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जमीं खा गई आसमां कैसे कैसे !
उमाशंकर सिंह
शमशेर
हमारे समय के प्रखर और शीर्षस्थ बौद्धिक आलोचक नामवर सिंह के
प्रिय कवियों
में से एक हैं। अक्सर अपने ऊपर उठाए गए
सवालों या लगाए गए आक्षेपों को शमशेर की एक
काव्य-पंक्ति
'बात
बोलेगी,
हम नहीं'
की मदद से वे
भविष्य की कील पर टाँगते रहे हैं। नामवर
जी के साक्षात्कारों की दूसरी किताब
'बात
बात में बात'
की समीक्षा के मौके पर शमशेर के
उपर्युक्त काव्य-उद्धरण
की अगली पंक्ति दोहराना ज़रूरी समझता हूँ
भेद
खोलेगी,
बात ही'।
अपने जीवन के अस्सी सालगिरह मना चुके
नामवर सिंह के जीवन में इतनी
'बात'
तो हो ही चुकी है कि वह
'भेद
खोल सके।'
बहरहाल यदि हम नामवर जी के मूल्याँकन के
लिए उनके
'जीवन
की बातों'
को दरकिनार कर
'बात
बात में बात'
की बातों को ही आधार बनाएं,
तो भी कहा जा सकता है कि बात ज़्यादा
बनी नहीं।
बातें बहुत ज़रूरी हैं। भारत जैसे समाज
में जहाँ इतने मत और
इतनी धारणाएं हैं,
वहाँ तो
खासकर। नामवर जी जैसे आलोचक तो वाद-विवाद
और संवाद
से ही इतने पैने और नामवर आलोचक बने
हैं।
'बात-बात
में बात'
में कुछ पुराने साक्षात्कार भी संकलित
हैं,
जिसमें उन्होंने कई भावी योजनाओं और
अधूरे प्रोजेक्टों को पूरा
करने का आश्वासन/वायदा
साक्षात्कारकर्ताओं के माध्यम से हिंदी
समाज और पाठकों से किया है,
जो अब तक पूरे नहीं हुए हैं। ग़ालिब के
एक शेर के हवाले से
कहें तो
यह मसाइल-ए-तसव्वुफ़
यह तेरा बयान ग़ालिब
तुझे हम वली समझते,
जो न वादाख्वार होता।
संकलन का पहला साक्षात्कार है'
वाचिक
विमर्श
क्यों?'
इस इंटरव्यू को नामवर जी ने चालाकी से
ख़ुद को पाक साफ साबित करने का एक ज़रिया भर बना लिया है।
नामवर जी अपने बोले हुए को लिखे हुए जितना
महत्तवपूर्ण मानते हैं।
(और
भी कई लोग मानते हैं।)
लेकिन
उनका बोला हुआ अज्ञेय के बोले हुए जैसा
नहीं है,
जिसे सिर्फ़ कॉमा और फुलस्टॉप लगाकर
'लेखन'
बनाया जा सके। नामवर सिंह अपने भाषणों
को कालजयी साबित करने के चक्कर में
अतिवादी हो गए हैं। बकौल नामवर जी
'मेरे
बोले हुए को मौखिक आलोचना को आप लोक-साहित्य
मान लीजिए।'
(पृष्ठ
11)
नामवर जी को
यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि लोक-साहित्य
सभागारों,
सेमिनार हालों और विश्वविद्यालयों में
नहीं,
चौक-चौराहों,
नुक्कड़ों और
खेत-खलिहानों
में
परवान चढ़ता है। नामवर जी भारत जैसे अपढ़
और लगभग निरक्षर समाज में
'बोलने'
को लिखने से
ज़्यादा महत्त्वपूर्ण मानते हैं,
फिर तो नामवर जी को आमसभा करते रहना
चाहिए था। इस साक्षात्कार में नामवर जी
की चालाकी यहीं ख़त्म नहीं होती। अपनी
अतिरंजित आलोचनाओं और कबीर,
मुक्तिबोध,
तोलस्तोय,
लोर्का आदि का तमगा देते रहने को नामवर
जी अपनी सदाशयता से
जोड़ते हैं क़ुछ
बड़ी मुश्किल से हिंदी में लिखने लगे हैं
बेचारे। कुछ दलित हैं,
कुछ पिछड़े वर्ग के हैं। तो उन लोगों को
बढ़ावा देना चाहिए।'
(पृष्ठ
18)
क्या नामवर जी यह बताएंगे कि यह प्रसाद
अधिाकांशत:
सचिवों,
आयुक्तों को
ही क्यूं मिला?
और आलोचना की
यह कैसी क्रांतिकारी परंपरा है?
युवा कवियों की बड़बोली तारीफनुमा आलोचना
कर उन्हें मुगालते में डालने से उन
कवियों और हिंदी कविता का कैसा हित होगा?
नामवर जी जैसे प्रतिबद्ध
(?)
