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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

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।। कविता ।।

 

 

मैं गरूड़ हूँ

 

मैं गरूड़ हूँ

कई गहरी घाटियों में विचरता

झील, समुंदर

अपने देश लौट आया हूँ

मैं कवच हूँ

अपनी संचित काया का !

तुम्हारे सरकंड़ों के तरकसों से

मेरी हत्या न होगी,

मुझे मारने कोई गांडीव जैसा

वेगवान तूणी चाहिए

अग्नि के दहकते अँगारों से भी

मेरा वेग कम नहीं हुआ

जलती अग्नि चिलचिलाती, धुआँ फेंकती

अपने में ही जलकर भस्म हो गई

 

मै गरूड़ हूँ

मुझसे पृकृतिवाहक को स्नेह है

मुझे मिटाने से पूर्व

तुम्हारा ध्वंस हो जायेगा

पिछले लावे में तुम्हारा

कंचन शरीर समा जाएगा

 

और स्नेही बाँधवो,

मुझ पर तरकस न खींचो,

मुझे मारो मत

मैं तुम्हें अनजान प्रदेशों से लाई

समक्षम चीज़ें भेंट करूँगा;

अग्नि-पुत्रों से जूझकर प्राप्त किया

अमृत तुम्हें पिलाऊँगा

अपने स्नेह का आवरण तुम्हें उढ़ाऊँगा

मुझे मारो मत, मुझे स्नेह करो

मै गरूड़ हूँ (तुम्हारा देशज हूँ)

आज अपने देश लौट आया हूँ

    जगदीश चतुर्वेदी

दिल्ली

 ◙◙◙

 

कवि

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- जगदीश चतुर्वेदी

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