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विश्व रंगमंच और नाचा
डॉ.
राजेन्द्र सोनी
कई-कई
युग बीत गये पर मनुष्य का ह्रदय वैसा ही है जैसे पहले था। आवेग
और इच्छाओं के बीच संयोग-वियोग,
प्रेम के झरने वैसे ही बहते है। फ़र्क आया हैं तो सिर्फ़
अपनापन और अभिव्यक्ति की। अनादि काल से ही प्रकृति की मनोरम
गोद में मानव की सुकुमार भावनाएं पलती आ रही हैं। शिशु ने जब
आँखें खोलीं तो माँ के आँचल की छाया में नीले आकाश एवं झिल
मिलाते चाँद-सितारों ने लुभाया। धरती की हरियाली ने उसे मोह
लिया, पेड़-पौधे,
रंग-बिरंगे फूलों ने उसके अधरों को मधुर मीठी मुस्कान से
सजाया। शैल-शिखरों, सरिताओं-निर्झरों
ने पवन और पक्षियों के सुर में सुर मिलाकर गाना सिखाया,
रोना सिखाया। चारों ओर माधुर्य,सौन्दर्य
ही सौन्दर्य, उल्लास ही उल्लास ।
प्रकृति के इस इन्द्रधनुषी रंग को मानव मन ने गीत,
कविता और रंगमंच प्रदान किया। संघर्षो से मनुष्य ने नयी शक्ति
पायी, हमारे समाज का आज जो रूप हैं वह
न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है।
लोक संस्कृति की बात करना न तो पिछड़ापन है और न ही फैशन । लोक
संस्कृति की चर्चा कर हम अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को धरोहर के
रूप में स्थापित करने की बस गुहार ही लगाते हैं। प्रागैतिहासिक
मानव सभ्यता के साक्ष्य जब देश के अन्य भागो में तलाशे गये तब
पता चला कि छत्तीसगढ़ में वह सभ्यता बरसों से ही विद्यमान हैं।
हड़प्पा और मोहन जोदड़ो के उत्खनन से मिली पशुपति नाथ जैसी
प्रतिमा में पिरोहित अलंकरण सभ्यता की पहली नींव है। तो मुझे
यह कहने में बड़ी प्रसन्नता हो रही है कि उक्त सभी प्रकार के
अलंकरण बस्तर की जनजाति सहस्त्रब्दियों से पहनती आ रही हैं।
महापाषाण कालीन मनुष्य की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक सिंघनपुर
की गुफाओं में मिले है। कबरा पहाड़ियों में प्राप्त शैलचित्र
पाषाण कालीन माने गये हैं। सीता बोंगरा में स्थित विश्व की
प्राचीनतम् रंग-शाला वैभवशाली धरोहर हैं। रामायण कालीन सभ्यता
और संस्कृति छत्तीसगढ़ के केन्द्र में ही थी,
दक्षिण कोसल ही छत्तीसगढ़ है। कोसल नरेश की
पुत्री कौशिल्या का विवाह दशरथ से हुआ था। यह कोई किवदंती नहीं
है। लोक विश्वास है कि लव एवं कुश का जन्म तुरतुरिया के
वाल्मिकी आश्रम में हुआ था। उपरोक्त संदर्भ देने के पीछे मेरा
सिर्फ़ यही आशय है कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपरा,
सांस्कृतिक समाजों की बहुलता लोक कला,
लोक साहित्य,लोक राग चिर भव्यता के साथ
सुदुर अतीत से जुड़ता है।
कला की अवधारणा को लेकर पाश्चात्य और भारतीय दृष्टि में मूलत:
क्या अंतर है इस पर बात न करते हए केवल छत्तीसगढ़ की लोक नाट्य
पर बात करें तो हम पाते है कि लोक नाट्य में तत्वों का समावेश
न करके आनंदवाद की प्रतिष्ठा की गई। जीवन एक उत्सव है,
अनुष्ठान है, इसलिये शाश्वत है,
निरंतर गतिशील प्रक्रिया है। वह एक बार समाप्त
हो जाने के बाद पुन: जीवित हो उठता है। यही दर्शन कला के रूपों
में भी अभिव्यक्ति पाता है। बाद में विद्वानों ने नाट्य को दो
विधानों में बाँटा - लोकधर्मी और नाट्य धर्मी। रंगमंच पर
