिछले एक दशक में दुनिया जितनी तेज़ी से और जितनी बदली है, वैसा इतिहास में भी कोई उदाहरण नज़र नहीं आता। विश्वग्राम का सपना इतनी जल्दी हक़ीकत में बदल जाएगा, ऐसा कभी महसूस भी नहीं होता था। आज बाज़ार के हो-हल्ले में दबे पाँव बहुत सारी चीज़ें किस तरह हमारी ज़िंदगी में जगह बना गईं कि हमें पता भी नहीं चला। मीडिया भी इसी तरह जितनी तेज़ी से बदला और अपग्रेड हुआ है, वैसा विस्तार और वैभव उसने पहले कभी नहीं देखा था। यह बदलाव सिर्फ़ तकनीक के स्तर पर ही नहीं है, वह कार्यशैली में भी है, भाषा में भी है, प्रबंध और विपणन में भी है। इतना चमकदार मीडिया पहले कभी नहीं था। वह आकर्षण का केंद्र है, आकर्षण ऐसा जो आँखों को चौंधिया देता है। उसने सिर्फ़ ख़ुद को नहीं बदला है, अपने पात्र, अपने नायक और अपने विमर्श को भी बदल डाला है।

 

 मीडिया बदलती दुनिया की एक ऐसी तस्वीर पेश करता है, जो हमें ज़माने में जीने, जमने और खड़ा होने लायक बनाती है। वह हममें दीनता भी जगाता है। यह भी अहसास कराता है कि इस बहुत तेज़ी से भागती और बदलती हुई दुनिया में एक आम आदमी की हैसियत क्या है? यह अहसास कराते हुए वह हमें उसी दौड़ में शामिल कर लेता है, जिससे हमारी पीढ़ियाँ बचती आई हैं। मीडिया में अब मनुष्य की चीखें नहीं, उसका आर्तनाद नहीं, उसका संघर्ष नहीं, उसकी सफलताएं नहीं, सिर्फ़ और सिर्फ़ सपने बेचे और खरीदे जा रहे हैं। इस अर्थ में आज के दौर का मीडिया अपने परंपरागत मूल्यों से शीर्षासन कर चुका है। भारत जैसे देश के संदर्भ में मीडिया की भूमिका पर विचार इसलिए भी बहुत भावनापूर्ण हो जाता है, क्योंकि हिंदुस्तान में मीडिया का प्रवेश ही ऐसे समय में हुआ, जब देश अँग्रेज़ी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। हिंदुस्तान वह देश है, जिसकी आज़ादी में इस देश की मीडिया का सर्वप्रमुख योगदान रहा है। शायद इसीलिए मीडिया से नैतिक अपेक्षाएं कुछ ज्यादा ही पाली जाती हैं। भारतीय मीडिया की पृष्ठभूमि ही देश सेवा, सामाजिक बदलाव, अन्याय के खिलाफ संघर्ष, आज़ादी के लिए संघर्ष, भाषा का सम्मान और स्वाभिमान, दलित उत्थान, महिला जागृति जैसे तमाम संदर्भों से जुड़ी हुई है। शायद इसीलिए बार-बार भारतीय मीडिया को उसकी जड़ें याद दिलाई जाती हैं और लक्ष्य से उसके विचलन को बार-बार याद दिलाया जाता है। स्मृतियाँ इतनी जल्दी नष्ट नहीं होतीं, जड़ें बार-बार अपने बचे हुए गुरुत्वाकर्षण के नाते हमें अपनी ओर खींचती हैं।

 

