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पं.
चिरंजीवी दास स्मृति व्याख्यान माला संपन्न
रायगढ़।(छत्तीसगढ़)
पं. चिरंजीवी दास ने संस्कृत साहित्य से निरंतर संवाद करते हुए
रचनात्मक रूप से अपनी साहित्य यात्रा पूरी की। संस्कृत की
रचनाओं की जिस तरह से उन्होंने अपने समय की भाषा में अनुवाद
किये हैं उससे ही लगता है कि संस्कृत की रचनात्मकता का एक
स्वरूप अनुवाद के माध्यम से भी आ सकता है तो दूसरी नई रचनाओं
के माध्यम से।
छठवें पं. चिरंजीवी दास स्मृति व्याखान माला को संबोधित करते
हुए संस्कृत साहित्य के उद्भट विद्वान तथा साहित्य अकादमी से
पुरस्कृत कवि राधावल्लभ त्रिपाठी ने
‘संस्कृत
में समकालीन सर्जना’
पर व्याख्यान देते हुए आगे कहा कि समकालीन सर्जना पर इस आयोजन
में व्याख्यान देते हुए इसलिए भी प्रसन्नता हो रही है क्योंकि
इस तरह की चर्चा के माध्यम से तथा इस विषय पर बोलकर मैं पं.
चिरंजीवी दास को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकता हूँ।
राधावल्लभ त्रिपाठी ने इस मौके पर संस्कृत के सुविख्यात कवि
तथा विद्वान पं. सदाशिव दास का स्मरण करते हुए कहा कि वे
रायगढ़ के ही थे तथा यहाँ राजसभा में भी रहे तथा वे पं.
चिरंजीवी दास के चाचा थे। पं.
सदाशिव दास की कविताएं देखकर हम मानते हैं कि वे एक बड़े
रचनाकार थे पारस्परिक ढंग की कविताएं तो उन्होंने कहा कि आपके
शहर में पं. सदाशिव दास को इस रूप में कितने लोग जानते हैं। इस
तरह से संस्कृत के महत्त्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा
कि सदियों से संस्कृत हमारी संपर्क भाषा रही है तथा वह हमारी
चेतना में निरंतर कहीं न कहीं मौजूद रहती हैं।
व्याख्यान माला के इस छठवें अनुष्ठान की अध्यक्षता करते हुए
सुविख्यात कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि राधावल्लभ शायद अकेले
ऐसे विद्वान हैं जिन्होंने संस्कृत जैसी कुलीन भाषा को एक
आधुनिक धर्मनिरपेक्ष तथा लोतांत्रिक स्वरूप दिया । उसे
जनपक्षधर बनाया । आपने संस्कृत को सर के बल खड़ा किया।
रचनाशीलता की कोई भाषा नहीं होती। वह किसी भी भाषा में लिखी जा
सकती है। राधावल्लभ ने संस्कृत साहित्य की जो लोक परम्परा है
तथा उसकी जनवादी तथा धर्मनिरपेक्ष परम्परा से जुड़ी जो रचनाएं
हैं उसका अनुवाद किया है। हम चाहेंगे कि समकालीन सर्जना जो
संस्कृत में हो रही है और संस्कृत की आज जो ज्वलंत परम्परा है
उसका भी वे अनुवाद कर उससे हमें लाभान्वित कराएं।
चिरंजीव दास की 87 वीं जयंती के अवसर पर संस्कृति विभाग के
सहयोग से चिरंजीव दास स्मृति व्याख्यान माला एवं एकल काव्यपाठ
के अंतर्गत विगत 21 जनवरी को छठवें अनुष्ठान के शुभारंभ सत्र
में प्रातः हिन्दी के शीर्षस्थ कवि मंगलेश डबराल ने अपनी कविता
संग्रह-पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते है और
आवाज़ भी एक जगह है से चुनचुन कर कविताएं सुनाई। काव्यपाठ-सत्र
की अध्यक्षता करते हुए कवि-आलोचक प्रभात त्रिपाठी ने मंगलेश की
कविताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि मंगलेश हमारे समय के
अप्रतित कवि हैं। वे सभ्यता के धमासान को आत्मानुभाव की भाषा
में लिखते हैं । उनकी कविताएं हमें अपनी स्मृतियों में झाँकने
का अवसर देती हैं।(हर
किशोर दास की रिपोर्ट)
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