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युएसए
का प्रवासी साहित्य
मेरी
सृजन-यात्रा
आदित्य प्रकाश
सिंह
(वर्ष 08 के प्रवासी सम्मान से विभूषित
हिंदी सेवी)
आज से कोइ बीस पचीस साल पहले जब पहली बार नेपाल मे अध्यापन
कार्य हेतु अवसर मिला तो महसूस हुआ कि भारत का मित्र देश होने
के बावजूद कितना कुछ अलग है। नेपाल को
पहले मैं भारत का अंग समझ रहा था पर वहाँ जाकर महसूस हुआ कि यह
भी विदेश है। नेपाल कि एक बात अच्छी लगी
कि लोग अपनी छोटी सी जिन्दगी मे खुश नज़र आते हैं।वाई जी
कॄष्णा मूरती की पुस्तक में जो पढा था, वह देखने को मिला-
"Smile is a national habit of Nepal ( मुस्कुराना नेपाल की
राष्ट्रीय आदत है)। परिचय हो या ना हो, लोग अभिवादन मुस्कारा कर
करते है। यही अभिवादन का तरीका अमेरिका में भी देखता हूँ। वहाँ
गरीबी तो है, पर मन में आभाव नहीं। इसी कारण आम नागरिक वहाँ
अपनी छोटी-सी ज़िंदगी में खुश रहता है। हाला कि अब वहाँ भी
राजनैतिक एवं सामाजिक समस्याएं उभर कर आ चुकि हैं और अब वह
नेपाल नहीं रहा जिसे मैं पचीस साल पहले बिता कर आया था। आज यह
सोच कर अछा लगता है कि गया था तो अकेले पर कई मित्र बना कर लौटा
हूँ। साथ साथ विश्व का अकेला हिन्दू राष्ट्र है।
नेपाल प्रवास के समय एक औस्ट्रेलियन यात्री ने वॄक्षों के प्रति
मेरी जिञासा बढा दी, कारण, वह विश्व के विभिन्न देशों के वॄक्षों
पर अध्यन कर रहा था। नेपाल से जब मैं भारत वापिस आया, यही
जिञासा वॄक्षों के प्रति एक विशेष अनुराग पैदा कर दी। इसी क्रम
में कुछ मित्रों के साथ मिल कर पर्यावरण संगठन बना डाली। इस
संगठन का मूल उद्देश्य था- "परमपरागत वॄक्षों का रोपण एंव
संरक्षण।" हमारे भारतीय वॄक्ष नीम, आम, अशोक, बरगद, पीपल, आदी
ऐसे कई वॄक्ष हैं जो हमारी संस्कॄति से जुडे हुए हैं। पूजा,
विवाह, यञ जैसे अवसरों पर इन सबों कि अपनी अपनी महत्ता है। वेदों
में एक वॄक्ष को दस पुत्रों के समान माना गया है। वॄक्ष का हर
अंग मनुष्य जीवन में किसी ना किसी काम आता ही है। ये प्रक्रिति
के संरक्षक देव हैं। श्वास के लिये औक्सीजन के साथ साथ ईंधन,
औषधी, फल, आदि तथा मरणों परांत, यही वॄक्ष कोयला एंव पेट्रोल
में परिवरतित हो जाते हैं। सचमुच प्रकॄति का रहस्य आम मनुष्य
के लिये रहस्य ही बना रहता है। इसॆ समझना ही योग की शुरुवात
है। प्रकॄति से एक रागात्मक संबंध हो जाये, तो वही तुलसी और
कबीर बन जाते हैं। राम, कॄष्ण, विवेकानंद ने प्रकॄति को जाना,
तभी तो दे गये हमें जीने के लिये अमरवाणी।
१९९८ में अमेरिका प्रवास का योग बना और तब से मैं अमेरिका के
डैलस शहर में हूँ। देश छूटा, लोग छूटे पर छूटा नहीं माटी प्रेम।
अमेरिका सचमुच एक परिकल्पनाओ और संभावनाओ का देश है। सुबह-दोपहर
शाम द्रुत गति से यहाँ करवट बदलती है, और रात का आलम तो
पूछिये ही नहीं। मानो
संध्या सुंदरी सोलह श्रॄंगार कर अठखेलियाँ
करती हैं। अमेरिका के कई शहर " City that never sleeps" के नाम
से जाने जाते हैं। शहरीकरण अपने साथ कई अच्छाई-बुराई का चिट्ठा
खोलती है जो यहाँ दिखता है। यहाँ ’घर’ घर नहीं, मकान है। वह
प्रेम और स्नेह कहाँ? किसी ने सच ही कहा है,
" यहाँ हाथ मिलाने वाले कई मिलेंगे, पर दिल मिलाने वाले नहीं...."
