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वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। शोध ।।

 

 छठवाँ किश्त

हिंदी लघुकथा का विकास


डॉ. अंजलि शर्मा

 

(लघुकथा हिंदी साहित्य की नवीनतम् विधा है । इसका श्रीगणेश छत्तीसगढ़ के प्रथम पत्रकार और कथाकार माधव राव सप्रे के 'एक टोकरी भर मिट्टी से होता है' । हिंदी के अन्य सभी विधाओं की तुलना में अधिक लघुआकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के ज्यादा करीब है । और सिर्फ़ इतना ही नहीं यह अपनी विधागत सरोकार की दृष्टि से भी एक पूर्ण विधा के रूप में हिदीं जगत् में समादृत हो रही है । इसे स्थापित करने में जितना हाथ लघुकथाकारों का रहा है उतना ही कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, बलराम, आदि संपादकों का भी रहा है । खास कर लघुपत्रिकाओं के संपादकों का । इंटरनेट पर भी सुकेश साहनी जैसे वरिष्ठ लघुकथाकार इसे विश्वव्यापी लोकप्रियता के लिए कटिबद्ध हैं ।

 

हमने अपने प्रिय पाठकों के लिए पहली बार हिंदी लघुकथा के विकास पर किसी शोध ग्रंथ को धारावाहिक रूप से छापने का निर्णय लिया है ताकि इस लघु किंतु गुरुतर विधा से सारी दुनिया के रचनाकार और पाठक भी अवगत हो सकें । हमें खुशी है रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ के शोध छात्रा और हिदीं के प्राध्यापक डॉ. अंजलि शर्मा जी की सहमति से संपूर्ण शोध कृति अंतरजाल पर प्रकाशित हो रहा है, जिस पर उन्हें पी-एच.ड़ी की उपाधि मिल चुकी है । हिंदी अंतरजाल के इतिहास में शायद पहला अवसर है कि कोई शोध कृति धारावाहिक प्रकाशित हो रही है । अभी तक आप भाग 1, भाग 2, भाग 3 भाग 4 भाग 5 पढ़ चुके हैं। पिछले अंकों से आगे पढ़िए - संपादक )

 लघुकथा का क्रमिक विकास

इतिहास कोई आयातित वस्तु नहीं होती और न ही किसी से उधार ली जाती है। आज जो कुछ हम बोलते या लिखते हैं, वही कल का इतिहास कहलाता है। प्रत्येक आगे आने वाली पीढ़ी को अपने पीछे की पीढ़ी से विरासत में एक इतिहास मिलता है, और वर्तमान पीढ़ी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भविष्य की पीढ़ी को एक संपूर्ण इतिहास सौंपती है। इस दृष्टि से से लघुकथा साहित्य की अद्युनातन प्रवृत्ति है, किंतु इसके बीज हमें प्राचीन साहित्य में भी प्राप्त होते हैं। चांद मुगेरी कथन है- लघुकथा कोई नवीन विधा नहीं है, अपितु काल से चली आ रही पौराणिक कथाओं का नवीनीकरण है।

 

आज की लघुकथाओं और प्राचीन काल की लघुकथाओं के दृष्टिकोण में अंतर है। आधुनिक लघुकथाएं पंचतंत्र और हितोपदेश से बाह्य आकार में साम्य हो सकती है, किंतु वैचारिक धरातल पर दोनों में भिन्नता है। पंचतंत्र और हितोपदेश की लघुकथाओं का अविर्भाव आचार्यों द्वारा राजपुत्रों को उपदेश देने के लिये हुआ था । वर्तमान युग की लघुकथा व्यक्ति, समाज, देश दुनिया में क्या हो रहा है इसके क्या कारण है, इसके उत्पन्न कर्त्ता कौन है, अपने दायरे में संपूर्ण माहौल को समेटकर लघुकथा हमें यथार्थ से परिचित कराती है एवं मानव मस्तिष्क को झकझोरकर रख देती है।

 