माक्र्सवादी आलोचक आलोचना का पहला
पायदान
'सेल्फ
क्रिटिसिज्म'
को मानते हैं। फिर अपनी भूल,
गलती और भटकावों पर सदाशयता और
(कु)
तर्कों का लबादा क्यूं?
संकलन में कुछ ही साक्षात्कार हैं
जिसमें नामवर सिंह से आँख में
आँख डाल कर बात की गई है। कुछेक
साक्षात्कार तो टी.
वी.
साक्षात्कारों के सस्ते फार्मेट जैसे
लगते हैं,
'सोवियत
संघ का पतन हो गया,
कैसा लग रहा है?'
'हिंदी
आलोचना का भविष्य क्या है?'
मार्का सवालों से लैस। जहाँ साक्षात्कार
कुछ बिंदुओं
और मुद्दों पर केंद्रित हुआ है,
वहीं बात ज़्यादा बनी है। अरुण प्रकाश
द्वारा लिया गया साक्षात्कार
'जीवन
का गद्य,
कहानी और कविता'
से पता चलता है कि नामवर जी ने कहानियां
काफी पढ़ी
हैं। एक तो इसमें कहानियों के बारे में
उनकी आलोचनात्मक सीमा
'कहानी
:
नई कहानी'
के बाद फिर से उजागर हुई है,
दूसरा उनके दबे-छुपे
पूर्वग्रह भी खूब दिखे हैं। शैलेश मटियानी,
पंकज बिष्ट,
संजीव
जैसे कुछ महत्तवपूर्ण कथाकारों का वे
जिक्र तक नहीं करते।
'भारतीय
फासीवाद
:
अर्थतंत्रा और संस्कृति'
अरुण माहेश्वरी,
सरला माहेश्वरी और उदय प्रकाश द्वारा
लिया गया साक्षात्कार है जो
बाज़ार,
उपभोक्ता संस्कृति और फासीवादी खतरों पर
केंद्रित है। नामवर जी बाज़ार के
मार्फ़त पूँजीवादी व्यापकता और विकरालता से व्याकुल
हैं। समाजवादी विचारकों को
होना भी चाहिए। लेकिन नामवर जी बाज़ार
को सिफर्ऋ कोसते हैं। यह नहीं बताते कि यह
पूंजीवाद का स्वाभाविक
(प्राकृतिक
नहीं)
विकास या चरण हैं। कम्युनिस्ट
भविष्यवक्ता नहीं
होता,
लेकिन भविष्यद्रष्टा तो होता ही है।
माक्र्स ने पूँजीवाद के इस विकराल विकास
को
1848
में ही पहचान लिया था
जबकि कम्युनिस्ट पार्टियों ने नहीं
पहचाना। बड़ी कही जाने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों
के पास इस
'संभावित
पूंजीवादी
अंतर्विरोध'
को टैकल करने
लायक न तैयारी है न रणनीति। ऐसे सवाल भी
उनके लिए असुविधाजनक हैं। क्योंकि संसदीय
राजनीति करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों
ने बाज़ार आधृत पूंजीवाद से संघर्ष की
भूमिका लगभग त्याग दी है। जिन
कम्युनिस्ट संगठनों,
ग्रुपों ने उनसे संघर्ष का रास्ता
इख्तियार किया हुआ
है,
उनके बारे में नामवर सिंह
की धारणा शुरू से ही अच्छी नहीं है।
बकौल नामवर सिंह
'नक्सलवादियों
ने कविता का सत्यानाश कर
दिया।'
अजय तिवारी,
अरुण माहेश्वरी और सरला माहेश्वरी
द्वारा लिया गया साक्षात्कार का शीर्षक
है'अस्मिता
की
राजनीति।'
नामवर जी की अस्मितामूलक समझदारी में कई
पेंचें हैं।
सबसे पहले तो उन्हें
'अस्मिता'
शब्द से ही
परहेज है। क्योंकि इससे उन्हें
व्यक्तिवाद और अहंकार की बू आती है। वैसे नामवर जी
के अनुसार उनके सबसे प्रिय कवि
मुक्तिबोध की प्रतिनिधिा कविता
'अंधोरे
में'
का
'मूल
कथ्य है अस्मिता या आइडेंटिटी की खोज;.......जो
आधुनिक मानव की सबसे ज्वलंत समस्या
है।'
(कविता
के नए
प्रतिमान,
पृऋ
221)।
उनके अनुसार बदले हुए
उत्तर-आधुनिक
दौर में
'अस्मिता'
राजनीति की चीज़ हो गई,
(गोया
राजनीति कोई तुच्छ चीज़ हो और वर्ग की राजनीति को कमजोर
करने के षडयंत्रा की उपज हो)
उनके अनुसार एक व्यक्ति की कई अस्मिताएं
वैयक्तिक,
जनपदीय,
धार्मिक,
जातीय,
आर्थिक आदि हो
सकती हैं। इसी तरह समूह की भी अस्मिता
होती है। तो क्या हमें वर्चस्वकारी
समुदायों,
जातियों,
लिंगों की
अस्मिता और राजनीति और उत्पीड़ितों की
अस्मिता संबंधी सामाजिक-राजनीतिक
गतिविधिायों और
राजनीति में फ़र्क नहीं करना चाहिए?
