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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

साम्राज्य और साईकिल

संपन्न शक्तिशाली साम्राज्य
जो कि सुना है
आश्चर्यजनक रूप से
सुसंस्कृत भी था
जहाँ तेनालीराम जैसे दरबारी
कुछ वैसे ही रहते थे
जैसे अकबर के यहाँ बीरबल

बड़ी घटिया उपमा है
पर मैं झूठ बोलने से
बचना चाह रहा हूं
वैसे भी मैं कवि नहीं हूं
मेरी बोली तो
खड़ी बोली है

तो खड़ी बोली में
कहा जाए तो
बारिश का मौसम है
रिमझिम रिमझिम
इतनी ही कि कैमरा भी
बचा के रखा जा सके
तस्वीर खींचते हुए भी

भीड़ वगैरह भी नहीं है
आप आराम से भ्रमण का
पूरा मज़ा ले सकते हैं

छोटे-छोटे पहाड़
बड़ी-बड़ी चट्टानें
साफ़-सुथरी सड़कें
सब तरफ पेड़-पौधे
पत्तियाँ भी घास भी
फूल भी और उन पर
मंडराने वाले भी
तितिलियाँ भी होनी चाहिए
पर आखिरी दो मदों की
याद मुझे नहीं आती
भूल-चूक लेनी-देनी

ऊपर ऐसे बादल
कि तस्वीर खींचने से
मन ही न भरे
और हाँ
नदी भी तो है
अपने उफान के चरम पर
लेकिन छोटे से साम्राज्य की
छोटी सी तो नदी है
इसलिए चरम भी
अनुपात में ही है

सुना है हमेशा ऐसा नहीं होता
भ्रमण के भी मौसम होते हैं
तब हर तरफ भीड़ होती है
ऐसी सफाई और हरियाली भी
नहीं पाएंगे आप
नदी में इतना पानी भी
नहीं पाएंगे आप
रिमझिम बारिश तो खैर
नहीं ही पाएंगे आप

 

 

 

 

   

मुझे पता नहीं था
तकदीर (कभी तो) अच्छी थी

लेकिन एक बात है
क्या तब भी यहाँ घूमने में
इतना ही मज़ा आता होगा
जब कि साम्राज्य गिरा नहीं था

दो हज़ार साल पहले के
रोम में भ्रमण का मज़ा
कितना आता होगा
यह किससे पूछा जाए

दो-तीन राजधानियों की बात
तो जानता हूं मैं
चतुर दरबारी तो
वहाँ भी बहुत से हैं
लेकिन भ्रमण

जाने दीजिए

मेरा तो मन हो रहा है
मैं भी एक साइकल
किराये पर लेकर
फिर से घूमने निकल जाऊं

वाहन पर चढ़ कर जाऊं वहाँ
पहले पैदल गया था जहाँ

कुछ तो तुक हो

थक जाने पर साइकल को
पेड़ के नीचे खड़ा करके
आराम किया जा सकता है

पतन को पा चुके साम्राज्य में
रिमझिम रिमझिम
बारिश के मौसम में
लगभग आकर्षक रूप से
घुमावदार और चढ़ावदार
लगभग स्वाभाविक रूप से
कच्ची और टूटी-फूटी
सड़क के किनारे
लगभग अपेक्षित रूप से
धीर-गंभीर और छायादार
लगभग निराशाजनक रूप से
छोटे और हल्के-फुल्के
एक पेड़ के नीचे
खड़ी हुई एक साइकल

सड़क के होने का
रहस्य बताते हुए

और शायद साम्राज्य
के न होने का भी

जहाँ साम्राज्य था
वहाँ अब साइकल है
पर मुझे कुछ खास
अफ़सोस भी नहीं है

यहाँ तो फ़िलहाल मुझे
साइकल, पेड़ और सड़क
काफ़ी भा रहे हैं
जहाँ पृष्ठभूमि में स्थित है
साम्राज्य का एक अवशेष

अनिल एकलव्य

International  Institute of Information Technology
Hyderbad-500032 (A.P.)

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कवि

स्मरणीय

- जगदीश चतुर्वेदी

- 'शलभ' श्रीराम सिंह

समकालीन कवि

- प्रताप सोमवंशी

- डॉ. प्रेम दुबे

- मोहन राणा

- अनिल एकलव्य

प्रवासी कलम

- रचना श्रीवास्तव

 माह का कवि

- रश्मि रमानी की तीन कविताएँ

... वह याद कर रही है कुछ

... माँ की बरसी

... अजनबी

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