आज लघुकथा लेखन का मूल उद्देश्य राजनैतिक, सामाजिक, वैचारिक, धार्मिक, वैयक्तिक विसंगतियों, पर संपूर्ण शक्ति से कुठाराघात करना है। आज आम आदमी को दुख दर्द, संत्रास, पीड़ा, घुटन तल्खी आदि का चित्रण करने में लघुकथा  अन्य विधाओं की अपेक्षा आगे बढ़ गई है। सकता है, बावजूद लघुकथा की मानसिकता और ईसप कथाओं की मानसिकता में पर्याप्त अंतर है। पंचतंत्र, वेताल पचीसी या सिंहासन बत्तीसी की कथाएं हिंदू राजाओं राजपुत्रों के लिये राज्याश्रित मस्तिष्क की उपज है, वे जनसाधारण के दर्द का वहन नहीं करती । आज की  लघुकथाएं जन सामान्य की ज़िंदगी के बीच से ही प्रस्फुटित हुई है, अतः वैचारिक दृष्टिकोण से प्राचीन लघुकथा को आधुनिक लघुकथा से जोड़ना उचित नहीं है।

 

यांत्रिक युग की तेज़ी और बढ़ते हुए समय-मूल्यों को देखते हुए लघुकथा  की महत्ता काफ़ी बढ़ जाती है। यूं देखा जाये तो लघुकथा  की अभिव्यक्ति पौराणिक ग्रंथों मं जहाँ-तहाँ होती रही है लेकिन आधुनिक काल में स्वतंत्र रूप से विकसित हो रही है। लघुकथा बड़े आवेशित रूप में प्रकट होती है जिसमें चारों ओर फैली विसंगतियों, भ्रष्टाचारों, राजनैतिक-सामाजिक समस्याओं को एक ही झटके में सामने ला पटकती है। यद्यपि लघुकथा  का कलेवर छोटा है। कही जा रही बात एक ही प्रहार में लपट की तरह झकझोर देती है । खंडित होते-होते आज जीवन कण इतने विखर चुके हैं कि किसी खंड की अनुभूति को पूर्ण मुद्दे से साथ व्यक्त करने के लिये लघुकथा गागर में सागर की कहावत को चरितार्थ करती है, अर्थात् कम समय में अधिक उपलब्धि।

 

लघुकथा ब्रह्माण्ड के विस्तार में सूर्य की उष्णता एवं विशालता नहीं, मेघाच्छन्न आकाश में कौंधी हुई बिजली के समान है, जो मस्तिष्क में एए तीव्र प्रभाव छोड़कर गुम हो जाती हैं। बिजली की कौंध की तरह प्रभाव डालने वाली इस विधा के अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के प्रति हम निराश नहीं है । शिवेन्द्र नारायण जी का विचार है कि हिन्दी गद्य का वर्तमान इतिहास लघुकथा के लेख के बिना नहीं लिखा जा सकता है ।

 

लघुकथा के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत करने के लिये दो स्थूल रुपों में काल विभाजन किया जा सकता है

 

(अ) प्राचीन रूप- लघुकथा के प्राचीन रूप की ऐतिहासिकता को दो कालों में विभाजित किया जा सकता है –

(1) प्राचान काल, (2) मध्यकाल ।

 

(ब) नवीन रूप- लघुकथाओं के नवीन रूप को 3 भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) प्रारंभिक लघुकथाएँ (सन् 1800 से 1900 तक)

(2) विकासोन्मुख लघुकथाएँ (सन् 1900 से 1950 तक)

(3) आधुनिक लघुकथाएँ (सन् 1950 से आज तक )

 

आधुनिक लघुकथाओं को भी अपनी सुविधा की दृष्टि से चार दशकों में विभाजित कर सकते हैं -

(1)   छठवां दशक (सन् 1951 से 1960 तक)

(2)   सातवां दशक (सन् 1961 से 1970 तक)

(3)   आठवां दशक  (सन् 1971 से 1980 तक)

