|
कला-यात्रियों
के पदचिन्हों की पहचान
नंदकिशोर तिवारी
अक्सर
हम कलाओं पर बातचीत करते हैं। इस बात-चीत में कला का शिल्प
वैधिध्य ही केन्द्र में रहता है। कलाकार का उल्लेख प्रसंगवश
कभी-कभार ही हो पाता है। इस तरह कलाकार के कला को प्राप्त करने
के संघर्ष और जिज्ञासा का भाव और कला
विशेष में
सिद्धत्व प्राप्ति की एकांत साधना का रहस्य प्रेरणा प्रदान
करने के साथ कला के अन्तर्निहित राग का भी उद्घाटन करता है। इस
तरह कला के शिल्प की विविधता के साथ कला के लिए किए गए जीवन से
संघर्ष के रहस्य को जानना ही कला के मर्म तक पहुँचना है।
इस बात को समझने
में इसी पुस्तक के दो प्रसंगो को लें। सुश्री तीजनबाई पूर्व
प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से बातचीत में कहती हैं
पंडवानी
सुनाती हूँ, महाभारत नहीं कराती।
और, श्री देवदास
बंजारे कहते हैं कलाकार
की भाँति जीवन के अंतिम सांस तक मंच पर डटा रहूँ।ญญ
सुश्री तीजनबाई
के कथन को अभिधा के अर्थ में ही लेना उनके साथ अन्याय करने
जैसा होगा। वस्तुतः सुश्री तीजनबाई महाभारत की कथा को पंडवानी
से जुड़ना पसंद
करती है। पंडवानी
की कलाकार का
पंडवानी से अपने
को जोड़ना और
पंथी के कलाकार
का जीवन के अंतिम साँस तक अपनी कला का प्रदर्शन करते रहने की
प्रबल इच्छा कला के प्रति उनकी रागात्मक एकाग्र निष्ठा को
जाहिर करता है। यही निष्ठा सिद्धत्व प्राप्त करने का मूल मंत्र
है और, यही कला और कलाकार के बीच रिश्ते का अधार भी है ।
संस्कृति
के प्रतिचिन्ह
पुस्तक उपरोक्त कथन का साक्षी है। इस पुस्तक में कुल 9 अध्याय
हैं। इन 9 अध्यायों में छत्तीसगढ की कलाओं, वाद्य, गायन,
रंगमंच, चित्रकला, मूतिकला, काष्ठ कला, अभिनय और इन कलाओं को
जन-जन तक पहुँचाने में सक्रिय आर्ट गैलरियों का परिचय प्रस्तुत
किया गया है। इन सभी कलारूपों के ख्यातनाम कलाकारों के जीवन
संघर्ष के साथ कला का सुख प्राप्त करने,
उनके निजी प्रसंगों को पाठकों तक पहुँचाने का श्रम साध्य
प्रयास इस पुस्तक की खास उपलब्धि है।
शास्त्रों में
अग्ने नय
सुपथा राये
का मंत्र आता है । अग्नि की तरह सुपथ का अनुसरण करना चाहिए।
कला की साधना अग्निपथ पर ही चलना है। कला-यात्रियों के
पदचिन्हों का अनुसरण जीवन और जगत के सत्य से साक्षात्कार करा
सकता है। कुल मिलाकर यही सत्य अंचल विशेष की अस्मिता की पहचान
भी बन सकता है। इसी तथ्य की ओर इशारा करती पं. आसिफ इकबाल की
यह पुस्तक अर्थवान हो उठी है। लेखक आसिफ़ इकबाल ठीक ही कहते
हैं कि
चकाचौंध के इस दौर में भी ये कलाकार आज तमाम उपलब्धियों के
बावजूद इनाम, इकराम व प्रशस्ति से दूर कला सृजन को अपना मिशन
मानते हुए कला यात्रा को जारी रखे हुए हैं। इस
पुस्तक में छत्तीसगढ़ के ऐसे चुनिंदा कलाकारों से सीधा
साक्षात्कार संकलित है, जिन्होंने छठवें दशक से कला-क्षेत्र
में अपनी विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान बनाई है, वहीं कुछेक कलाकार
ऐसे भी हैं जिन्होंने नवें दशक से कला परंपरा को आगे बढ़ाने
कदम रखा है। इनमें से अनेक कलाकार बहुख्यात नाम हैं तो कुछ ऐसे
भी हैं जो अपनी कला की खास पहचान व मौलिकता से जनमानस
में
जगह बनाने में सफल हुए हैं।
नंद किशोर तिवारी
संपादक,
लोकाक्षर
विप्र सहकारी
मुद्रणालय, बिलासपुर, छ.ग.
◙◙◙
|