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मोहन राणा की दो कविताएँ
पानी
पर
चलते

आकाश
को
ताकते
मैं
नज़र
रखे
हूँ
मौसम
पर
दोपहर
के
मूड
पर
बिल्कुल
सावधान
एकटक
अपलक
निश्वास
चिड़ियाँ
मुझे
लहरों
पर
डगमगाता
कोई
पुतला
समझती
हैं
समय
मिटा
चुका
है
मुस्कराहट
मेरे
चेहरे
से,
एक
आएगी
कोई
लहर
कहीं
से
ले
जाएगी
मुझे
किसी
और
किनारे
पर
और
मैं
भूल
भी
चुका
यह
हुआ
कब
या
सपना
तो
नहीं
मैं
देखता
तट
पर
सोई
उन्मीलित
नीली
आँखों
का
(बार्सीलोना
13.4.08)
गली
हम
सुनेंगे
तुम्हारे
स्वरों
को
चुपचाप
रिमझिम
में
भीगते
धोते
अपने
अंतर
को
उनकी
धारा
में,
बारिश
चली
जाएगी
अनजाने
अंतरालों
में
समेटते
स्मृतियों
की
कतरनों
में
जाने
कब
से
दम
साधे
बोल
पड़ती
अनुगूँज
दोपहर
की
तुम्हें
सुनते
सुनते
(बार्सीलोना
(
14.4.08
मोहन राणा
221, Wellsway,
Bath BA2 4RZ
England, UK
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