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वैदिक युग से समकालीन समय
की यात्रा
डॉ. प्रकाश
डॉ.
महेशचन्द्र शर्मा संस्कृत भाषा,
साहित्य और संस्कृति के उत्तरोत्तर विकास
के अध्येता होने के साथ इस महादेश की श्रेष्ठ सांस्कृतिक
परम्परा को जानने-समझने की व्यापक जिज्ञासा भी जगाने की क्षमता
रखते हैं। 'संस्कृति के चार सोपान'
पढ़ते हुए संस्कृति और संस्कृति के उन
शिखरों से साक्षात्कार होता है, जो
हिमालय की तरह सुन्दर, शुभ्र और
श्रेष्ठ हैं। डॉ. शर्मा उनकी तलाश करते हुए वैदिक युग से लेकर
समकालीन समय तक यात्रा करते हैं। इस तलाश में वे विदेश की ओर
भी जाते हैं। 'भारतीय संस्कृति की
विदेश यात्रा' विदेश में स्वदेश की
अनुभूति के साथ उन लोगों से मिलने का सुअवसर प्रदान करती है,
जो लन्दन में रहते हुए ज़्यादा भारतीय जान
पड़ते हैं। वहाँ ऑक्सफोर्ड के इंडियन कल्चर इंस्टीटयूट की
उद्धाटन शिला पट्टिका में वास्तुपूजन की तिथि व अतिथि का वर्णन
के विद्वान जिस प्रशंसा भाव के साथ भारतीय संस्कृति पर चर्चा
करते रहे, उसे देखकर और सुनकर इस
देश की महान सांस्कृतिक परम्परा के विषय में यह उक्ति सार्थक
जान पड़ी सा प्रथमा संस्कृति: विश्ववारा। जर्मनी में रामनवमी पर
शिवकथा हो या मेलबोर्न में वैदिक शान्तिपाठ,
वहाँ के श्रीकृष्ण मंदिर में गीता श्रवण का
आनन्द हो या दक्षिण अफ्रीका के डर्बन विश्वविद्यालय के युवा
संस्कृत प्राध्यापक से रामकथा पर बातचीत भी भारत के 'वसुधैव
कुटुम्बकम्' की भावना से संयुक्त
दिखलाई पड़ती हैं। रूस के महान् भारतीय प्रवासी का अभिभूत हो
उठना स्वाभाविक है। समाधि पर अंकित है- 'हम
चाकर रघुवीर के, पढयो लिख्यो दरबार,
तुलसी अब का होहिंगे नर के मनसबदार।'
धन्य हैं तुलसी और
रामचरितमानस में रच-बस जाने वाले विदेशी विद्वान
वारान्निकोव्ह।
संस्कृति के चार सोपान हैं- अनादि अनन्त
संस्कृति,
वैदिक चिंन्तन,
हमारे आलोक पुरुष एवं पर्व प्रसंग तथा शिक्षा और संस्कृति।
ज्ञान, प्रकाश,
तेज, दिव्यता और
भव्यता के प्रतीक अर्थ में हैं 'भा'(=प्रतिभा
+ रत = भारत)। फारसियों ने सिन्धु को कहा हिन्दु और यूनानियों
ने कहा सिन्धु को इण्डस् । इससे प्रवर्तित हुआ हिन्दुस्तान और
इंडिया। भरत से बना भारत। धर्म,
अर्थ काम और मोक्ष बने चार पुरषार्थ। धर्म सब परसवोपरि । कर्म
सिद्धान्त पर आधारित जीवन। पूर्व संचित कर्म ही भाग्य है। कर्म
के अनुसार ही फल की प्राप्ति होती है। वर्ण चार हैं-ब्राम्हण,
क्षत्रिय, वैश्य
और शूद्र। आश्रम भी चार हैं-ब्रम्हचर्य,
गृहस्थ,
वानप्रस्थ और संन्यास। वैदिक धर्म समग्र मानवीय धर्म का आधार
है। वेदों में प्रकृति को ही ईश्वर मानकर उसकी स्तुति में लिखी
गयी ऋचाएँ हैं। उपनिषदों में ज्ञान की चर्चा है। ब्राम्हण
ग्रंथों में कर्मकाण्ड की। उपनिषदों की संख्या 108
है, लेकिन दस
उपनिषद् प्रमुख माने जाते हैं। उनके नाम हैं ईश,
केन, कठ,
प्रश्न, मुण्ड,
माण्डूक्य और
तैत्तिरीय आदि। उपनिषदों में जीवन के सारभूत तत्वों के विषय
में गम्भीर प्रश्न और उनके उत्तर हैं। मनुष्य की अनन्त
जिज्ञासा इनमें मिलती है ।
भारतीय साहित्य में प्रमुख चार गुण तत्व हैं।
आध्यात्म से अनुप्राणित है। भारतीय साहित्य। राष्ट्रभक्ति और
लोक की विशेष चिन्ता के साथ ही
'आशावाद'
भारतीय साहित्य के सारतत्व के रूप में
विद्यमान रहा है। वेद, उपनिषद,
वेदांग, रामायण,
महाभारत,
स्मृतियों से लेकर तुलसी, सूर,
