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सपनों के अनवरत संघर्ष का
साक्ष्य
डॉ.
मृणालिका ओझा
सृष्टि
स्वयं सृजन का परिणाम है। इस असीम सौंदर्यमयी सृष्टि के सृजेता
का सृजन किसने किया होगा,
यह एक अनुत्तरित प्रश्न है। अपनी अपनी
समझ-सीमा की परिधि में इसके विभिन्न उत्तर हो सकते हैं। सृजन
ने मनुष्य को वर्तमान की सामान्यता से हमेशा ऊपर ही उठाया है।
अबोध शिशु के ''मम्म''
शब्द-सूजन पर पूरी प्रकृति का वात्सल्य उमड़
पड़ता है। अनेक अभिक्षित नयी सुबहों की रौशनी से माँ की ऑंखे
चमक उठती हैं। सृजन कच्ची मिट्टी के गिलावे का हो या अनायास
खींचे गये वलय का, वह शून्य से
ब्रम्हाण्ड तक की असीमता को सहेज कर हथेलियों पर रख देता है।
अपरिचित कौत्ुहल से खींची वक्र रेखायें कहीं जीवन रेखा के साथ
थिरकती हुई लक्षित होती हैं, तो
कहीं सीधी धारदार रेखा के सृजन के लिए लंबी साधना भी करनी पड़ती
है। साधना द्वारा किया गया सृजन विशिष्ट रूप् से सम्मानित होता
है।
गहन आपाधामीमय वर्तमान में स्वार्थ की चकाचौंध के कारण बहुत से
दृश्य ऑंखों के समक्ष होकर भी अदृश्य होने लगते हैं। साधक
इन्हीं दृश्यों को सावधानी पूर्वक पकड़ता है। विभिन्न क्षेत्र
के साधकों के लिए यह वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है। इस चुनौती
को अहम् र्कत्त्व्य के रूप स्वीकारना,
युग की विद्रूपता से लोहा लेना है। सफलता
पूर्वक यही कार्य विगत नौ वर्षों से संपादित करती आ रही है एक
संस्था -''सृजन-सम्मान''
संस्था द्वारा प्रतिवर्ष साहित्यिक
'सृजन'
के सम्मान में अनेक विधाओं एवम् क्षेत्रों
में पुरस्कार दिए जाते हैं। वृहत् स्तर पर अनेक साहित्यिक
आयोजनों के अतिरिक्त साहित्यिक रचनाओं का प्रकाशन भी किया जाता
है। इसी क्रम की एक कड़ी ''सपने
जिनकी ताबीर नहीं होते'', कृतिकार
'शम्स तनवीर'
की कृति इस वक्त मेरे हाथों में है।
मनुष्य अपनी सांसों से बेखबर होता है। हम नहीं सोच पाते कि
सांसों में ठंडापन क्यों है,
गर्माहट क्यों और तिलमिलाहट क्यों है?
सांसों और हमारे बीच एक अपरिचित शाश्वत
रिश्ता है। जब यही सांसे शब्दाकार होकर हमारी हथेली में आ
बैठती है तब हमें अहसास होता है, कि
वे कबसे हमारे भीतर तिलमिला रही थीं। सारा वायुमंडल यदि किसी
खूशबू से तरबतर हो तो भी लोगों को फुरसत कहाँ,
यह जानने के लिए कि किस आंगन के किस पौधे
के फूल की खूशबू है यह? पर यही
खुशबू जब अपनी पहचान बना लेती है,
ऑंगन का पता सबको मालूम होता है।
जीवन के कंटकाकीर्ण मार्ग में क्षत-विक्षत सपने सहेजते हुए कवि
वर्तमान के सच को दो टूक शब्दों में उजागर करता है-
''फिर भी दिखाए जाते हैं सपने,
लाखों की भीड़ में
बहलाए और फुसलाये जाते हैं,
बताये और समझाये जाते हैं,
सपने।''
टुकड़े टुकड़े सपनों को सहेजते लोगों के श्रम-सीकरों से भीगे हुए
शब्द पाठक को बहुत कुछ सोचने के लिए विवश करते हैं-
ये ही लोग उसे ढकेल कर,
पूरब से पश्चिम करते हैं
पृथ्वी को घुमा कर,
दिन को रात करते हैं।
इन सपनों को आकार तभी मिलता है जब कोई इन्हें खाक में बदलने