स्वाभाविकता का ध्यान रखना लोक धर्मी कहलाता है। इस लोक धर्मी
अभिनय में रंगमंच पर कृत्रिम उपकरणों का उपयोग नहीं होता,
आंगिक अभिनय ही पर्याप्त होता है और यही
छत्तीसगढ़ का लोक नाट्य नाचा है।
नाट्यधर्मी में परंपरा का जन्म नहीं होता यहाँ शास्त्र ही काम
आता है। भरत मुनि के नाट्य- शास्त्र को साक्ष्य के रूप में
स्वीकार किया जाता है। उनकी नाटकों को मनोरंजक और पैनी दृष्टि
से आर्कषक बनाने के लिये स्टेपनी की तरह शिव के लास्य और तांडव
जैसे नृत्यों को समाहित किया जाता है। इससे साफ़ जाहिर होता है
कि नाटक का जन्म न तो नृत्य से हुआ,
न कठपुतली कला से बल्कि स्वयं नाटक ने अपने
विकास के बाद इन कलाओं को साथ जोड़ा। यों भी किसी प्रदर्शनकारी
माध्यम की पहली अभिव्यक्ति एक समूह के रूप में हुआ करती है।
भरत मुनि का सूत्रघार आज डायरेक्टर कहलाता है। जबकि छत्तीसगढ़
के नाचा का जोकर स्वयं सपूर्ण परिपक्व निर्देशक होता है। भरत
मुनि के नाट्य चिंतन, नाट्य-शास्त्र के
निर्माण के सैकड़ों वर्ष पूर्व नाचा लोक समाज में भिन्न-भिन्न
नामों से विद्यमान था।
छत्तीसगढ़ में नाचा का आर्विभाव कब कैसे और कहाँ से हुआ?
यह निश्चित तौर पर कह पाना कठिन है।
कुछ विद्वानों का मत है कि
1742
में मराठों का आगमन हुआ। मराठों के साथ आए मराठी कलाकारों
द्वारा तमाशा का प्रदर्शन किया जाता था। तमाशा देखकर ही
छत्तीसगढ़ियों ने नाचा की शुरूआत की होगी। किंतु इस मंतव्य को
स्वीकार नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ अंचल प्रारंभ से ही
श्रमजीवी रहा है। वहाँ अपनी श्रम को प्रतिष्ठापित करने माटी के
गीत गाते रहे हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य को आत्मसात कर लोग
समुदाय में नाचना, गाना,
सीख चुके थे, तब हम कैसे कहें कि
छत्तीसगढ़ियों में नाचने-गाने की प्रवृत्ति दो या तीन सौ वर्ष
पुराना है जबकि बड़े कस्बों में बसुदेवा गाने वाले,
रासलीला एवं रामलीला जन समुदायों द्वारा किये जाने का प्रमाण
मिलता हैं। ग्राम-घुमका-जिला राजनांदगांव की रामलीला मंडली
1877 में संगठित हो चुकी थी,
जो आज तक कायम है। पहिली पीढ़ी के बाद दूसरी
पीढ़ी के सभी कलाकार बेजोड़ और मँजे हुए थे। उनमें से प्रमुख
बहोरन लाला सोनी, रामलाल जी सोनी,
दुर्योधन प्रसाद दुबे,
प्रेमसिंह ठाकुर, कोंदू सिंह ठाकुर,
महाराजसिंह ठाकुर,कन्हैया
श्रीवास,(सभी स्वर्गीय)थे। सत्तर के
दशक पार कर चुके श्री फरीस प्रसाद दुबे जैसा शिष्ट हास्य,
दृगपाल सिंह ठाकुर जैसा मन मोहक लक्ष्मण का पाठ करने वाला
कलाकर रंगमंच अथा फिल्मी जगत में देखने को नहीं मिलता ।
महाराजसिंह (बड़कू)दृगपाल(छोटू) जुड़वा भाई थे। वे राम और
लक्ष्मण का पाठ करते थे। गौर वर्ण के कारण वेशभूषा में दोनों
सजीव साक्षात् ईश्वर का रूप दिखते थे। उन दोनों को पहचानना
मुश्किल होता था। लीला और नाचा में बहुत बड़ा फ़र्क हेता हैं।
लीला महापुरूष करते हैं जबकि नाचा या तमाशा लोक पुरूष।
सवाल यहाँ नाचा का है। हाँ यह ज़रूर कहा जा सकता हैं कि पिछले
सौ-दो-सौ वर्षो में नाचा के विकास में क्रमिक गति आई। क्रमिक
विकास का चर्मोत्कर्ष अंचल में उस समय देखने को मिला जब दाऊ