कबीर, मीरा,
रसखान की रचनाएं भारतीय मनुष्य के उदात्त
व्यक्तित्व का विकास करती रही हैं। कला,
संगीत और नृत्य,
सत्य, शिव और सुन्दर को अन्वेषित
करने के लिये समर्पित रहे हैं। भारतीय संस्कृति की शक्ति के
केन्द्र रहे धर्म, समन्वयात्मकता,
नैतिकता,
निष्काम कर्मवाद, पवित्रता,
सत्य अहिंसा और
ब्रम्हचर्य। प्रगति के विभिन्न सोपानों की ओर अग्रसर होते हुए
इन मूलतत्वों को संरक्षित रखने का हर संभव प्रयास निरन्तर जारी
रहा।
द्वितीय सोपान के अन्तर्गत डॉ. महेशचन्द्र
शर्मा ने वेद,
वेद और विज्ञान,
वेदों में राष्ट्रीयता की विश्वदृष्टि,
आध्यात्म व विज्ञान का समन्वय,
वैदिक आर्य,
गीता और कृष्ण तथा साधना का सम्यक् विश्लेषण किया है। वेद
अक्षय ज्ञान की निधि हैं। विश्व सभ्यता के सूर्योदय की उषा
है, हमारी संस्कृति। प्रकृति की
शक्ति की खोज निकले आर्य मनीषी सृष्टि की संरचना,
विकास तथा उसके स्वरूप को समझने में ही
समर्थ नहीं हुए, उसका वैज्ञानिक
विश्लेषण भी उन्होंने किया है। 'सब
सुखी हों' तथा 'सम्पूर्ण
पृथ्वी एक कुटुम्ब के समान है' की
मूलभावना का प्रसार वैदिक साहित्य में मिलता है। 'संस्कृति
मानवीय है, वह सार्वदेशिक है। एक
दूसरे के हित साधन से ही परम श्रेय की प्राप्ति होती है। यही
हमारी संस्कृति का मूलभूत सिद्धान्त है। ''मानव
रूपी'' पक्षी के दो पंखों के समान
है, आत्म ज्ञान तथा विज्ञान। गति,
प्रगति और ज्ञान,
विज्ञान से ही जीवन का विकास सम्भव हुआ है।
भारतीय मनीषियों का विज्ञान सम्बन्धी चिन्तन विश्व में अप्रतिम
था। आचार्य भारद्वाज का योगदान आयुर्वेदिक चिकित्सा शास्त्र
तथा वैमानिक कला शास्त्र के क्षेत्र में महर्षि कपिल द्वारा
ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति के क्षेत्र में,
महर्षि कणाद द्वारा अणु एवं परमाणु के
अनुसन्धान के क्षेत्र में, आचार्य
नागार्जुन द्वारा रसायन शास्त्र के क्षेत्र में,
चरक द्वारा आयुर्वेदिक चिकित्सा के क्षेत्र
में, दिया गया योगदान आज भी विश्व
में आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाता है। इसी तरह शल्य चिकित्सा
में सुश्रुत, गणित एवं कालगणना में
आर्यभट्ट, खगोलशास्त्र में
बाराहमिहिर तथा भास्कराचार्य,
वनस्पति शास्त्र में
जगदीशचन्द्र बसु तथा गणित सम्बन्धी सिद्धान्तों की स्थापना में
श्रीनिवास रामानुजम् का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
हमारे आलोक पुरुष एवं पर्व प्रसंग के अन्तर्गत
तृतीय सोपान में विद्वान लेखक ने आदि शंकराचार्य की परम्परा,
बौद्धचिन्तन,
धम्मपद, आचार्य बुद्धघोष,
कालिदास एवं महाकवि भोज़राज के योगदान के
पश्चात् गुरुगोविन्द सिंह, स्वामी
विवेकानन्द का चरित्र चित्रण किया है। इस अध्याय का समापन कुछ
पर्वों की जानकारी तथा उन पर पड़ते आधुनिक प्रभावों के उल्लेख
के साथ हुआ है। आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदान्त के अप्रतिम
विद्वान थे, लेकिन इसके साथ ही वे
भक्त कवि भी थे। उपनिषद्,
ब्रह्मासूत्र एवं गीता पर लिखा गया भाष्य जग प्रसिद्ध है। देश
को एकता के सूत्र में बाँधने के लिये चार पीठों की स्थापना की,
जिसकी प्रासंगिकता आज भी यथावत है। बुद्ध
द्वारा प्रवर्तित शांति का मार्ग गाँधी और नेहरू के लिये
विश्वशान्ति का मार्ग बना। सत्य और अहिंसा के साथ यह पंचशील का
उद्धोष बना। धम्मपद में कहा गया है बैर से बैर शान्त नहीं होता