(4)    नवां दशक (सन् 1981 से 1990 तक)

 

प्राचीन काल- लघुकथा के इतिहास की ओर दृष्टिपात करने से हमें ज्ञात होता है कि आज की लघुकथा के बीज प्राचीन काल की ऋग्वेद, उपनिषद, महाभारत, जातक कथाओं में संस्थित है । प्राचीन काल में ऋग्वेद से लेकर अपभ्रंश भाषा तक की लघुकथाओं का विवेचन किया जा सकता है । वैदिक लघुकथाओं को पुराण से ग्रहण किया गया है । ये लघुकथाएँ दृष्टांत प्रधान होती थी, किसी धार्मिक आख्यान की पुष्टि लघुकथा द्वारा की जाती थी । ऋग्वेद की लघुकथाओं में धर्म, नीति, शिक्षा, अध्यात्म, दर्शन प्रधान था । आज की लघुकथाएं समय की माँग को, व्यस्ततम क्षणों को देखते हुए लिखी जाती है, किंतु प्राचीन काल की लघुकथाएं प्रसंगवश लिखी गई थी ।

 

प्राचीन काल की लघुकथाओं में वैदिक युगीन लघुकथाओं को प्रथम सूत्र में पिरोया जा सकता है । इस काल में लघुकथा का जो रूप मिलता है, उसमें आध्यात्मिक, अलौकिक रहस्यों मैत्रियिणी संहिता के 5-1-12 की व्याख्या की गई है । उदाहरण के लिए यह और यमी के संवाद को लघुकथा का रूप मानते हैं-

 

यम मर गया, देवताओं ने यमी को समझाया कि वह उसे भूल जाये, जब भी वे उसे भूलने को कहते तो यमी कहती कि वह आज ही मरा है । तब देवताओं ने विचार किया ऐसे में तो वह उसे कभी नहीं भूलेंगी, हम रात बना लेंगे उस समय के केवल दिन ही होता था, रात नहीं थी, देवताओं ने रात बनायी, दूसरा दिन हुआ । इस प्रकार वह उसे भूल गई । इसलिये लोग कहते हैं, रात और दिन दुख को भूला देते हैं ।

 

 यम और यमी संवाद में लघुकथा के रूप दृष्टिगोचर अवश्य होते हैं, बावजूद इसके इसे हिंदी की लघुकथा  नहीं मान सकते, क्योंकि ऋग्वेद हिंदी में नहीं है। हिंदी की लघुकथा के रूप ऋग्वेद में मिलते हैं। ऋग्वेद में पितृपूजा कथा, दैवी की पूजा आराधना में मंत्र लिखए गये हैं। इन मंत्रों के बीच-बीच में संवाद सूक्त मिलते हैं, जिन्हें सूक्ति कहा जाता है इन छोटी छोटी सूक्तियों में देवी देवताओं के स्तुतिपरक आख्यान मिलते हैं-जैसे अपाला की कथा ऋग्वेद में भी हमें किसी मूलकथा की पुष्टि के लिये अनेक लघुकथा प्राप्त होती है जैसे अपाला की कथा प्रासंगिक कथा के रूप में देखिये-प्रमुख कथासोम रस एवं इंद्र को प्रसन्न करने की बात है, प्रसंगवश अपाला ऋषि की कथा कहीं गई है-

 

