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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। हलचल ।।

 

 

रायपुर में लघुकथा पर पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

सृजन-सम्मान का शानदार आयोजन


छत्तीसगढ़ अब साहित्य का भी गढ़ - केसरीनाथ त्रिपाठी

 

रायपुर । छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 16,17 फरवरी दो दिन का सृजन-सम्मान कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह एक सुनहरा ऐतिहासिक स्मरणीय कुंभ रहा जहाँ पर विश्व के कई दिशाओं से साहित्यकार भाग लेकर लघुकथा की विषय-वस्तु, उसके शिल्प, कला-कौशल, आकार-प्रकार, वर्तमान और भविष्य की बारीकी को जानते और परखते रहे। कार्यक्रम का आगाज़ 16 तारीख मुख्य अतिथि श्री केसरीनाथ त्रिपाठी के हाथों दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ । साथ में मंच की शोभा बढ़ाते रहे थे जाने-माने आलोचक व लघुकथा के प्रथम व्याकरणाचार्य श्री कमल किशोरे गोयनका, विशिष्ट अतिथि थे फिराक गोरखपुरी के नाती, वरिष्ठ कवि व छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक श्री विश्वरंजन, श्री विश्वनाथ सचदेव, संपादक नवनीत, मुंबई से, श्री मोहनदास नैमिशराय, मेरठ से, सुश्री पूर्णिमा वर्मन, शारजाह से, श्री कुमुद अधिकारी नेपाल से, श्री रोहित कुमार हैपी न्यूजीलैंड से,श्रीमती देवी नागरानी, न्यू जर्ज़ी से, और सृजन-सम्मान के अध्यक्ष व पूर्व शिक्षामंत्री श्री सत्यनारायण शर्मा

 

मुख्यअतिथि श्री दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि पहले कभी साहित्य का गढ़ इलाहाबाद और दिल्ली हुआ करता था । सृजन-सम्मान ने विगत 6 आयोजनों और अपनी सतत् क्रियाशीलता से छत्तीसगढ़ और रायपुर को साहित्य का गढ़ बना दिया है ।

 

लघुकथा पर पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विमर्श

 

लघुकथा पर विमर्श की शुरुआत हुई लघुकथा: विषय वस्तु और शिल्प की सिद्धि नामक सत्र से। इस सत्र के अध्यक्ष रहे कमल किशोर गोयनका, मोहनदास नैमिशराय, रमेश दत्त दूबे । बीज वक्तव्या देते हुए जयप्रकाश मानस जिन्होंने विस्तृत रूप से लघुकथा को हर एक कोने से रौशन करते हुए कहा "लघु और कथा एक दूसरे के पूरक हैं। लघुता ही उसकी प्रभूता है। लघुकथा जीवन के एकांत का साक्षात्कार है।" गद्य और शिल्प निजी व्यहवार है और लेखक का परिचय भी। वक्तगण अपने-अपने दृष्टिकोण से आलोचना पर कहीं समर्थता और कहीं असमर्थता का इज़हार करते रहे।

 

पूर्णिमा वर्मन ने कहा कि तीन पीढ़ियाँ यहाँ एक साथ बैठी है श्री केसरीनाथ , गोयनकाजी, विश्वानाथ सचदेव जिनको पढ़ते-पढ़ते हम बड़े हुए। हैप्पी जी, कुमुद अधिकारी आने वाली पीढ़ी की नींव को पुख़्तगी से बढ़ा रहे हैं। शिल्प सीधे रचनाकार की अपनी है। लघुकथा अपना संदेशा पाठक तक पहुँचा पाए यही उसकी सफलता है।"

 

श्री राम पटवा ने कहा कि " लघुकथा का महत्व उसकी लघुता में है जो वह कथा को प्रदान करती है। लघुकथा सिर्फ़ बोध की बात नहीं करती, आपकी सारी चेतना को भी झिंझोड़ कर रखती है। छोटी बात से बड़े अर्थ पाए जायें यह एक ख़ासियत है।" केसरीनाथ त्रिपाठी: के शब्दों में "कविता, लेख, लघुकथायें, आलोचनायें सब हिन्दी भाषा की धारायें है। लघुकथा का आयाम अब विस्तृत हो रहा है और उसकी लोकप्रियता बढ़ रही है।"

 

कमल किशोर गोयनका ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा " इतना बड़ा सम्मेलन पहली बार इतने बड़े पैमाने पे आयोजित करने की कल्पना का साकार स्वरूप एक महान उपलब्धि है। हमारे समाज की गरिमा को जीवित रहने का यह एक सफल प्रयास है।"

 

दूसरे विमर्श (लघुकथा का वर्तमान)में करनाल से आए हुए अशोक भाटिया ने अपने बीज वक्तव्य में रोचक लघुकथाओं के द्वारा लघु कथा के वर्तमान का जायज़ा लिया । उनका मानना था "रचना वही है जो हमारे साथ-साथ यात्रा करे। रचनाकार में अगर संवेदना नहीं है तो उसकी रचना में जान नहीं आ सकती।"

 

सुकेश साहनी जी के शब्दों में " रचनाकार का अपना एक चिंतन होता है, साहित्य तो बहता हुआ पानी है जो अपना रास्ता खुद तय करता है।" लघु कथा की इस धारा का संचालन कर रहे थे रामेश्वर कंबोज़ हिमांशु ।

 

विमर्श के अंतिम सत्र में(17फरवरी) लघुकथा का भविष्य और भविष्य की लघुकथा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ इस सत्र में देवीप्रसाद वर्मा, बलराम अग्रवाल, चितरंजन खेतान, सुकेश साहनी, डॉ. रामनिवास मानव, हरिप्रकाश वत्स, गिरीश पंकज, राम कुमार आत्रेय, डॉ. जयशंकर बाबु, सुभाष चंदर, नवल जायसवाल, आलोक भारती, निरंजन शर्मा, माया, रोहित कुमार हैप्पी, राजेश चौकसे, सतीश उपाध्याय, राकेश पांडेय, डॉ. हरिवंश अनेजा, एकु घिमिरे, डॉ. मीनाक्षी जोशी आदि ने अपनी बात रखी ।

(देवी नागरानी, न्यू जर्सी की रिपोर्ट)

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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