 बाज़ार के लाख दबाव के बावजूद भारतीय मीडिया अपने सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को भुला और बिसरा नहीं पाता। वह लौट-लौटकर उन्हीं वीथिकाओं में जाता है, जहाँ उसके प्रेरणा पुरूष उसका मार्गदर्शन करते हैं। यह अकारण नहीं है कि सामाजिक उत्तरदायित्व को लेकर और ख़बरों के चरित्र को लेकर सर्वाधिक विलाप भारत या हिंदी क्षेत्र में ही हो रहा है। मीडिया को बार-बार उसकी जड़ों की याद दिलाई जा रही है और उसे इसी आधार पर लांछित किया जा रहा है कि उसने अपनी जड़ों को पहचानना छोड़ दिया है। बात जब छत्तीसगढ़ जैसे दिल्ली से बहुत दूर छोटे राज्यों की होती है, तो यहाँ भी मीडिया को उन्हीं प्रश्नों का सामना करना पड़ता है, जो सवाल समूचे हिंदी क्षेत्र के मीडिया के सामने खड़े हों। हम जब छत्तीसगढ़ का विचार करते हैं, तो यहाँ का प्रश्न बहुत अलहदा नहीं हैं। ये वही सवाल हैं, जो समूची हिंदी पट्टी को मथ रहे हैं। ये वो इलाके हैं, जहाँ जड़ों में ही संस्कार, सभ्यता, भाषा और संस्कृति के प्रति एक पूजाभाव सा अनुराग है।

 

 छत्तीसगढ़ जैसे क्षेत्र में जहाँ विकास की किरणें आज़ादी के बहुत सालों बाद पहुँचनी शुरू हुई और उसने बहुत बाद में अपने सपनों को सच करना शुरू किया, का मीडिया भी नई तरह की चिंताओं से घिरा हुआ है। यहाँ का मीडिया भी लगभग उन्हीं प्रश्नों के सामने है, जो नई बाज़ार व्यवस्था ने, औद्योगिकीकरण ने, अँग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव ने हमें दिए हैं। यहाँ भी विलाप और स्वर वही हैं। जड़ें ऐसी कि हमें माधवराव सप्रे और सुंदरलाल शर्मा जैसे महानायकों की स्मृति दिलाती हैं। सन 1900 में बिलासपुर जिले के पेंड्रा नामक बहुत छोटी जगह से निकले छत्तीसगढ़ मित्र जैसे प्रकाशन आज के शहर केंद्रित मीडिया के लिए एक चुनौती सरीखे ही हैं। छत्तीसगढ़ मित्र की सिर्फ़ तीन साल की यात्रा का सफ़र नैतिक दृष्टि से इतना सबल है कि वह हमारी पूरी पत्रकारिता पर भारी पड़ती है। यह भार इसलिए भी महसूस होता है कि आज का मीडिया गाँव की तरफ देखना तक नहीं चाहता। वह बाज़ार में ही अपने को मुदित और प्रफुल्लित पाता है। लाइफ स्टाइल और हिंग्लिश उसके जीवन मंत्र बन गए हैं। यह उस छत्तीसगढ़ में हो रहा है, जिसकी एक बड़ी आबादी आज भी वनांचलों में रहते हुए दैनिक जीवन के संघर्षों से जूङा रही है। यह उस छत्तीसगढ़ में हो रहा है, जहाँ राज्य गठन के बाद भी वाड्रफनगर जैसे इलाके में एक मौसम में सौ लोग मलेरिया से मर जाते हैं। इस तरह के तमाम चेहरे छत्तीसगढ़ के पास हैं, जिन्हें आज के छत्तीसगढ़ का मीडिया या तो देखना नहीं चाहता, या देखकर अनदेखा कर रहा है। इस तरह के तमाम प्रश्न वे भूमिहीनों के भी हैं, आदिवासियों के भी हैं, दलितों के भी हैं, पलायन कर दूसरे राज्यों में जाकर शोषण का शिकार हो रहे मज़दूरों के भी हैं। सत्ता और राजनीति की अपनी सीमाएं और अपने लक्ष्य होते हैं। यह लक्ष्य अगर मीडिया के भी लक्ष्य हो गए, तो हम मूल-भूत सवालों को कैसे दुर्लक्ष्य करते हैं हमारा मीडिया इसका उदाहरण है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा जैसे प्रश्न आज छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। किसी लोक कल्याणकारी राज्य के लिए ये प्रश्न साधारण नहीं हैं किंतु इन तीनों मुद्दों पर सरकार को जगाने और सरकारी मिशनरी को हरकत में लाने का काम कौन करेगा? मीडिया महानगरों में हो रहे अविष्कारों पर मस्त है। वह बिग बाज़ारों और मेगा माल्स में छत्तीसगढ़ की तलाश कर रहा है। जाहिर है ऐसा मीडिया छत्तीसगढ़ को पा नहीं सकता। उसके लिए जिस समर्पण, जिस दृष्टि और जिस कौशल की आवश्यकता है, वह हमारी भोथरी हो चुकी संवेदना के नाते हमारे हाथों से छूट चुकी है।