स्नान के निमित्त जल की ओर गमन करती हुई कन्या ने इंद्र की प्रसन्नता के लिये सोम को पाया। उसने सोम से कहा मैं तुम्हें सामर्थ्यवान इंद्र के लिये निष्पन्न करती हूँ । हे इंद्र, तुम प्रत्येक घर में जाने वाले तेजस्वी और वीर हो। तुम उक्थों से मुक्त पुहोडाशादिका तथा अभिषुत सोम का सेवन करो। हे इंद्र, हम तुम्हें जानना चाहती हैं। इस समय हम तुमको प्राप्त नहीं करती । हे सोम, तुम इंद्र के लिये धीरे फिर वेग से प्रवाहित हो । वह हमको और अपाला को पूजा के लिये सुंदर प्राणी से संपन्न करें। वह इंद्र हमको अनेक बार धन दें। वह हमें अनेक करें। हम पति द्वारा त्यागी जाने से यहाँ आकर इंद्र से मिले । हे इंद्र, मेरे पिता के मस्तक, खेत और मेरे उदर के पास वाले स्थान इन तीनों को उत्पादन शक्ति दो । मेरे पिता के मरूस्थल रूप खेत पिता के केश रहित मस्तक, और मेरे शरीर को उर्वर बनाते हुए उन्हें रोम वाले करो। वे इंद्र सैकड़ों कर्म वाले हैं। इन्होंने अपने रथ के बड़े छेदों, गाड़ी के छंदों और जोड़ों को अपनयन द्वारा शुद्ध करके अपाला को सूर्य के समान तेजस्वी बना दिया।

(ऋग्वेद भाग-3सूक्त नं. 91)

संपादक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ ऋग्वेद का सूक्ति वाक्य लघुकथा नाम न देने पर भी अपने लघु आकार के द्वारा अपनी पहचान लघुकथा के रूप में कराती है। शतपथ ब्राम्हण में उपदेशात्मक प्रवृत्ति को प्रगट करने वाली गंधर्वों की कथाएं लघुकथा के रूप में मिलती है।

 

उपनिषदों में लघुसूक्तियों के रूप में लघुकथाएँ प्राप्त होती है, जिस प्रकार बाईबिल में ईसाई धर्म की महान सत्ता और ईश्वरीय शक्ति में विश्वास और अविश्वास पर अनेक लघुकथाएँ प्राप्त होती है। उसी प्रकार उपनिषदों में देवी देवताओं की शक्ति परीक्षा, नचिकेता के साहस की कथा, सत्यकाल की गौ सेवा आदि में लघुकथा  का रूप दृष्टिगोचर होता है। जिनमें अध्यात्म, जन्म, मृत्यु मोक्ष, संतोष आदि विषय मुख्य रूप से लिये गये हैं। उपनिषदों के सूक्तियों के पात्र ऋषि, ब्रह्माचारी, राजा पुरोहित आदि के रूप में मिलते हैं। उपनिषदों के आदर्श व शिक्षा के साथ-साथ आध्यात्मिकता औ अलौकिकता का भी प्रधान्य है। शतपथ ब्रह्माण में गंधर्वों की कथा प्राप्त होती है।

 

लघुकथाओं की भी उतनी ही पुरातन परंपरा है, जितनी कथा साहित्य की संस्कृत साहित्य में भी लघुकथाओं का रूप प्राप्त होता है । उदाहरणार्थ श्री मदभगवत जैसे विशालकाय कथानक को एक ही श्लोक में संश्रिप्त रूप से छंद-शिल्प के साथ  बाधा गया है-

आदौ देवकी देवगर्भजन्मं।

माया पूतन जीवताम् हननं, संसादि छेदनम्।।

कौरवादि हननं, कुन्ती सुतम् पालनम्।

ऐताहिद बागवत पुराण कलितम्, श्रीकृष्ण लीलाकृतम्।।

 

रामायण एवं महाभारत में मूल कथाओं को स्पष्ट करने के लिये प्रासंगिक कथाओं का निर्माण किया गया है, तथा मूलकथा में नाटकीयता का समावेश हुआ है । रामायण में मूलकथा श्रीरामचंद्रजी की वीरता तथा उदात्त गुणों की पुष्टि के लिए अनेक कथाएं प्रासंगिक रूप से लिखी गई है, ये लघुकथाएँ लंबी कथा से जुड़ी रहकर भी स्वतंत्र है, उदाहरणार्थ रामायण कालीन न्याय व्यवस्था पर उत्कृष्ट लघुकथा वाल्मिकी रामायण के उत्तरकांड में गिद्धराज और उल्लु की लड़ाई-झगड़े की कथायें मिलती है । प्रासंगिक कथाओं में धनुष यज्ञ, अहिल्या उद्धार, लक्ष्मण परशुराम संवाद, लवकुश संवाद आदि लघुकथाओं के रूप में मिलते हैं । उपरोक्त कथाएं आकार में आज की लघुकथा जैसी नहीं है, किंतु इन संवादों में लघुकथा के आरंभिक स्थिति को नकारा नहीं जा सकता । रामायण जैसे महाकाव्य को एक ही श्लोक में स्पष्ट किया गया है-