एक पर्वतारोही
की पुस्तक पढी़ थी जिसकी एक बात अमेरिका में
साफ-साफ दिखती है। उसने लिखा था, "पहाड़ पर १७-१८ हजा़र फी़ट
की ऊँचाई तक पौधे कहीं-कहीं दिखते हैं और साथ-साथ कीट-पतंग
भी। इस ऊँचाई के बाद, पौधों का दिखना बंद हो जाता है। जैसे ही
पौधों का दिखना बंद हुआ, कीट-पतंग भी गायब हो जाते हैं। ठीक वही
बात विदेशों में लागू होती है कि जैसे ही भाषा छूटने लगती है,
साथ-साथ संस्कॄति भी लुप्त होने लगती है।
आख़िर, "भाषा ही संस्कॄति को जीवंत रख
सकती है।" भाषा हमें एक सूत्र में
बाँधती है, अपना होने
का एह्सास दिलाती है। भाषा-साहित्य में
समाहित है हमारी भावनाएँ। प्रसाद जी कि इन पंक्तियों को जब मैं
पढ़ता हूँ:
" बरसाती आँखोँ के बादल-बनते जहाँ भरे करुणा जल,
लहरें टकरातीं अनन्त की- पाकर जहाँ किनारा,
अरुण, यह मधुमय देश
हमारा।"
लगता है भारतीय संस्कॄति जीवंत हो उठती है। अमेरिका प्रवास में
सामजिक
संस्थाओं से जुड़ कर हम भारतीय कुछ कर पाते हैं। प्रणाम
करता हूँ उन भारतवंशियों को जिनके चलते आज अमेरिका के हर शहर
में मंदिर स्थापित हैं। वैदिक मंत्रों का पाठ,
अग्निदेव का
आहवान आज भी हजारों वर्षों से चला आ रहा है। वेदों
की रचना अपने
आप में अदभुत कार्य है जिस कारण विश्व
की किसी भी भूखंड में
रहने के बावजूद हम भारतीय होने का गौरव प्राप्त करते हैं।
ट्रिनिडैड, टोबेगो, फिजी, मौरिशस में आज भी
हज़ारों वर्ष से चले
आ रहे रामायण का वही
ज्ञान, प्रेम
एवं स्नेह-मंत्र अनवरत चला आ
रहा है। आज प्रसन्नता हो रही है कि विश्व के कोन-कोने में
भारत प्रगति के द्वार खोल रहा है।
विदेश में भीड़ में अकेले खो ना जायें, इसके लिये सामाजिक
संस्थाएं मंदिर, देशी पर्व,
त्यौहार, उत्सव
अकेलेपन को अवश्य
दूर करते हैं और व्यक्ति अपने देश से जुडा़ महसूस करता है।
सामुदायिक रेडियो जहाँ भारत पाकिस्तान और बांगलादेश के लोग एक
मंच पर "देसी" बन कर अमेरिका में अपनी पहचान बना पाने में
सक्षम हो पाते हैं। दो
वर्ष पहले, एक नया रेडियो स्टेशन स्थापित
हुआ, "रेडियो सलाम-नमस्ते।" जिसे हर भारतीय ,पाकिस्तानी अपना
रेडियो समझता है ।
जयपाल रेड्डी
जिन्होंने रेडियो स्टेशन की शूरूआत की एक अच्छा
क़दम उठाया कि वीकेन्ड में हर भाषा पर कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाय।
आज इस रेडियो से हिन्दी, उर्दु, तेलुगु,
तमिल, गुज्रराती,
पंजाबी एवं नेपाली भाषा में एक-एक घन्टे का
कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है। हिन्दी की जिम्मेवारी डा.