 

 तेज़ी से हुए बदलावों को छत्तीसगढ़ के मीडिया ने बहुत तेज़ी के साथ ग्रहण किया है। प्रिंट मीडिया की बात करें, तो 2007 में राज्य के अखबार लगभग अधुनातन प्रिंटिंग प्रणालियों से लैस हैं। बेहतर मशीनों पर उनकी छपाई हो रही है। सभी प्रमुख अखबार अपने ज़्यादातर पृष्ठों को रंगीन ही प्रकाशित कर रहे हैं। साफ्टवेयर की दृष्टि से वे अनुकूल साफ्टवेयर विकसित कर उस पर काम कर रहे हैं। कई अखबार अपने निजी फांट्स पर प्रकाशित होने लगे हैं। बहु संस्करणीय अखबार अपने पूरे तामझाम के साथ प्रस्तुत हो रहे हैं और राज्य में उनकी प्रसार संख्या भी तेज़ी के साथ बढ़ी है। राज्य से अनेक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी प्रारंभ हुआ है, जिसमें कई बड़ी सुदर्शन पत्रिकाएं हैं, जो कंटेंट के लिहाज़ से थोड़ी कमजोर जरूर हैं, लेकिन उनकी प्रस्तुति किसी भी राष्ट्रीय पत्रिका से कमजोर नहीं है। इसी तरह इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र में लगभग सभी प्रमुख समाचार चैनलों में अपने संवाददाता या अंशकालिक संवाददाता राज्य में नियुक्त किए हैं। सहारा समय और ईटीवी जैसे चैनलों ने छत्तीसगढ़ के लिए विशेष स्थान दिया है। दोनों न्यूज चैनल मध्यप्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ की खबरों का एक विशेष चैनल चलाते हैं। इसी तरह प्रमुख अवसरों पर टीवी चैनल्स की ओवी वैन्स का इस्तेमाल भी देखा जाता है। दूरदर्शन ने भी अपने कार्यक्रमों में छत्तीसगढ़ राज्य के लिए विशेष समय आरक्षित किया है और कई केंद्रों पर कार्यक्रमों का निर्माण भी किया जाता है। आकाशवाणी ने भी लगभग इसी तरह की पहल की है। आकाशवाणी के माध्यम से हिंदी ही नहीं, छत्तीसगढ़ी भाषा में भी बहुत सारे कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। निजी रेडियो भी छत्तीसगढ़ राज्य में प्रारंभ हो चुके हैं। जिसकी शुरूआत भास्कर समूह के माई एफएम के रुप में बिलासपुर से हो चुकी है। शीघ्र ही रायपुर से भी यह समूह अपना रेडियो प्रारंभ करने वाला है। इसी तरह रेडियो रंगीला और रेडियो मिर्ची जैसे निजी रेडियो भी राज्य में आ रहे हैं। पत्रकारिता की शिक्षा का भी छत्तीसगढ़ में एक लंबा इतिहास रहा है। रायपुर के सबसे पुराने महाविद्यालय छत्तीसगढ़ कालेज में पत्रकारिता की पढ़ाई लंबे समय से होती आ रही है। बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय सहित कई कालेजों में पत्रकारिता की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था है। इससे पत्रकारिता शिक्षण के क्षेत्र में भी छत्तीसगढ़ की उपस्थिति महसूस की जाती है। बदलाव जितनी तेज़ी से हो रहे हैं, छत्तीसगढ़ के महानगर और छोटे कस्बे भी उसे स्वीकार कर रहे हैं। 24 घंटे के मनोरंजन और समाचार चैनलों ने एक नए तरह के उपभोक्ता वर्ग का सृजन किया है, जो हर तरह के बदलाव को स्वीकारने के लिए तैयार है।

 

