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लघुकथा का वर्तमान
सी.आर.राजश्री
रचना
जीवन की अभिव्यक्ति है और जीवन का प्रवाह ही रचना का प्रवाह
है। कुछ ही दशक हुए लघुकथा एक नई विधा के रूप में उभर कर हमारे
सम्मुख आई हैं। मन के भावों के साथ विचारों को सुगठित करके
बाहृ और अंतर्जगत के साथ तालमेल बिठाकर,
शब्दों के चमत्कार से समकालीन विषयों पर
अपना कलम चलाना लधुकथा की विशेषता है। हर विधा में लेखक के लिए
विषय चयन से अभिव्यक्ति तक की यात्रा काफी रोचक और चुनौतीपूर्ण
है। रचनाकार जीवन से किसी भी अनगढ़ घटना को उठाता है और उसमें
अपना दृष्टिकोण और अनुभव मिलाकर कल्पना के सहारे सुन्दर रचना
का रूप देता है।
राजनैतिक विडंबनाओं और व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर सामाजिक
जीवन तक के हर किस्से लधुकथा के विषय बन सकते है। बहुत सी
लघुकथाएँ संभावनाओं के अनुसंधान में कहानी का रूप ले लेती है।
हमारे पंचतंत्र,
हितोपदेश, जातक
कथाएँ पहले से लोगों का दिल जीत चुके हैं। इसी तरह की
प्रेरणात्मक कहानियाँ मानव को सदैव प्रेरित करती है।
लघुकथा की विशेषता उसकी
लघुता
की है। लघुकथा की लघुता
के विषय में कई मतभेद है। लघुकथा की संक्षिप्तता केवल उसका
लघुआकार ही नहीं बल्कि उसमें समाविष्ट प्रभावात्मकता भी है।
लघुता होते हुए भी कथा की मूल संवेदना अपने आप में पूर्ण होती
है। साथ ही लघुकथा हमारे अंशात्मक या खंडात्मक जीवन की
संवेदनाओं को प्रस्तुत करती है।
किसी भी रचना की जान भाषा होती है। हर
लेखक अपनी रचना में भाषा के द्वारा पहचान बनाता है। पाठकों पर
मनोनुकूल प्रभाव पड़ने केलिए भाषा में सरलता,
बोधगम्यता,
सहजता, संप्रेषणीयता का होना बहुत
ज़रुरी
है। भाव संवेदना लघुकथा की खासियत होती है। वह विषयवस्तु से,
प्रतिबिंबित युग से,
पात्रों के चित्रण से,
निरूपित तथ्य से,
जुड़ी भाषा,
संवेदना है। भाव संवेदना के साथ,
भाषा संवेदना अपने आप आ जाती है। रचना को सशक्त बनाने केलिए
भाषा के साथ उचित शैली का भी होना ज़रुरी
है। शैली संबंधी मुख्य मुद्दा यह नहीं कि कौन सी शैली अपनाई गई
है,
पर यह देखना ज़रुरी
है कि किस प्रकार की शैली से कथा प्रभावशाली बनती है। भाषा का
सरलीकरण चयनित शैली से भी ज़्यादा
महत्वपूर्ण है।
लघुकथा में गंभीर तथा उपेक्षित तथ्यों का उध्दाटन होता है और
उसका उद्देश्य सामाजिक,
धार्मिक,
राजनैतिक विसंगतियों पर प्रहार करना है। लधुकथा के कथ्य
वर्तमान के तीखे यथार्थ
से जुड़ना चाहिए। पाठक को बाँधें रखने के लिए उचित स्थलों पर
प्रभावोत्पादक शब्दों का प्रयोग बहुत ज़रुरी
है। इसके साथ-साथ शीर्षक एवं उसका वैचारिक पक्ष लघुकथा में
श्रेष्ठता प्रदान करता है। यह बात सौ फ़ीसदी
सच है कि रचनाकार की निजी विचार,
जीवन दृष्टि,
उसकी रचना प्रक्रिया को प्रभावित करती है। साथ ही कथानक,
विषय-वस्तु के अनुसार लघुकथा को रोचकता और
स्थिरता मिलती है।
मैं अपनी पठनीयता के आधार पर कह सकती हूँ कि
कुछ जाने माने समकालीन लघुकथाकारों के नामों
में जगदीश कश्यप,
भगीरथ, रमेश
बतरा, बलराम,
कमल
चोपड़ा,
सतीश दूबे,
कमलेश भारतीय, रूप देवगुण,
सतीशराज पुष्करणा,
सुकेश साहनी,
अशोक भाटिया,
डॉ. महेन्द्र ठाकुर, सरोज द्विवेदी, डॉ. राजेन्द्र सोनी,
