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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

भाई प्रेम सिंह

(बांदा के एक प्रयोगधर्मी किसान, जो खेती को उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जीने का एक अभ्यास मानते हैं )

 

उसने मिट्टी को छुआ भर था

धरती ने उसे सीने से लगा लिया

उसने पौधे लगाए

ख़ुश्बू उसकी बातों से आने लगी

पेड़ समझने लगे उसकी भाषा

फल ख़ुद-ब-ख़ुद

उसके पास आने लगे

पक्षी और पशु तो

सगे-सहोदर से बढ़कर हो गए

जो मुश्किल भाँपते ही नहीं

उन्हें दूर करने की राह भी सुझाते हैं

 

मैने पूछा भाई प्रेम सिंह !

क्या कुछ खास हो रहा है इन दिनों

खिलखिला पड़े वो

कहने लगे-

लोग जिस स्वर्ग की तलाश में हैं

मैं वही बनाने में जुटा हूँ

    प्रताप सोमवंशी

स्थानीय संपादक,
अमर उजाला, हिंदी दैनिक
८९, इंडस्ट्रियल इस्टेट,
फजलगंज, कानपुर

 ◙◙◙

 

कवि

स्मरणीय

- जगदीश चतुर्वेदी

- 'शलभ' श्रीराम सिंह

समकालीन कवि

- प्रताप सोमवंशी

- डॉ. प्रेम दुबे

- मोहन राणा

- अनिल एकलव्य

प्रवासी कलम

- रचना श्रीवास्तव

 माह का कवि

- रश्मि रमानी की तीन कविताएँ

... वह याद कर रही है कुछ

... माँ की बरसी

... अजनबी

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तकनीकः प्रशांत रथ

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