उनके अनुसार
'अस्मिता
बनती है सर्जनात्मक कर्म
से।'
तो क्या अस्मितामूलक
विमर्शों का साहित्य सर्जनात्मक नहीं
है। और अगर है तो उस पर नाक-भौं
सिकोड़ने की नहीं,
उससे अपना रिश्ता परिभाषित करने की
ज़रूरत
है। फिर इसमें वे आगे जोड़ते हैं'
'सच्ची
अस्मिता'
अस्मिता के निषेध से प्राप्त होती है।'
उनके अनुसार
'माक्र्स
सैल्फलैस थे,
लेनिन सैल्फलैस थे। रामविलास जी,
नागार्जुन,
शमशेर सैल्फलैस थे।'
पर सैल्फलैस होने के लिए ज़रूरी है कि
पहले अपना सैल्फ हो। स्पार्टाकस सहित
गुलामों की लड़ाई सिर्फ़ अधिकार और
बराबरी की लड़ाई नहीं थी,
'सैल्फ'
की भी लड़ाई थी। मतलब ये कि
'अस्मिता'
आत्म के निषेध करने में ही नहीं,
'आत्म'
की प्राप्ति में भी है। और यह उसका पहला
और बुनियादी पायदान
है।
रजनी गुप्त द्वारा लिया गया
'स्त्री-विमर्श
की भूमिका'
और लेखक अनुज काशीनाथ सिंह द्वारा लिया
गया
'घर
तो सपना है'
में स्त्री-विमर्श संबंधी नामवर सिंह
की समझ चलताऊ ढंग की है। मसलन
'यहाँ
तो स्त्राी बनाम पुरुष के द्वंद्व और संघर्ष का माहौल है'
से लेकर
'ठूंठ
बौद्धिक विमर्श'
या फिर
'स्त्री-विमर्श,
प्रकारांतर से
'सत्ता
विमर्श'
में तब्दील हो गया
है। स्त्री-विमर्श संबंधी इस सीधो
पूर्वग्रह युक्त विचारों को गद्गगद् भाव से सुनने
के बाद जैसे ही रजनी गुप्त निजी सवालों
से नामवर सिंह को कुरेदती हैं,
वे अपने खोल में सिमट जाते
हैं।
बात बराबर वालों के बीच होती है या उम्र
के अंतर के बावज़ूद
बराबरी के भाव के साथ ही हो सकती है।
उसके बगैर वह भाषण,
प्रवचन,
वक्तव्य कुछ भी हो जाए,
कम से कम बात तो नहीं होगी। इस किताब
में संकलित ज़्यादातर
साक्षात्कारों की सीमा यही है कि वह
नामवर जी को खुदा या सर्वज्ञ मानकर मुख़ातिब
होती है। वास्तव में कोई साक्षात्कार
तभी यादगार साक्षात्कार बनता है जब बात आँख
में आँख डालकर की जाए। ऐसे साक्षात्कार
इसमें कम हैं। इन साक्षात्कारों की दूसरी
बड़ी सीमा इसमें नामवर जी का नहीं खुलना
भी है।
नामवर जी की बड़ी दिक्कत यह है कि वे
अपने लेखन और
आलोचनात्मक टूल्स को अपटूडेट नहीं करते।
वे अपने नीर-क्षीर विवेक से सबका बढ़िया
ग्रहण करते हैं और अनुपयोगी चीज़ों को
छोड़ देते हैं। इसी कारण वे एमिल,
जोला,
लुकाच और ब्रेख्त के यथार्थवाद की
विभिन्न अवधारणाओं को एक साथ
सराह पाते हैं। अलग-अलग
प्रसंगों में माक्र्स,
लेनिन,
सार्त्र,
नीत्शे,
ब्रेख्त,
लुकाच आदि से
अपनी बात को पुष्ट करते और आगे बढ़ाते
हैं। अंत में व्यक्ति और आलोचक नामवर सिंह की
सबसे बड़ी समस्या,
मेरी निगाह
में उनका लगातार अविश्वसनीय होते जाना
है।
साक्षात्कार की इस किताब से नामवर जी का
रेंज पता चलता है।
नामवर जी ने बहुत कम लिखा है। उनके भाषण
मंच लूटू प्रवृत्ति और मजबूरी के कारण एक
सीमा से आगे नहीं जाते। ऐसे में ये
साक्षात्कार उनके अल्प लेखन की क्षतिपूर्ति
है,
मुआवजा है। और इसीलिए ये
महत्त्वपूर्ण भी है। उनके पढ़ाकूपन,
गहरी बौद्धिकता के साथ-साथ
ये साक्षात्कार उनकी प्रचुर
(अफलीभूत)
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