vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। हलचल ।।

 

 

भूमंडलीकरण के दौर में पुस्तक की भूमिका विषय पर सेमीनार

 

दिल्ली। भूमंडलीकरण  के दौर में प्रकाशन जगत् भी उसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा है। एक ओर पुस्तक का संसार व्यापक होने की बात कही जा रही है तो दूसरी ओर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से हर हाथ में सगर्व से रहनेवाली पुस्तक अब पाठक से दूर होती जा रही है। ज्वलंत सवाल यह भी है कि पुस्तक को पाठक तक उसकी रुचि के अनुकूल बनाकर कैसे पहुँचाया जाए। पुस्तक आज भी घर के बिस्तर से लेकर सफ़र तक मनुष्य का सच्चा साथी है और उसकी भी समाज को सुसंस्कृत, सुसभ्य और संवेदनाशील बनाने में एक अहम् भूमिका है। उसे एक प्रॉडक्ट का लेबल दिए बिना समाज के उस आदमी तक पहुँचाया जाए जो सही और सच्चे अर्थों में उसकी माँग रखता है। 9 फरवरी को आलेख प्रकाशन के तत्वावधान मे भूमंडलीकरण से पुस्तक-प्रकाशन जगत् पर पड़ने वाले प्रभाव से उठते सवालों पर भूमंडलीकरण के दौर में पुस्तक की भूमिका विषय पर एक सेमीनार का आयोजन किया गया । दो सत्रों के इस सेमीनार के विषय थे- बदलती दुनिया बदलता पाठक तथापुस्तक को लोकप्रिय कैसे बनाया जाए?’

 

विकासशील देशों में प्रकाशन बहुत अच्छी स्थिति में -  डॉ. निर्मला जैन

सेमीनार के उद्घाटन के अवसर पर सुप्रतिष्ठित शिक्षाविद् एवं आलोचक डॉ. निर्मला जैन ने कहा कि ग्लोबलाइजेशन की चमक-दमक से हर वर्ग प्रभावित हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से ख़तरे भी हैं, पर निराश हो जानेवाली स्थिति नहीं है। पुस्तक आज भी समाज का अभिन्न अंग है। उन्होंने कहा कि विश्व में भारत के बढ़ते प्रभाव से हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। अमेरिका, यूरोप के अलावा विश्व के अन्य देशों मे हिंदी भाषा और साहित्य को पढ़ाया जा रहा है। जिन विश्वविद्यालयों में हिन्दी को पढ़ाया जाना बंद हो गया था वहाँ पुनः कोर्स शुरू कर दिए गए हैं। विकासशील देशों में भी प्रकाशन व्यवसाय बहुत अच्छी स्थिति में है।

 

 भूमंडलीकरण से पुस्तक का विश्व बाज़ार में विस्तार - नुज़हत हसन

उद्घाटन सत्र की अध्यक्ष एवं नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया की निदेशक नुज़हत हसन ने विश्व में लगे पुस्तक मेलों के अनुभवों को बताते हुए कहा कि विदेशों में भारतीय लेखकों के कितने प्रशंसक हैं ? वहाँ भारतीय पुस्तकों की माँग है। भूमंडलीकरण से पुस्तक का विश्व बाज़ार में विस्तार हुआ है और प्रकाशकों को एक मौक़ा मिला है कि वह विश्व पटल पर अपनी पुस्तकों का एक बाज़ार बना सकें। इधर यह भी देखने में आया है कि प्रवासी भारतीय लेखकों की अपनी पुस्तकों को हिंदी में छपवाने की होड़ लगी है। पुस्तक को तो पाठक खरीद कर ही पढ़ता है, अगर पुस्तक अच्छी है और दाम भी वाज़िब हैं तो पाठक उसे भी हाथों-हाथ लेता है। उद्घाटन सत्र का संचालन लेखक एवं कवि सुरेश यादव ने किया ।

 

 सिर्फ साहित्य की पुस्तकों का प्रकाशन करने से काम नहीं चलेगा - रत्नाकर पांडेय

बदलती दुनिया बदलता पाठक विषय पर आयोजित सत्र के अध्यक्ष रत्नाकर पांडेय ने कहा कि आज के वैज्ञानिक समाज में सिर्फ साहित्य की पुस्तकों का प्रकाशन करने से काम नहीं चलेगा। ज़रुरत इस बात की है कि समाज किस तरह की पुस्तक चाहता है। उसके विषय के अनुकूल ही पुस्तकों का प्रकाशन होना चाहिए।

 

बढ़ती क़ीमतों से सच्चे पाठक दूर - ओम विकास

इलेक्ट्रॉनिक मंत्रालय के निदेशक ओम विकास ने कहा कि पुस्तकों की बढ़ती क़ीमतों ने उसको उसके सच्चे पाठकों से दूर कर दिया है।  जबकि छोटे शहरों और कस्बों के पाठकों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने कोई खास प्रभावित नहीं किया है। पर उन तक पुस्तक पहुँच नहीं पा रही है।

 