जयप्रकाश मानस, रवीन्द्र कंचन,
रूपसिंह चन्देल,
सतीश राठी,
आदि
उल्लेखनीय है।
आज के संदर्भ
में लघुकथा का विशिष्ट स्थान है। इसमें निहित रोचकता,
लघुता, कथावस्तु,
कथा को प्रभावशाली बनाती है। समय का अभाव,
व्यस्त जीवन,
अकेलेपन, कुंठा,
जीवन के प्रति निराशा,
ईष्या, द्वेष
आदि के बीच घिरा आज का मानव लघुकथा को पढ़कर आश्वासन
पाता है। छोटी-छोटी कहानियाँ कार्यस्थल या घर पर मिलनेवाले
अवकाश के समय आसानी से पढ़ी
जा सकती
है। मेरे ख्याल से बड़ी कहानियों का सार संक्षेप में देने या
शाश्वत सत्य को उध्दाटित करने की मानसिकता आज की लघुकथाओं की
प्रेरणा लगती है।
मैं इस लधुकथाओं के सरोवर में रचानाकार और कवि नागार्जुन
द्वारा लिखी छोटी-छोटी असंकलित कहानियों पर आपका ध्यान आकर्षित
करना चाहूँगीं।
ज्ञानी कहानी इस विषय पर प्रकाश डालता है कि सदाचार ज्ञान से
भी बड़ा होता है। इसमें एक साधू बहुत ही ज्ञानी था और अपने
विनम्रता के कारण सबके आदर का पात्र बना हुआ था। एक दिन हलवाई
के
दुकान
के पास जाकर उसने एक इमरती उठा ली,
पर हलवाई कुछ नहीं बोला। उल्टा वह बहुत खुश
था कि साधू
की कृपा उसके दुकान
पर पड़ी। दूसरे दिन आकर फिर उस ज्ञानी ने एक बालूशाही उठा ली।
तब उस हलवाई की
भौहें
तन गई और वह उसे गुस्से से देखने लगा। हलवाई ने हिम्मत करके
कहा,
बाबा यदि मिठाई खानी हो तो खरीद कर खा
लीजिए। फिर तीसरे दिन जब उस ज्ञानी ने मोतीचूर लड्डू पर हाथ
रखे तो चिल्लाकर हलवाई ने कहा, चोर
कहीं का, बड़ा साधू बना फिरता है,
करतूत तो देखो। चोरी के इल्ज़ाम
में न्यायाधीश
के पास उसे पेश किया गया। मिठाई चुराने की बात को कबूल करते
हुए साधू ने विनम्र होकर कहा कि,
मैं यह जानना चाहता था कि लोग मेरा आदर
मेरे विद्वान होने के कारण करते हैं या अच्छी चाल चलन के लिए।
अब मुझे विश्वास हो गया कि सदाचार ही ज्ञान से बड़ा है। सदाचार
की महिमा को प्रकट करने वाली यह कथा इहुत सुन्दर है। बच्चों के
कोमल मन में सदाचार की बीज को बोने के
लिए यह कथा अति प्रेरणा दायक है।
उसी प्रकार पाटनदेई
जानी मानी राजा रानी की पुरानी कथा होने पर भी हमें यह सीख
देती है कि बुराई करने और सोचने वालों का अंजाम भी बुरा ही
होता है। राजा की पहली पत्नी की मृत्यु,
पहली पत्नी की बेटी पाटनदेई की परवरिश,
राजा की मजबूरी,
सौतेली माँ का पाटनदेई पर अत्याचार,
सौतेली माँ का पाटनदेइ के प्रति सुंदर हाने के कारण ईष्या,
पाटनदेई की माँ द्वारा मदद,
अपनी कुरूप बेटी के खातिर विवाह में
चालबाजी, अंत में पाटनदेई की खुशी
आदि का सुंदर चित्रण किया गया है।
एक अन्य कथा विधाता का वरदान में ऊँट विधाता से वरदान स्वरूप
लंबी गर्दन की माँग करता है। अपनी भलाई की वजह से माँगा गया
वरदान ही उसके लिए अभिशाप का कारण बन जाता है। कई कष्टों का
सामना करते हुए मज़बूरी
की वजह से उसकी मृत्यु हो जाती है। अपनी बेवकूफ़ी
के कारण हमें कई परेशानियाँ हो सकती है,
अत: सोच-समझकर
काम करने की प्रेरणा देने वाली यह कथा प्रभावशाली है।
सी.आर.राजश्री
हिन्दी विभाग,
डॉ.जी.आर.दामोदरन विज्ञान महाविद्यालय
सिविल एरोड्रोम पोस्ट,
अवनाशी रोड़,
कोयम्बत्तूर,
तमिलनाडू
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