आदौ राम तपो वनादि गमनम्, हत्वा मृग कांचनम् ।

बैदेही हरणम्, जटायु मरंण, सुग्रीव संभासणम् ।।

बालि मृदलं, समुद्र तरणं, लंकापुरी दाहनम् ।

पश्चात रावण कुंभकरण हननं, ऐताहिद रामायणं ।।

 

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत में संवादों के माध्यम से लघुकथाओं का रूप दिखाई देता है, जो मूलकथा को स्पष्ट करने के लिए प्रंसगवश लिखी गई है । महाभारत की कथाओं में हमें लघुकथा का रूप प्राप्त होता है यथा- द्रोपदी चीरहरण, युद्धिष्ठिर की धर्म पराणयता, यक्ष युद्धिष्ठिर संवाद, बलशाली भीष्म की कथा, गांडीवधारी अर्जुन की कथा, दानवीर कर्ण, गुरुद्रोणाचार्य की परीक्षा आदि कथाओं में हमें लघुकथा का प्रारंभिक रूप से दिखाई देता है । महाभारत की कथाओं में उस काल की राजनैतिक स्थिति का ज्ञान हमें कथाओं के माध्यम से होता है । उस काल में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ होती है किंतु-अंत में सत्य की ही विजय होती है ।

 

संस्कृत साहित्य के बाद हिन्दी साहित्य में भी तुलसीदास जैसे महाकवि ने एक ओर रामचरित मानस जैसे विशाल ग्रंथ की रचना की इस महाकाव्य में भी हमें लघुकथा के बीज दिखाई देते हैं, रामचरित मानस में शंकर पार्वती संवाद, कागभुसुंडी गरुड़ संवाद आदि इनके उदाहरण हैं । रामचरित मानस के उत्तराकांड में कागभुसुंडी गरुड़ संवाद में पूरे रामचरित मानस को कुछ ही चौपाईयों में वर्णित कर दिया गया है ।

 

प्राचीन लघुकथा  में वेदों से लेकर पुराण तक की कथाओं को ग्रहण किया जाता है, इसमें आख्यान दृष्टांत प्रधान होते थे, और धार्मिक आदर्श को लघुकथा द्वारा संतुष्ट किया गया है । पौराणिक कथाओं में सूर्यवंशीय राजाओं, पर्व महोत्सव, व्रत आदि विषय लिये गये हैं, ये पौराणिक कथाएं धीरे-धीरे मौखिक हो गई जो आज भी दादा-दादी, नाना-नानी के मुख से सुनने को मिलती है । इस पौराणिक मौखिक कथाओं का साहित्य पर दो रुपों में प्रभाव पड़ा-

 

(1) ये पौराणिक कथाएं धीरे-धीरे लोक रुचियों को ध्यान में रखकर लिखी जाने लगी, तथा जनसाधारण की संवेदना को भी इन कथाओं में स्थान दिया जाने लगा ।

(2) इन पौराणिक कथाओं के आधार पर स्वतंत्र रूप से कथाओं  का निर्माण किया जाने लगा ।

 

बुद्ध से पूर्व पर्वतीय अंचलों में घुमक्कड़ जीवन से विरक्त श्री जगदीश काश्यप जी का कथन है- लघुकथा के समर्थक पंचतंत्र, हितोपदेश तथा जातक कथाओं का उदाहरण देकर हिन्दी लघुकथा की महान परंपरा की उद्धोषणा सगर्व कर रहे हैं, हितोपदेश चाहे संसार की अधिकांश भाषाओं में लघुकथा लेखन की दृष्टि से अग्रज भूमिका निभाई हो, लेकिन आज हिन्दी लघुकथा लेखन में पंचतंत्र हितोपदेश की भूमिका धूंधली है ।