 सन 2020 मीडिया में किस तरह के बदलाव लाएगा, इसका आकलन करना संभव नहीं है पर इतना जरूर है कि जो परिवर्तन देश में घटित हो रहे होंगे, वे घटनाएं इस राज्य में भी आकार ले रही होगी। बाज़ार की शक्तियों ने जिस तरह से चीजों का अनुकूलन करने की ठानी है, उसमें लगभग सारी दुनिया को एक रंग में रंग देने की तैयारी है। इसके चलते जो बदलाव राष्ट्रीय मीडिया में घटित होंगे, उसका सीधा प्रभाव छत्तीसगढ़ में भी परिलक्षित होगा। संचार साधनों की तीव्रता और तकनीक की सहज उपलब्धता ने जगहों के अंतर को समाप्त कर दिया है। छत्तीसगढ़ में जिस तरह के औद्योगिक विकास की कल्पना की जा रही है, यदि वह साकार हो पाई, तो बहुत तेज़ी के साथ सर्विस इंडस्ट्री का भी विकास होगा। यह सिलसिला अंतत: मीडिया को शक्ति देता है। चौतरफ़ा विकास अंतत: मीडिया के माध्यम से ही परिलक्षित होता है। यदि राज्य में औद्योगिक और आर्थिक विकास की संभावनाएं देखी जा रही हैं, तो इसके साथ मीडिया का विकास भी उसी तेज़ी और त्वरा के साथ होगा। इसे रोका नहीं जा सकता।

 

यह साधारण नहीं है कि छत्तीसगढ़ में छोटे-छोटे शहरों में ढेरों विज्ञापन एजेंसियां काम कर रही हैं। इंटरनेट और मोबाइल के माध्यम से कारोबार को बढ़ावा मिला है। वेब मीडिया के क्षेत्र में भी राज्य में बहुत महत्वपूर्ण कार्य हो रहे हैं। राज्य सरकार के संगठन चिप्स की सराहना भी देश स्तर पर हुई है। राज्य गठन के बाद संसाधनों की विपुलता में राज्य की तरफ पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है। शायद यही कारण है कि बड़े मीडिया समूह भी छत्तीसगढ़ की तरफ आकर्षित हुए हैं। राज्य में टाटा जैसे समूह का आगमन एक अलग ही संकेत करता है। ये घटनाएं सिर्फ़ और सिर्फ़ राज्य के औद्योगिक विकास को नहीं, मीडिया के विकास को भी संबोधित करती हैं। 2020 में राज्य के अखबार न सिर्फ़ उस दौर तक उन्नत हो चुकी प्रणालियों का उपयोग कर रहे होंगे, संभव है कि जिस तरह कलम को की-बोर्ड ने रिप्लेस किया है, अखबारों में ऐसे कंप्यूटर इस्तेमाल किए जाएं, जहाँ संवाददाता और संपादक की-बोर्ड की बजाय सिर्फ़ जबान हिलाकर शब्द बोलें और वे मुद्रित होते जाएं। संभावना यह भी है कि ज़्यादातर अखबार अपने ई-पेपर प्रकाशित करें और उनकी पठनीयता मुद्रित होने वाले समाचार पत्र से ज्यादा हों। कुछ अखबार मोबाइल पर ही निकाले जाएं, जो सिर्फ़ मोबाइल पर ही खबरें प्रसारित करें। तकनीक का विकास जिलों की पत्रकारिता को एक नया आयाम दे सकता है। संभव है जिलों, जिलों के अपने अखबार हों। विविध विषयों पर पत्रिकाओं का प्रकाशन हो और पत्रकार अपने जिले, तहसील या किसी विशेष क्षेत्र में टीवी चैनलों से समाचारों का प्रसारण करें।

 