वाली लपटों को अस्तित्वहीन करने की हद तक समर्पित हो।
पुरातत्व के संदर्भ में इसी तथ्य को कवि ने सुकोमल शब्दों में
अभिव्यक्त किया है-
''किंतु
नहीं मिलती उन लोगों की अस्थियां
पर वे होंगे ही कहीं,
नींद के घाट उतारे हुए
सोये हुए किसी उपजाऊ ज़मीन के अंदर''
कवि ने सामाजिक व्यवस्था के नकली मुखौटे को उतार कर उसकी
भीषणता से साक्षात्कार भी कराया है-
''वह समुद्र सिमट कर,
अपनी गहराई की तरफ बढ़ने लगा
लहरें भंवर में बंध कर,
छुपने लगी अतल में,
कुछ अस्फुट आवाज़ में बोलने लगीं,
कुछ सहमी-सहमी मछलियाँ
खामोश,
लोक नायक आया है।''
और इस भयानकता का अंतर्राष्ट्रीय
'स्वरूप'
भी कवि नज़र अंदाज नहीं कर सका-
''बस तुम कहते रहो वही,
जो कहते रहें हम।''
''एलेन
क्या देखा था तुमने'' एक उत्कृष्ट
रचना है। विकास की ढिंढोरा पीटते देशों के कथनी व करनी के बीच,
एक प्रश्न -चिन्ह बनकर खड़ा यथार्थ है-
''जो चिल्लाती है,
ऐ लोगों,
पाँच साल की मेरी बेटी ले लो,
बेटी ले लो,
रोटी दे दो।''
कवि की लेखनी लोक जीवन से अस्पर्शित भी नहीं है। कवि ने भूख की
कँटीली सेज पर झपकियाँ लेते पलकों के भीतर जाकर निहारा है,
जहाँ जठराग्नि को किस्से-कहानी के शीतल
छीटों देकर भभकने से रोकने का प्रयास किया जाता है। निश्चय ही
शब्द-संयोजन एवं शैली, साहित्यिक
साधना के प्रतिफल हो सकते है किंतु संवदेनशीलता केवल मानवता और
प्रेम की धरती पर ही उपजती है। आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग,
संवदेनशीलता को केवल शब्दों तक ही सीमित
रखता है। व्यवहार में स्वार्थ का दानव इसे कुचलता हुआ आगे बढ़
जाता है, और क्षत-विक्षत मनुष्यता
घिसट रही है-
और हम देखते नहीं
जिनके शब्दर बोलते नहीं,
पूर्व विराम बोलता है।
यह पूर्ण विराम पाठक को ठिठकने को विवश करता है,
आत्म-निरीक्षण के लिए विवश करता है,
और यही किसी रचनाकार की लेखनी के लिए
आनंदोत्सव का क्षण होता है। ''चामुंडी-हिल''
भी अपना प्रभाव देर तक बनाए रखती है। इस
रचना के झरोखे के इस पार आम आदमी की दृष्टि से 'मैसूर'
को बहुत साफ-साफ देखा जा सकता है।
कवि ने जीवन को दोधारी तलवार के रूप में भी भेगा है। दो धरों
के बीच लहू-लुहान,
क्षत-विक्षत भावनाओं के साथ भी वह हर आने
वाले सूरज की राह देखता है, वह थका
नहीं ह। सपने बिकते हैं- कुछ दूसरों के सपनों को आबाद करने के
लिए कुछ दूसरों के सपनों को बर्बाद करने के लिए। सपनों के बीच
भी हैं सपनों का सुनहले सपनों का सच इसी अनवरत संघर्ष का साथी
होता है। इस घमासान में भी कवि संवेदनशीलता को अपने कलेजे से
लगाये अपनी लेखनी से न केवल सपने बुनता है बल्कि उसमें प्राण
फूंकने का संकल्प करता है, और अंतत:
अब ये वे सपने हैं, जिनकी ताबीर है-
''मेरे सपनों के साथ,
ताबीर मुफ्त मिलती है।''
इस काव्य-संग्रह को पढ़ने के बाद पाठक,
लेखक की लेखनी से आकार लेती आगामी कृतियों
के सुनहरे सपने देखने से नहीं चूकता।
डॉ. मृणालिका ओझा
रायपुर,
छत्तीसगढ़
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