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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

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।। कहानी ।।

 

 

लौटते हुए परिन्दे


सुरेश तिवारी

 

ह कहाँ से चला था...और,आज कहाँ पहुँच  गया है...! वह रूका नहीं, ...बस यही सबसे बड़ी बात थी । रूक-रूक कर चलना और बिना रूके चलने में काफी अंतर होता है । उसने अपनी आँखों से ज़्यादा दिल पर भरोसा किया और ईमान को सामने रखा । आज ज़रूर उसे ईमान शब्द का इस्तेमाल करने पर भीतर ही भीतर हँसी आती है, पर बाहर वह इस शब्द पर कभी हँस नहीं सकता । वैसे वह बाहर कभी हँसता भी नहीं । लोग तो यहाँ तक कहने लगे हैं कि उसे हँसी आती ही नहीं । यह तो ठीक ऐसी बात हुई किपंछी हो और उसे उड़ना न आये...। आदमी और हँसी दोनों को अलग नहीं किया जा सकता । यह अलग बात है कि आज हँसी और ईमान जैसे शब्द उसके सामने पुराने कोट की तरह खूँटी पर टँगे हैं । उन्हें उठाकर ट्रंक या आल्मीरा में रखना अच्छे कपड़े की तौहीन करना लगता है । पर, वह जानता है कि वह कभी भी हँस सकता है और पंछियों के साथ...या फिर पंछियों की तरह उड़ सकता है ।

 

वह जब चला था, तब ऐसा नहीं था । तब घर में फ़ालतू कमरा हुआ करता था । फ़ालतू कमरा, यानी अभी की प्रचलित भाषा में घर सा स्टोर अथवा कबाड़खाना, जहाँ गैरज़रूरी या फिर, कम काम में आने वाली चीज़ों को डाल रखा जाता है । वह तो जब चला था, उसने कल्पना ही नहीं की थी कि उसके पास इतना बड़ा घर होगा । बहुत से कमरे होंगे । चार-छह कमरों की बात उसे तब सपना लगती थी, पर आज उसे दस-बारह बड़े-बड़े कमरे भी छोटे पड़ रहे हैं । टेरेस और लॉन की लम्बाई-चौड़ाई उसे कम लगने लगी है । पर, लॉन का एक पेड़ और एक कोना उसका ध्यान हमेशा खींचता है, वर्ना उसका मन कई बार यह कहता कि यह कॉटेज बेच कर नई आलीशान कोठी बनवा ले । कम से कम बीस कमरे तो उसके पास ग्राउण्ड फ्लोर पर होने चाहिए...और एकड़ दो एकड़ से ज़्यादा में फैला लॉन...। अब टेरेस में पल भर रूकने से वह बेचैन हो जाता है । वह नई कोठी में कोई नई व्यवस्था की बात सोचेगा । पर, उसे बार-बार यह क्यूं याद आ रहा है कि वह कहाँ से चला था...और, आज कहाँ खड़ा है!

 

