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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

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।। पत्रिका।।

 

 

धरती को पढ़ते हुए


जयप्रकाश मानस

 

ज के दुःखदायी समय में भले ही स्मरणभ्रंशता की लाख उपयोगिता हो पर वह अपने अतीत को एकबारगी अपनी मनीषा से ओझल भी करती है । स्मरणभ्रंशता के बाद मनुष्य के चरित्र में जो सबसे ख़तरनाक पहलू यदा-कदा जागृत हो जाता है, वह है – अपनी कथित संपूर्ण संवेदनशीलता के बाद अपने समय के नायकों को जानबूझकर बिसार देना । इधर साहित्य में भी यह स्थायी भाव बन चुका है । उस साहित्य में जहाँ हम अपनी पंरपरा के आलोक में वर्तमान को रचने का दावा करते हैं । और वर्तमान ही क्यों समूचे भविष्य यानी वर्तमान के समानांतर एक नये स्वप्निल दुनिया को रचने के लिए अपने समय, अपने युग, अपनी आबादी, और अपने वैचारिक तंत्र का आवाहन करते हैं ।

 

आज की सबसे बड़ी चुनौती है कि हम अपने उज्ज्वल अतीत के प्रति लगातार लापरवाह और उसे अनुपस्थित मानकर बिसारने के आदी होते चले जा रहे हैं । यहाँ यह भी कहना प्रसंगोचित होगा कि तथाकथित आधुनिकता और प्रगतिशीलता ( ग़लत अवधारणा वाले पाठों को आत्मसात करने के कारण) के धुंध में हम अपनी वरिष्ठ पीढ़ी को भी एकबारगी नकारने पर आमादा है । ऐसे जटिल और प्रायोजित संस्कार वाले सांस्कृतिक गढ़न की लय में यदि हम अपनी सयानी पीढ़ी को याद करते हैं तो उसे वरेण्य कहा जाना चाहिए । वरेण्य और वरीयता की श्रेणी मे ऐसे उद्यमों की शिनाख़्तगी किये बगैर सामयिकता और समकालीनता की परख बेमानी होगी । व्यक्तिगत तौर पर मैं एक सहृदय और सचेत पाठक के रूप में भाई शैलेन्द्र चौहान को फ़िलवक्त याद करना चाहता हूँ जिनकी बदौलत मेरे द्वारा पढ़ी जानी वाली सामग्री की (नीर-क्षीर विवेक और सामान्य पाठक के स्वाद के परित्याग के बाद पत्र-पत्रिकाओं की लंबी फ़ेहरिस्त में से चयनित) अंतिम सूची में धरती नामक लघुपत्रिका का 13 वाँ अंक अगली पंक्ति में समादृत है । और इसके लिए रचनाकार  शलभ श्रीराम सिंह की कवितायी और रचनात्मक उर्जस्विता के साथ-साथ श्री चौहान की साहित्यिक निष्ठा भी प्रणम्य है।

 

शताधिक लघु-पत्रिकाओं और हमारे भ्रष्ट आलोचकों, समीक्षकों की मान्यतानुसार कथित राष्ट्रीय पत्रिकाओं (चाहें तो आप इसमें वागर्थ, ज्ञानोदय, हंस, कथादेश, आदि-आदि सभी को गिना सकते हैं) के नामों को एक सिरे से नकारते हुए जब मैंने जब हर माह की तरह पठनीय पत्रिकाओं की सूची तैयार किया तो इन सबमें धरती कहीं आगे निकलती हुई प्रतीत हुई । फ़िलहाल में धरती के तेरहवें अंक के गिरफ़्त में हूँ । किसी लघु-पत्रिका का एक कामकाजी पाठक को अपने छवि-वृत मे घेर लेना कम बात नहीं है ।

 

यह दीगर बात है कि इस अनियतकालीन पत्रिका के संपादक शैलेन्द्र चौहान संप्रेषण के माध्यम से कुछ रचनाकारों (वे जिन्होंने इस अंक में अपने समय के महत्वपूर्ण काव्य-हस्ताक्षर शलभ जी पर कुछ कहते हैं...) की दुहाई देते हुए स्पष्ट करते हैं कि अब इसके आगे मुझे क्या कहना है ?” सच तो यह है कि उन्हें कहना चाहिए कि शलभ जी को पढ़ने का मतलब यह भी हो सकता है कि हम उन्हें पढ़कर कबीर को किसी अन्य देह में देख सकते हैं । और यह भी कि नजरुल जैसी क्रांतिचेतना का पुनर्पाठ करने के लिए हमें शलभ के समीप जाना ही चाहिए ।