है अपितु अबैर या प्रेम से वह शांत होता है। मन से ही समस्त
कार्यों का प्रारम्भ होता है। मन का अच्छा होना या बुरा होना
कार्य और उद्देश्य के अच्छे या बुरे होने पर प्रभाव डालता है।
बुद्धघोष वैदिक संस्कृति के अध्ययन के पश्चात् बौद्ध मत के
काव्य रचयिता के रूप में विख्यात एक ऐसे विद्वान् हैं,
जिन्हें हिन्दू-बौद्ध समन्वय स्थापित करने
का श्रेय प्राप्त है। महाकवि कालिदास भारतीय संस्कृति के अमर
गायक हैं। वे पर्यावरण संरक्षण के प्रति अत्यन्त संवेदनशील
हैं। वस्तुत: कालिदास साहित्य का विकास प्रकृति से ही होता है।
उनकी यही अभिरुचि उत्तरोत्तर परिष्कृत और परिवर्द्धित होती चली
गई। 'ऋतुसंहार'
से लेकर 'मेघदूत'
तक प्रकृति ही जैसे कालिदास की कल्पना और
चिंता के केन्द्र में रही है। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने
भारतीय संस्कृति को 'अरण्य संस्कृति'
कहा है। कालिदास साहित्य में बड़ी विशेष
संवेदना, भावुकता और अद्वितीय
आत्मीयता इन सबके प्रति पायी जाती है। मानव एवं प्रकृति अभिन्न
सहचर है। आज इन सम्बन्धों में ऋणात्मक अंतर आया है,
इसको दूर करना होगा। वह प्रकृति से जितना
कटेगा, दूर होगा उतना ही दुखी होगा।
जितना ही वह प्रकृति के निकट होगा,
उतना ही आनन्दित होगा। यह
महाकवि कालिदास का संदेश है।
चतुर्थ और अन्तिम सोपान शिक्षा और संस्कृति पर
केन्द्रित है। वैदिक शिक्षा,
शिक्षा और जीवन मूल्य,
शिक्षा नीति में संस्कृत,
शिक्षा और संस्कृति तथा शिक्षा के विकास
में शिक्षकों का योगदान जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर डॉ. शर्मा
के विचारों को जानने-समझने का अवसर प्राप्त हुआ है। वैदिक
शिक्षा में गुरु का स्थान एक छत्र के समान है। उस छत्र के नीचे
रहने के कारण शिष्य छात्र कहलाता है। वैदिक ऋषि शरीर,
मन और आत्मा के विकास के साधन को शिक्षा
कहता है। नैतिक विकास तथा आत्मचिन्तन के साथ भौतिक उन्नति करना
शिक्षा का प्रयोजन है। ज्ञान अनन्त है। इसे वहीं उपलब्ध कर
सकता है जो विनम्र हो और गुरु के प्रति आदर,
सम्मान और श्रद्धा से युक्त हो। शिक्षा का
जीवन मूल्यों के साथ गहरा सम्बन्ध है। जीवन मूल्यों को प्राप्त
करने के लिये शिक्षा मार्ग निर्धारित करती है। देश की आकांक्षा
के अनुरूप नागरिक निर्मित करना जो राष्ट्रसेवा के लिये कटिबद्ध
हों तथा जो स्वयं के जीवन के साथ सबको सुखमय जीवन प्रदान करने
के लिये तत्पर हों, यह शिक्षा का
सर्वोपरि उद्देश्य है। संस्कृत के सम्यक अध्ययन के साथ
'संस्कृति'
को जीवन में स्थानान्तरित
करने के लिये सतत् प्रयास शिक्षा का सार्थक प्रयोजन है। शिक्षक
का दायित्व महत्वपूर्ण है। उसके गौरव को संरक्षित रखकर ही
शिक्षा के उच्चतर सोपानों पर अग्रसर होना सम्भव है। श्रेष्ठ
शिक्षक शिक्षा के मूल्यों को उपलब्ध कर सकते हैं।
डॉ. रामविलास शर्मा,
दिनकर,
विद्यानिवास मिश्र, भगवतशरण
उपाध्याय जैसे संस्कृति चिंतकों के बाद डॉ. महेशचन्द्र शर्मा
की इस कृति को पढ़ते हुए भारतीय संस्कृति के बहुआयामी स्वरूप
की रोचक जानकारी मिलती है। इस विराट संस्कृति यात्रा की एकाग्र
समन्वय शक्ति, मानवीय सद्भाव,
तथा उदात्तजीवन दृष्टि डॉ. महेशचन्द्र
शर्मा का इस कृति में जिस गवेषणात्मक रूप में उपलब्ध हुए हैं,
उससे लेखक की सृजन
यात्रा भी महत्वपूर्ण सोपान की ओर अग्रसर हुए हैं।
डॉ.
प्रकाश
भिलाई,
छत्तीसगढ़
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