 

काश्यप जी के विचारों से मैं पूर्णतया सहमत हूँ, आज की लघुकथा शिक्षा या उपदेश परक नहीं अपितु जीवन के यथार्थ का चित्रण करती है । परंतु यह नहीं कहा जा सकता ही पंचतंत्र या हितोपदेश में लघुकथा के बीज नहीं मिलते । जातक कथाएं बुद्ध के बाद की हैं । इसमें बुद्ध के 547 जन्म का उल्लेख मिलता है । ये जातक कथाएं उपदेशात्मक तथा तलात्मक हैं, इनमें कहीं-कहीं तीक्ष्ण व्यंग्य भी देखने को मिलती हैं ।

 

पंचतंत्र में कथा का प्रारंभ एक सूक्ति से होता है-  ‘एक बनिया व्यापार करने चला । उसके काफ़िले में दो बैल भी थे । एक बैल दलदल में फँस गया । उसे छोड़कर काफिला आगे बढ़ा । बैल का डकराना सुनकर एक शेर गीदड़ों सहित आया । गीदड़ ने शेर की दोस्ती बैल से करा दी और शेर का विश्वास पात्र बन गया, उधर वह बैल के दिल में शेर का डर बैठाता रहा और शेर को बैल की भयंकर चालों से आगाह करता रहा इस तरह बैल और शेर में दुश्मनी करा दी और अंत में शेर बैल को मरवा दिया ।

 

खलील जिब्रान ने हितोपदेश की लघुकथा से प्रभावित होकर अपने लघुकथा लेखन में प्रमुख आधार हितोपदेश को बनाया । हितोपदेश की लघुकथा का उदाहरण देखिये-  ‘एक स्त्री के दो प्रेमी थे । एक दंडनायक था और दूसरा उसका ही पुत्र । एक दिन दंडनायक का पुत्र उस स्त्री के यहाँ बैठा प्रेमालाप कर रहा था, उसी समय उसका पिता भी वहाँ आ गया । इसी स्त्री ने पुत्र को घर में छिपा दिया । थोड़ी देर पश्चात ही उस स्त्री का पति भी आ गया । दंडनायक निकल गया । स्त्री के पति ने अंदर आकर पूछा कि दंडनायक क्यों आया था । तब उस स्त्री ने धैर्यपूर्वक कहना शुरु किया- दंडनायक का झगड़ा उसके पुत्र से हो गया था, उसके पिता के क्रोध से बचने के लिए यह लड़का यहाँ आ गया । उसको मैंने पिछले कमरे में छिपा दिया था । दंडनायक यहाँ आया और किवाड़ इसलिए ही बंद कर लिये कि कही उसका लड़का भाग न जाये और उसे तलाश करने लगा । लेकिन उसे जब लड़का नहीं मिला तो क्रोध करता हुआ बाहर निकल गया ।

इस पर उसका पति-पत्नी की दयालुता एवं उदार ह्रदय पर अत्यंत प्रसन्न हुए ।

 

साधु-सन्यासी छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से शिक्षात्मक उपदेश दिया करते थे । इन्ही कथाओं को बौद्ध तथा जैनियों ने अपने-अपने ढंग से प्रचार किया । बुद्ध की समकालीन कथाएं इतिबुद्धक में संग्रहित है । इन कथाओं में राजाओं, बौद्ध भिक्षुओं, युद्धरत योद्धाओं के चित्र प्रमुख रूप से चित्रित किया गया है ।  जैनकथाओं में तीर्थकरों की कथाएं, डाकुओं व्यापारियों की कथाएं मिलती है । ये कथाएं वैदिक काल की कथाओं की तरह चमत्कार