दुलारसिंह मंदराजी ने
1928
में रवेली नाचा पार्टी का गठन कर गाँवों में प्रदर्शन करना
शुरू किया। दाऊजी छत्तीसगढ़ी नाचा पार्टी के जनक कहे जाते है।
1932 के आते-आते रवेली नाचा पार्टी
संपूर्ण छत्तीसगढ़ के अन्य राज्यों में कोई अन्य लोक नाट्य शैली
की पार्टी देखने को नहीं मिलती। संपूर्ण छत्तीसगढ़ में रवेली
नाचा पार्टी से परिचित हो चुका था। लोग बैलगाड़ी आदि साधनों से
गंतव्य तक पहुँचते थे। नाचा रात भर होता था। उन दिनों खड़े साज
का प्रचलन था। सभी कलाकार अपने वाद्य यंत्र कमर में बांधकर
अथवा गले में लटका कर नाचा किया करते थे। दाऊ मंदराजी ने
उन्हें बैठक साज के रूप में विकसित किया।
दाऊ मंदराजी नाचा को केवल मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे। वे
नाचा के माध्यम से लोक जागरण,
सामाजिक सुधार, शिष्ट समाज के वर्चस्व
का प्रतिरोध महिलाओं की करूणा, उनकी
सामाजिक एवं पारिवारिक विषमता, शिक्षा,संस्कृति
पर कटाक्ष करने तथा वर्ग-भेद को मिटाने के लिये गम्मत रचते थे।
ब्राम्हणों के द्वारा समाज एवं परिवारों में विघटन की
प्रक्रिया जारी थी। छुआछूत,
अंधविश्वासों में समाज को ढकेलकर वे अपनी कोठी भरते रहे ।
पोंगा पंडित नामक गम्मत के बाद गांवों में जागृति शुरू हुई और
यहीं से शुरू हुई स्वराज्य की लड़ाई भी। उन दिनों यह गीत लोगों
के जुबान पर था-
ले महाराज बता देहू तुंहर कऊन घराना आय
जात सिकारी ल नीच बताथैं
देखब म महाराज छुआथैं
तऊने के लइका बाल्मिकी ये
जेकर ग्यान सुहाथे
।1।
ले महाराज बता......।
व्यास मुनि महाभारत गाईस
ब्रम्हजान के देवता कहाईस
ब्रम्ह रिसी तेला कहत लागे
जात म फरक खाये।2। ले
महाराज बता.......।
दासी के बेटा ये मुनि नारदद
अइसे होई तब ग्यार बिसारद
स्वर्ग छुआ म झन हो गारद
भेड़ बिगड़ तैँ पाये।3।
ले महाराज बता.........।
मुनि परासर ल जग जानिन
आय तेकर दाई जमादारिन
जनम धरिन हे नीच पेट ले
सुनत अचम्भा छाये ।5।
ले महाराज बता........।
(स्वर्ण कुमार साहू)
द्वितीय युद्ध अपनी चरम गति में था। मंदराजी
दाऊ का नाचा क़दम से क़दम मिलाकर समय की आहटें खोज लिया था। वह
भविष्य में आज़ाद होनेवाला भारत का स्वयं अपने कलाकारों को
दिखा दिया था। साम्राज्यवाद के प्रतिकार की चेतना नाचा में
फैलने लगी थी। देश प्रेम से ओतप्रोत प्रदर्शनों का दौर शुरू हो
गया था। जब अँगरेज़ों को मालूम हुआ कि दाऊ मंदराजी का नाचा
निरा ग्राम्य रंगमंच अथवा अप्रशिक्षित कलाकरों का शौकिया उद्गम
नहीं हैं ,नाचा गाँवों के लोगों में
जागरूकता और देशप्रेम की भावनायें भड़का रहीं हैं तब अँगरेज़ों
ने प्रदर्शनों में रोक लगाना शुरू कर दिया। गांधी के मार्गो पर
चलन की वे यह गीत गाते-
जात खातिर कतेक तोर गुमान रे ओ बइहा
कुकुर बिलई घर मं पोसे,
नई गइस तोर जाम
भाई-भाई के मार-पीट में लगथे तोला भात।1।
पनही पहिरे चाहा पीथैं,
रोटी भात खाथैं
कइसन बाम्हन होटल मं हे पूछे कऊन जाथैं।2।
मुर्रा,भजिया,रोटी,
चना, हाट बाट मं खाथें
बेचइया मन कऊन जात हे,
पूछे कऊन जाथैं।3।
महापरसाद ल जम्मों मन,
जगन्नाथ मं खाथैं
मानुस चोला एकेच्च हावें,गांधी
जी बताथैं।4।
(लाला फूलचंद)
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