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भाई प्रेम सिंह
(बांदा
के एक प्रयोगधर्मी किसान,
जो खेती को उत्पादन का माध्यम नहीं,
बल्कि प्रकृति के साथ जीने का एक अभ्यास मानते हैं )
उसने मिट्टी को छुआ भर था
धरती ने उसे सीने से लगा लिया
उसने पौधे लगाए
ख़ुश्बू उसकी बातों से आने लगी
पेड़ समझने लगे उसकी भाषा
फल ख़ुद-ब-ख़ुद
उसके पास
आने लगे
पक्षी और पशु तो
सगे-सहोदर से बढ़कर हो गए
जो मुश्किल भाँपते ही नहीं
उन्हें दूर करने की राह भी सुझाते हैं
मैने पूछा भाई प्रेम सिंह
!
क्या कुछ खास हो रहा है इन दिनों
खिलखिला पड़े वो
कहने लगे-
लोग जिस स्वर्ग की तलाश में हैं
मैं वही बनाने में जुटा हूँ
प्रताप सोमवंशी
स्थानीय संपादक,
अमर उजाला,
हिंदी दैनिक
८९,
इंडस्ट्रियल
इस्टेट,
फजलगंज,
कानपुर
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