 

जो भारतीय और ख़ासतौर पर हिंदी कविता में शलभ जी के हस्तक्षेप को को अपनी संपूर्ण पाठकीय ईमानदारी से से समझ नहीं सके हैं उनके लिए यह अंक देर-आयद दुरुस्त आयद की तरह पठनीयता जुटाने वाली सामग्री के साथ उपस्थित है। शलभ की कई छवियाँ हैं – एक शायर की छवि फिर नवगीतकार की छवि, और अंत में ताउम्र कविवर की छवि ।

 

भूमिका आज उस तरह से गायब हो रही हैं जिस तरह से गधे के सिर पर सिंग । गधे का सिंग नहीं होता पर किताबों, विशेषांकों और पत-पत्रिकाओं में यदि भूमिका(संपादकीय) न हो तो उसे क्या कहें । या तो संपादक केवल सामग्री जुटाकर सिर्फ़ एक प्रकाशक की योग्यता वाला है या फिर वह इतना बड़ा तोपचंद है कि वह सबको अंडरइस्टीमेट करने में योग्य है । यह सुखद है – मेरे लिए कम से कम - कि शैलेन्द्र जैसा विद्वान एवं अपने मित्रों से निरंतर संपर्क पर विश्वास करने वाला कवि-आलोचक न केवल भूमिका में अपनी गहरी ऊँचाईयों के बाद विनम्रता से कहता है कि शलभ जी से कुल ज़मा चार बार मिलने के बाद भी वह उनके होने का मतलब बूझ सकता है । वह इस पर भी अपने कर्तव्यों की इतिश्री नहीं समझता, एक उत्सुक और पूर्वज की उपादेयता को पूरी तरह तरजीह देते हुए एक और लेख इसी अंक में लिखते हुए कहते हैं कि – बिना मार्क्स के फ्रायड तो पूरा है किन्तु बिना फ्रायड के मार्क्स अधूरा क्योंकि किसी फ्रायडवादी को मार्क्स का दामन पकड़ने की ज़रूरत कभी नहीं पड़ी मार्क्सवादी फ्रायड का दामन पकड़ना  ज़रूरी क्यो हुआ ? (निगाह दर निगाह : औरत, कुदरत और बगावत – पृष्ठ - 107) आप इसे यूँ भी समझ सकते हैं कि शलभ की शायरी को पूरी तरह समझने के लिए वे एक सूत्र भी हमारे सम्मुख रख देते हैं ।

 

पत्रिका में शलभजी की उन बहुचर्चित कविताओं को पढ़ने का आस्वाद भी उपलब्ध है, जिसके लिए शलभजी शलभ नहीं है जो क्षणभर में नश्वरता की शिकार हो जायें, किसी अन्य सामान्य कवि की तरह। यहाँ हम कुल ज़मा 20 महत्वपूर्ण कविताओं को एक साथ वर्षों बाद पढ़कर उन्हें संग्रहित करने का मोह संवरण नहीं कर सकते हैं ये हैं – नया धरती का गीत, दिल्लियाँ, एक दिन, एक दुनिया समानांतर, हमारी धरती कहाँ है, सिक्कों से लड़ा जाने वाला युद्ध, संपादक की ख़ैर नहीं, सहसा, अनपेक्षित स्थिति का गीत,त आदमी की खोपड़ी, बीत जायें हम, सुर्ख आँच एक, राग-बोध, सुबह, प्यार, छूट जायेगा नगर यह, घर का रास्ता भूल गया मैं, रास्ता है, देश, नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम ।

 

