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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। ललित-निबंध ।।

 

 

धरती की बेटी ने कहा...


प्रभा सरस

 

रती ने कहा, सातों महाद्वीप समेट लूँगी अपने में, सातो समन्दर रहेंगे मेरे अंदर। ये ऊँचे-ऊँचे पर्वत, पहाड़, घाटियों के लिए है मेरे पास जगह। ये रेतीले महासागर जैसे विशाल मरुस्थल मुझे छोड़ कहाँ जायेंगे, ये झरने, नदियाँ, नाले पनाह पायेंगे मुझमें, मैं धरती हूँ, जड़ें तो ज़मीन में ही समायेगी। ये हरे-भरे घने जंगल, मेरा सीना चाक कर खड़े रहेंगे मेरे ऊपर अपनी सत्ता के साथ। मेरी ही धरती पर खारे सागरों को मुँह चिढ़ाती मीठी झीलें बुझाती रहेंगी सबकी प्यास। मैं धरती हूँ, धरती माँ, जननी हूँ प्राणी मात्र की। मेरा पानी तुम्हारा है, मेरी हवा पर तुम्हारा पूरा-पूरा अधिकार है। तुम्हारी साँसों के लिए सहेज  कर रखा है। वायु मंडल में वायु का भंडार मेरी ज़मीन पर तुम्हे उगाना है, अन्न-फलों-फूलों के पेड़-पौधे लगा कर करना है पीढ़ी के नाम वसीयत। फूलों की सुगंध, फलों की मिठास बिखर जायेगी संसार में। मुझे तो खुशियों देना, सुख बाँटना ही आता है।

 

धरती ने कहा- मेरे आकश मैं बुनियाद हूँ तुम्हारी मेरा नीचा होना ही तुम्हारा ऊपर होना है। तुम चाँद सितारे आकाश मे सज़ा चमकते रहना ऊपर। तुम्हारी नीली आभा में चमकता रहेगा सौर मंडल का स्वामी सुनहरा सूर्य। सारी दुनिया को बाँटता रहेगा प्रकाश आकाश तुम्हारी शून्यता कौन जान पायेगा? तुम्हारा नाम तो मेरे साथ सदा से जुड़ा  हुआ है मैं अवनि हूँ तभी तो तुम अम्बर हो। मैं तुम्हारी धरा हूँ तब तुम व्योम हो। हम दोनों से मिलकर बना है। भुवन-जीवन्त है। सृष्टि विधाता की कर्मस्थली है, यह वसुन्धरा।

 

धरती ने कहा- मेरे नीले नभ मैं वसुधा तेरी सुहागन हूँ, तू अहम् में मत भूल जाना। इस धरती के बिना सूर्य, चंद्र का क्या अस्तित्व ? धरती न हो तो किसे बाँटेंगे रोशनी, कहाँ उठेगा ज्वार! कौन सा क्षितिज तुम्हे मिलायेगा मुझसे! यही पल तो जहाँ मैं धरती उठती सी दिखाई देती हूँ और आकाश तुम्हे झुकना पड़ता है।

आसमान झुककर कर धरती  से

अपने मन की पीर कहेगा

 

कहाँ मिलेगा अस्ताचल जिसके पीछे तुम्हारे---आकाश में विचरने वाला, दमकता दिवाकर अपनी थकान मिटायेगा? कहाँ रूकेंगे उसके सप्ताशव? जनशून्य आठ ग्रहों की तरह यह धरणी होती तब तुम क्या करते आसमान। तुम्हारी ऊँचाई, तुम्हारा अस्तित्व तुम्हारी विशालता मेरे ही कारण है।

 

धरती की बेटी ने कहा-तुम आकाश मत बनो अपने आकाशी अहम् से मेरे स्वाभिमान को मत रौंदो, क्षितिज का भ्रम नहीं सत्य समझो मुझसे जुड़कर रहो। चाँद सितारों की बुलन्दियाँ हैं मेरे पास। चमकता सूर्य जो प्रकाश का स्रोत है वह भी है मेरे अधिकार में। मैं पालनकर्ता हूँ। मैं ब्रह्मा हूँ। ऐसी गवोक्ति मत करो। मैं धरती की बेटी हूँ। मैं हरी-भरी हूँ, मेरी गोद में तुम्हारा बीज पल्लवित पुष्पित होकर खिलखिला रहा है। मैं सृष्टिजया तुम्हारे बीज को सुरक्षित रख अपने प्राण कष्ट में रख रचती हूँ उसमें प्राण। तुम्हें तो उसके सिर पर रखना है अपना वरदहस्त। देना है ऊँचाई । करना है पुष्ट । भरना है ज्ञान का प्रकाश । मेरे पास शक्ति है । रक्त को दूध की धार में बदल देने की। मेरी चोंच में दाना है उसका पेट भरने के लिए।

 

धरती की बेटी ने कहा-तुम उसे उडना सिखाओ कल्पनाओं के पँख लगाकर। अँगुली पकड़ चलना सिखाओ। मत सौंपों मुझ पर सारी जिम्मेदारी। मत तोड़ो मेरे स्वाभिमान को। मेरी सहनशीलता की, मत लो बार-बार परीक्षा। मत करना अपनी झूठी शान का बखान मत करना पुरुष होने के शौर्य का घमंड। मत कहना अहम् और आकाश की बातें स्वीकारेंगे नहीं पर तुम्हारा मन अंतिम निर्णय का न्यायाधीश है, वह स्वयं करता है मूल्याँकन।

 

धरती की बेटी ने कहा-यह आवश्यक नहीं कि मन की बातें स्वीकारी जाय- अपने अन्तस में झाँको और बताओ

कितनी तृप्ति देता है

प्रियतमा का संग

और प्रेम विव्हल पल

कितनी निश्चितता लाती है

माँ की गोद

कितना सुकून मिलती है

जब बिटिया तुतलाती वाणी में

करती है सम्बोधन।

 

धरती के बेटी ने कहा- तुम मेरी शाश्वत छत बने रहो। मैं तुम्हारे कंधे से कंधा मिला कर्मक्षेत्र में खड़ी हूँ। मेरे स्वाभिमान पर ऑंच मत आने देना । उसकी रक्षा तुम्हारा दायित्व है। दुःख तो मैं संभाल लूँगी। तुम मेरे सिर पर कर्त्तव्यों की गठरी रख दो। प्यार भरा अधिकार स्वयं रख लो मुझे तो बोझ उठाने की आदत है।

   प्रभा सरस

दुर्ग, छत्तीसगढ़

 

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