बाल भवन की पूर्व निदेशक मधु पंत ने कहा कि  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया  और कंप्यूटर ने सबसे अधिक बाल-मन को प्रभावित किया है। ज़रुरत इस बात की है कि बच्चों के लिए ऐसा साहित्य प्रकाशित किया जाए जो उन्हें संवदेनशील और कल्पनाशील बनाए। भूमंडलीकरण के इस दौर ने बच्चों की दुनिया बदल दी है। वे दोहरी मानसिकता के शिकार हो रहे हैं। लघु उद्योग मंत्रालय के निदेशक हरीश आनंद ने कहा कि बदलते समय में केवल उत्कृष्ट साहित्य ही समाज में अपना स्थान बना पाएगा। अब निम्न स्तर के साहित्य का प्रकाशन बंद होना चाहिए । पाठक बदला नहीं है बल्कि उसकी रुचि के अनुकूल पुस्तकें नहीं बन पा रही हैं। पत्रकार ज्योतिष जोशी ने कहा कि आज पत्रकारिता निरुद्देश्य हो गई है, उसी परंपरा में साहित्य को जाने से रोकना होगा। पूस्तकों का प्रकाशन सोद्देश्य होना चाहिए । दिल्ली विश्वविद्यालय मे रीडर पूरनचंद टंडन ने कहा कि बदलते समय के अनुसार पुस्तकों का प्रकाशन किया जाना चाहिए। इस सत्र का संचालन केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के सेवानिवृत्त प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी ने किया।

 

 बच्चों में पुस्तकों के पढ़ने के संस्कार डालने होंगे - मृदुला गर्ग

पुस्तक को लोकप्रिय कैसे बनाया जाए सत्र की अध्यक्षता करते हुए सुप्रतिष्ठित लेखिका मृदुला गर्ग ने कहा कि बच्चों में पुस्तकों के पढ़ने के संस्कार डालने होंगे। विडंबना यह है कि हिंदी समाज के लोक भी बच्चों में अँगरेज़ी का वर्चस्व बना रहे हैं। हिंदी के प्रति उनकी रुचि कम हो रही है। बच्चों में पढ़ने की की रुचि डालने का काम अभिभावक और शिक्षक को मिलकर करना होगा। स्कूलों मे भी हिंदी भाषा के ज्ञान के अलावा साहित्य को भी अलग से पढ़ाने की व्यवस्था की जानी चाहिए । बच्चों से कहानी सुनाने को अनिवार्य बनाना चाहिए। लेखक महेश दर्पण ने कहा कि पुस्तकों को जनोपयोगी बनाकर मनुष्य की चेतना से जोड़ा जाना चाहिए। इससे प्रकाशन जगत में एक भ्रष्टाचार पनपा है और पुस्तकों की क़ीमतें बढ़ा दी गई हैं। पुस्तकों को सस्ते मूल्य पर छाप कर पाठकों तक पहुँचाया जाए। समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रभाव से पठन-पाठन कम हुआ है। विडंबना यह भी है कि 50 करोड़ हिन्दीभाषी क्षेत्र में 50 हजार भी ऐसे लोग नहीं है जो साहित्य और पुस्तकों से जुड़े हों। जबकि हमारे समाज में बहुत बड़ा ऐसे वर्ग भी है जो अभी निरक्षर है।

 

 पुस्तक अब भी एक संभावना है - शेरजंग गर्ग

सुप्रसिद्ध लेखक शेरजंग गर्ग ने कहा कि पुस्तकों को पाठकों तक पहुँचाने के रास्ते बनाने होंगे। पुस्तक अब भी एक संभावना है। आवश्यकता इस बात है कि कर्मठता के साथ एक आस्था और संकल्प लिया जाए। पुस्तकों को लोक तक पहुँचा कर उसे लोकप्रिय बनाया जा सकता है। लेखक-प्रकाशक विकास नारायण राय ने कहा कि सस्ती, आकर्षक और समाज की रुचि की किताबों को छोटी बस्तियों तक पहुँचाने के सार्थक परिणाम सामने आए हैं। हरियाणा को एक संस्कृति-विहीन प्रदेश के नाम से प्रचलित किया गया है जबकि वहाँ साहित्य की किताबों की अच्छी खासी बिक्री हो रही है।

 

दूरदर्शन में प्रोड्यूशर अमरनाथ अमर ने कहा कि रचना में अगर आम आदमी से जुड़े संस्कार होंगे तो उसकी माँग बनी रहेगी। अपने सामाजिक सरोकारों के कारण ही कबीर दास आज भी जन-जन में व्याप्त हैं। वरिष्ठ लेखक से.रा. यात्री ने कहा कि पुस्तक को पाठकों तक पहुँचाने के लिए कारगर कदम उठाने होंगे। संगोष्ठी के संयोजक उमेशचंद्र अग्रवाल ने कहा कि पुस्तक को लेकर पाठक, लेखक और प्रकाशक के बीच संवाद होना चाहिए तथा आज के पठक की माँग के अनुरूप आधुनिक विषयों पर पुस्तकें लिकी जानी चाहिए। इस सत्र का संचालन कथाकार बलराम अग्रवाल ने किया।

 (दिल्ली से अवधेश श्रीवास्तव)

 

 ◙◙◙

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google