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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

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।। शोध ।।

 

 

धारावाहिक-2

दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता


 डॉ. सी. जय शंकर बाबु

 

ह युवा और लगनशील साहित्यकार डॉ. सी. जयशंकर बाबू की शोधवृत्ति का ही परिणाम है कि दक्षिण में हिंदी पत्रकारिता ने जो दिशा तय की उसका सम्यक मूल्याँकन संभव हो सका । श्री बाबु के इस कठिन और चुनौती भरे उद्यम से पूर्व में किये गये शोधों, रचे गये ग्रंथों की मान्यताओं को नया विस्तार मिला है । यह अब तक का सबसे महत्वपूर्ण और विश्वसनीय शोध कृत्ति इसलिए भी कहा जाना चाहिए क्योंकि अब से पहले लिखे गये किताबों में जाने-अनजाने कई हिंदी सेवियों की पत्रकारिता तक पहुँच संभव न हो सका था । कृति दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता के नये और चौंकाने वाले तथ्यों का प्रामाणिक दस्तावेज है कि दक्षिण की हिंदी भक्ति कहीं भी उत्तर भारत से कम नहीं । दक्षिणवासी होकर भी डॉ. बाबु युगमानस जैसी हिंदी लघु-पत्रिका के संपादक के रूप में हिंदी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के एक युवा सेतु के रूप में चर्चित हैं । उनका यह शोध कार्य वैश्विक स्तर पर सभी पाठकों के लिए पहली बार सृजनगाथा में धारावाहिक प्रकाशित की जा रही है । पिछले अंक में आपने पढ़ा - भाग-1 । भाग-2 यहाँ प्रस्तुत है  - संपादक

 

1.1.पत्रकारिता की अवधारणा

पत्रकारिता आधुनिक सभ्यता की देन है । मानव समाज के विकास क्रम में कई साधन-तंत्रों का उद्घाटन हुआ ।  उनमें से कुछ साधन-तंत्र ऐसे भी थे, जो आगे चलकर मानव की बौद्धिक परिपक्वता के प्रतीक के रूप में साबित हुए हैं । ऐसे साधन-तंत्रों में पत्रकारिता एक प्रमुख तंत्र है ।

     

मानवीय तथा सामाजिक भावनाओं के विकास से साथ-साथ मानव समाज में विचार-विनिमय की आवश्यकता बढ़ती गई । इसी क्रम में सूचनाओं का महत्व भी बढ़ गया । सूचनाएँ उपलब्ध कराने के साधन के रूप में पत्रकारिता का उदय हुआ था । मानव समाज के सार्थक अस्तित्व के लिए एक अनिवार्य तथा महत्वपूर्ण साधन-तंत्र के रूप में अंकुरित होने के बाद उसकी क्रमिक प्रगति भी हुई। वैज्ञानिक उन्नति के साथ-साथ पत्रकारिता से संबद्ध अन्य कई साधनों, प्रणालियों तथा प्रौद्योगिकी में विस्मयकारी खोज एवं आविष्कारों के कारण पत्रकारिता आज विकसित स्थिति में है ।

     

व्यष्टि से समष्टि की ओर मानव का जैसा-जैसा भावनात्मक विकास हुआ, उसी क्रम में एक सुदृढ़ सामाजिक व्यवस्था सामने आई । आरंभ में सीमित सदस्यों के समाज में सूचनाओं का आदान-प्रदान मौखिक रूप से आसानी से हो जाता था । कालांतर में विभिन्न माध्यमों द्वारा सूचनाएँ प्राप्त करने के प्रयास भी हुए । इसी क्रम में भाषा का विकास, लेखन का प्रचलन, मुद्रण का आविष्कार और विकास तथा समाज में सदस्यों की संख्या में वृद्धि के साथ ही एक ऐसे तंत्र की आवश्यकता महसूस हुई, जो लिखित अथवा मुद्रित रूप में विशाल जनसमुदाय को सूचनाएँ उपलब्ध करा सकता हो । आवश्यकता आविष्कार की जननी मानी जाती है । मानवीय चेतना और बुद्धमत्ता के योग से एक सशक्त तंत्र के रूप में पत्रकारिता का उदय हुआ । पत्रकारिता के अंतर्गत पत्र-पत्रिकाएँ ही नहीं बल्कि पत्रकारिता की अवधारणा के आधार पर अभिकल्पित व्यवस्थाओं से भी आज मानव समाज के लिए अपेक्षित सूचनाएँ उपलब्ध हो रही हैं । पत्रकारिता का आज इतना विकास हुआ है कि वह बड़े पैमाने पर विभिन्न आयामों में मानव की सूचना-संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति कर रही है ।  पत्रकारिता आधुनिक मानव समाज की अनिवार्यता बन गई है ।

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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