ये कवितायें मात्र संग्रहणीय सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उसे किसी लघुपत्रिका के संपादक ने अपनी आलोचनात्मक विवेक से चयनित किया है, बल्कि इसलिए भी कि ये ऐसी कवितायें हैं जिनसे शलभ जी की रचनाधर्मिता और कुछ हद तक उनके व्यक्तित्व को कम पृष्ठों की उलट-पलट के बाद भी उनके होने के समग्रता में समझा जा सकता है । वहाँ देश-राग है, रास्ता है, अनपेक्षित स्थिति का गीत भी है । और क्या चाहिए एक संघर्षशील आदमी के लिए । प्यार की बात करें तो हम कह सकते हैं – प्यार था, यानी अँधेरे में कौंधता, छाया की तरह धूप में, सावधान करता, राहों के ख़तरों से बार-बार । राह भी कैसा ? बिल्कुल ऐसा – इसी जंगल में है रास्ता । वहाँ जहाँ से उड़ी है अभी कोई चिड़िया । ज़ाहिर है ऐसी चिड़िया उस भूगोल में उन्मुक्त उड़ान नहीं भर सकती है, जहाँ टैंकों की गड़गड़ाहट हो, फौजियों के क़दमताल हो, और बमवर्षकों की सरसराहट और मिसाइलों की सन्-सन् के ऊपर उड़ते झण्डे हों । ऐसे में भी यदि कवि विश्वास के साथ कहे – हाथ के इशारे से/बुला रही है कब से /रंग भरी धूप/और/इठलाती हुई हवा/जीवन हूँ मैं, मेरे साथ आ ! तो मनुष्यता को घनघोर विपदाओं के बाद भी बचाये जाने की पुरज़ोर कोशिश की उम्मीद की जा सकती है । और इसी उम्मीद के साथ शलभ को भविष्य में भी पढ़ा जाता रहेगा ।

 

पाठकों को शलभ के व्यक्तित्व और कृत्तित्व तक प्रत्येक पहलुओं तक पहुँचाने वाले चुनिंदे आलेख हैं जिसमें चेतना के नव संस्कार की कविताएँ (विजय बहादुर सिंह), कविता के अकाल में शलभ (विद्याधर शुक्ल), भविष्य के ख़तरों से आगाह करता कवि (जयनारायण) और शीर्षकों के ख़िलाफ़ एक शीर्षकः शलभ श्रीराम सिंह (एस.आनंद) आदि को लेखकों की रचनाकार को लेकर गहरी समझ और संपृक्तता के साथ बाँचा जा सकता है । यूँ तो रामनिहाल गुँजन केशव, बृज श्रीवास्तव, अलीक के संस्मरण से गुज़रकर शलभजी को उनकी सामाजिकता के साथ एक बार महसूसा जा सकता है पर अभिज्ञात के लेख में जिस तरह विविध प्रसंगों का रम्य लेखा-जोखा दिया गया है वह उनके कवि चरित्र और वैचारिक निष्ठा को भी खोलने में महत्वपूर्ण बन पड़ा है । संपादक शैलेन्द्र चौहान का आलेख निगाह दर निगाहः औरत, कुदरत और बगावत बोनस लेख है जो शलभ की शायरी का सम्यक मूल्याँकन भी है । वस्तुतः आज के बहुत सारे आलोचक शायरी (ग़ज़ल आदि) को हीन दृष्टि से देखते हैं । वैसे उन्हें नई कविता (पता नहीं अब क्या नया है वहाँ) के अलावा कुछ न तो दिखाई देता है न ही वे अपने कथित आलोचना के बल पर उसे परख सकते हैं । आलोचक शैलेन्द्र इसमें अपवाद हैं । इस अपवाद के पीछे मात्र शलभ से आत्मीय संबंध की उत्प्रेरणा हो तो मेरी बातों को आप यही ख़ारिज़ कर सकते हैं। ख़ासतौर पर जिनकी साफ़गोई भी देखी जा सकती है जो कहते हैं – मैं सोचता हूँ शलभ से पहले उन अव्वल दर्ज़े के शायरों को देखा जाये जो इस क्षेत्र में काफी कुछ कर गये हैं, कर रहे हैं । सरदार अली जाफ़री, मजाज, जोश और साहिर के सामने शलभ दोयम दर्ज़े के ही शायर साबित होंगे । (प्रकाशकीय पुकार के संदर्भ में)

 

पत्रिका की सादगी गंभीर पाठकों के लिए आकर्षण का कारण है । मूल्य भी सामग्री के अनुरूप है। एक अच्छी पत्रिका के रूप में धरती का स्वागत होना चाहिए, पर इसी विश्वास के साथ कि ऐसी पत्रिकाओं की निरंतरता बनी रहे । अब यह अलग बात होगी कि पाठकों को भी ऐसी पत्रिकाओं को ख़रीदकर पढ़ने की हिम्मत जुटानी होगी । वरना पत्रिकाओं की निरंतरता के लिए केवल संपादक ही उत्तरदायी नहीं होता ।

पत्रिकाःधरती

संपादकः शैलेन्द्र चौहान

मूल्यः 20/-

संपर्कः 34/242, प्रतापनगर, सेक्टर-3, जयपुर-302033

  जयप्रकाश मानस

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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