नन्द्लाल
सिंह
ने ली है, नन्द्लाल जी एवम देव प्रकाश ने कविता पर विशेष
कार्यक्रम
'कवितांजली' की शुरुआत की फ़रवरी,२००७ से डलास शहर
के लिये यह एक नवीन प्रयोग था।
दरअसल 'कवितांजली'
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति द्वारा संचालित
होता है । करीब
४-५ कार्यक्रम के बाद
इसका भार मेरे
कंधों पर सौंप
दिया गया।
याद है पहली बार रेडियो पर मैने गोपाल सिंह
नेपाली जी की कविता "सरिता" जो मुझे बचपन से प्रिय थी सस्वर गाया । लोगों
के फ़ोन से
प्रशंसा मिली और मेरा अनुराग
रेडियो से बढ़ने लगा।
मैं छंदबद्ध कविता पसंद करता हूँ, अतः स्वयं लय बद्धकर प्रसाद, पंत,
महादेवी, दिनकर, निराला की कविताओं
को सस्वर गा कर पाठ करने लगा।
साहित्यकारों में जयप्रकाश
मानस जी की "अपनी बात"
(सॄजनगाथा-संपादकीय)
की बातें
मेरे लिये
पथ का प्रदीप बनी।
ऐसे कार्यक्रम में हमारी यही कोशिश
रही कि विश्व के कोने-कोने से कवि इस मंच पर जुड जायें। इसी
प्रयास में, भारत एंव अमेरिका के कविगण ने काफी सहयोग दिया।
भारत के जिन कवियों ने इस रेडियो कार्यक्रम से अपना काव्य पाठ
किया, उनमें प्रमुख
कुमार विश्वास, सुनील जोगी, राजेश चेतन, ओम
व्यास, पवन
दीक्षित, मनोज कुमार मनोज, दीपक गुप्ता, अर्जुन
सिसोदिया, मनीषा कुलश्रेष्ठ, डाँ कविता वाचकनवी आदि रहे। जबकि
प्रवासी कवियों में: अंजना संधीर, लावन्या शाह, इला प्रसाद,
अभिनव शुक्ल, रेखा मैत्र, प्रियदर्शनी, कुसुम सिंहा, देवेन्द्र
सिंह, अर्चना पांडा, रेनुका भटनागर, सुधा
धींगरा, हरिशंकर आदेश,
डाँ ज्ञान प्रकाश, शशी पाधा, कल्पना सिंह चिटनिस, आदि ने काव्य
पाठ कर इस कार्यक्रम को पुष्पित एंव पल्लवित किया है।
साहित्यकारों में जयप्रकाश मानस (सॄजनगाथा) का समय-समय पर
विशेष योगदान मिला
जिसने के प्रति मेरा सदा आभार-भाव बना रहेगा ।
आज इस कार्यक्रम को सुनने हेतु अमेरिका के
विभिन्न शहरों में साहित्य-प्रेमी प्रतीक्षारत रहते हैं जो
भाषा-समृद्धि हेतु प्रसन्नता
की बात है। अभी हाल में महाकवि आदेश जी ने
पहली बार इस कार्यक्रम को सुना तो अपना अनुभव काव्य में ही भेज
डाला (कुछ पंक्तियाँ यहाँ
प्रस्तुत हैं)-
"गीत में नव प्राण भरता कार्यक्रम कवितांजलि।
विश्व में हर ओर से, हर चोर से कवि जुड़े रहे,
रच रहा इतिहास नूतन कार्यक्रम कवितांजलि।
पुनर्जीवित हो उठे हैं "पंत", "जय शंकर प्रसाद",
नव दिशा दिखला रहा है कार्यक्रम कवितांजलि।
"सॄजन सम्मान" ने मेरी हिंदी सेवा (विदेश में) को अलंकॄत कर
विश्व सामाचार बना
दिया है। धन्य हैं वह लोग और धरती जहाँ आज
भी
साहित्य-संस्कॄति को उचित मान-सम्मान मिल रहा है।
(सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़ द्वारा प्रवासी सम्मान -2008 प्रदान
करने के अवसर पर जारी स्मारिका से)
आदित्य प्रकाश
डैलस, यूएसए
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