स्थानीय केबलों के माध्यम से कुछ शहरों में समाचार प्रसारित किए जा रहे हैं, संभव है 2020 में इनकी संख्या बढ़े और तमाम सामाजिक संस्थाएं अपने निजी टीवी चैनल प्रारंभ करें। सरकार की नीतियों के कारण निजी क्षेत्र में रेडियो सिर्फ़ मनोरंजन के लिए इस्तेमाल हो रहा है। समाचार और विचार के प्रसारण का अधिकार इन रेडियो चैनलों को नहीं है। कुछ विश्वविद्यालयों को अपने निजी रेडियो चलाने की अनुमति दी गई है। छत्तीसगढ़ राज्य में इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय एक सामुदायिक रेडियो का संचालन करता है। संभव है 2020 तक अनेक शैक्षणिक संस्थान इस तरह की पहल करें। संभव यह भी है कि सरकार अपनी नीतियों में बदलाव करे और निजी रेडियो को समाचार प्रसारण की अनुमति दे। इससे तमाम व्यावसायिक और मीडिया घराने समाचार केंद्रित रेडियो की भी शुरूआत कर सकते हैं। सन 2020 में छत्तीसगढ़ की कल्पना एक ऐसे राज्य के रूप में करता हूँ, जहाँ मीडिया की शक्ति अपनी पूरी प्रखरता पर होगी। इसका कारण मैं राज्य के लोगों की समाचार को जानने की भूख नहीं, बाज़ारवाद को ही मानता हूँ। बाज़ार अपने विस्तार के लिए अंतत: जनसंचार माध्यमों का ही उपयोग करता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहाँ बाज़ार की धमक अभी उस तरह से महसूस नहीं की जा रही है, आने वाले दिनों में बढ़ेगी। बाज़ार अपने विस्तार के लिए मीडिया को हस्तक के रूप में इस्तेमाल करता आया है। आने वाले समय में छत्तीसगढ़ जैसे राज्य का मीडिया बाज़ार के इसी विस्तारवाद में सहयोगी की भूमिका निभाता दिखेगा। इसके साथ समानांतर कार्य कर रही कुछ शक्तियाँ ज़रुर अलग तरह का वैचारिक हस्तक्षेप कर रही होंगी, किंतु उनकी भूमिका बहुत सीमित होगी। वैचारिक आंदोलनों, जनांदोलनों की संभावनाएं भी छत्तीसगढ़ में महसूस की जा रही हैं। औद्योगिकीकरण के साथ-साथ इस तरह के संकट मीडिया में मुखर होंगे किंतु पूंजी के प्रति समर्पित मीडिया अंतत: बाज़ार की शक्तियों के साथ ही खड़ा दिखेगा। आज का संकट, तब ज़्यादा विकराल रूप में अपने ज्यादा पास दिखेगा। लोकतंत्र में असहमति की अपनी जगह है और सम्मान भी किंतु वह असहमति बहुत सीमित परिप्रेक्ष्य में नज़र आएगी। मीडिया का जिस तरह सर्वव्यापी और सर्वग्रासी विस्तार हुआ है, वह ज़्यादा नंगे रूप में सामने आएगा। जाहिर है हमें इन चुनौतियों के मद्देनज़र स्वयं को तैयार करना होगा। मीडिया की यह भूमिका सूचनाओं और समाचारों के संप्रेषण तक सीमित नहीं है, वह हमारे होने, जीने में सहायक है। ऐसे में छत्तीसगढ़ की पहचान को बनाए और बचाए रखने के लिए अपनी उन जड़ों को याद रखना होगा, जो हमें आने वाले खतरे से लड़ने का हौसला दे सकें। मीडिया दायित्वबोध और मूल्यों के साथ अपना रिश्ता कितना और कैसा बनाए रख सकता है, इसे देखना रोचक होगा किंतु आने वाला समय एक कठिन समय है, इसे स्वीकार लेने में हिचक नहीं होनी चाहिए। यदि हम अपने दायित्वों को समझकर नई परंपराओं का सृजन कर सकें, जो बाज़ार के दबाव के बीच भी कुछ अंशों में ही सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कर सके, तो बड़ी बात होगी। मीडिया सिर्फ़ शक्तिवानों और प्रभु वर्गों की वाणी बनकर न रह जाए, यह चिंता आने वाले समय की सबसे बडी चिंता है। दायित्व और मूल्य ही मीडिया को समाज से जोड़ते हैं। इसमें ही मीडिया और समाज दोनों का विकास संभव है। यह बात कठिन जरूर है पर शुभ सोचना और शुभ करना ही भारतीयता की पहचान है। क्या हम इस उत्तरदायित्व को निभाने के लिए तैयार हैं?

  संजय द्विवेदी

संपादक, हरिभूमि, रायपुर

छत्तीसगढ़

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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