उसने अपने हाथ की घड़ी देखी । वही काले धागों से बनी साधारण पट्टे वाली और बेहद साधारण घड़ी । क़ीमत से आज यदि कोई उसका आकलन करे तो डेढ़-दो सौ रूपये की घड़ी उसे कह सकता है । ...बीस से पच्चीस करोड़ का कॉटेज और हाथ में सौ रूपल्ली की घड़ी...। एक बार उसे अनुज रमन ने टोका था, तब उसने कोई जवाब नहीं दिया था । कई लोग उससे जब-तब घड़ी के बारे में पूछ लेते और वह हमेशा चुप रहता । चुप बना नहीं रहता, बल्कि चुप रहता । धीरे-धीरे करके यह बात सारे लोगों तक फैल गई कि रमाशंकर की घड़ी में ज़रूर कोई जादू है ।... वर्ना, वह घड़ी की बात करने पर लम्बी चुप्पी में क्यूं चला जाता है । कभी किसी को उसने इस बार में कोई उत्तर क्यूं नहीं दिया ....? वह जानता है कि घड़ी उसका अतीत है । और व अपने अतीत को कतई खोना नहीं चाहता । पुराना समय, आज भी उसके सामने चलने लगता है, जब-तब और कभी भी । वह घड़ी को जब चाहे देख सकता है और अपने अतीत को भी उसे लोगों ने कई बार बहाने से मँहगी-मँहगी घड़ियाँ उपहार में दीं । पर, उसने उन घड़ियों के डिब्बे तक कभी नहीं खोले ।  पर्सनल आल्मीरा में ऐसे बीसों डिब्बे उसके पास पड़े हैं । ऐसा  नहीं कि, दिन भर उसे अपनी घड़ी का ही ध्यान बना रहता है, बल्कि वह तो यह भी ख्याल नहीं कर पाता कि साल-घह महीन के भीतर उसने अपनी घड़ो को एक बार भी ठीक से देखा हो । वह यंत्रवत् उसे ऑफ़िस चलते समय पहनता और लौटते समय अपने सबसे सुरक्षित लॉकर में रख लेता । उसे कभी इस बात का डर नहीं ला कि घड़ी गुम भी हो सकती है । कम से कम पच्चीस बरसों से तो गुमी नहीं है ।

 

पच्चीस बसरों का समय कम नहीं होता त। कभी-कभी तो मिनट-दर-मिनट काटना कठिन हो जाता है । यही समय तो उसे याद दिलाता है कि वह कहाँ से चला था...., आज कहाँ खड़ा है, और कल जाकर कहाँ खड़ा होगा । वह चलता रहा । रुक-रुक कर नहीं बल्कि, लगातार । उसे ख़ुद नहीं मालूम कि चलते-चलते आगे कहाँ जाएगा । पर, वह इतना जानता है कि वह रुकेगा नहीं । वह मुड़ेगा नहीं... और थकेगा भी कभी नहीं...। उसे निगाहें सामने थीं । नाक की सीध के स्तर से कुछ ऊपर उठी हुईं । वह ज़्यादातर नीचे देखकर... या फिर, निगाहें मिलाकर किसी से बात नहीं करता था । उसे लम्बी बात...अथवा देर तक बात करते किसी ने नहीं देखा । वह न तो कभी जल्दबाजी में नज़र आता... और न ही कभी सोच में डूबा लगता । उसके चेहरे पर हमेशा स्व-स्फूर्त ताज़गी बनी रहती और जुबान मिठास से भरपूर । उसे किसी ने कभी डाँट-फटकार करते नहीं देखा । वह उदास भी कभी नहीं लगा । पर, अक्सर जब कभी मौका मिलता, वह एकांत में चला जाता ...। अपने ऑफ़िस में भी...और घर पर भी । तब, उसे कोई डिस्टर्ब नहीं कर सकता था । वह अपनी मर्जी से ही ख़ुद एकांत से बाहर निकलता । पर, एकांत के उसके क्षण दिन के वक्त आधा घंटे से अधिक नहीं होते । सुबह भी लोगों को कभी उसका इंतजार नहीं करना पड़ता । वह पाँच सवा पाँच बजे पूरी तरह से तैयार हो जाता । उसकी दिनचर्या अगले दिन के लिए कम सेकम 36 घंटे और व्यस्तता ज़्यादा रहने पर 48 घंटे पहले तय हो जाया करती । उसके सारे कार्यक्रम सबके सामने होते...। कोई भी उससे मिल सकता था । कोई भी उसके बात कर सकता था, वह किसे उत्तर देगा और किसे नहीं, इसका अनुमान पहले से लगाना कठिन था । वह कभी-कभी बड़ा रहस्यवादी नज़र आता । सारे अनुमानों को तब दरकिनार करता हुआ उसका व्यवहार बेहद अतिवादी हो जाता ।...तब वह अपनी मान्यताओं और  आदर्श की परवाह नहीं करता ।

 

... ऐसा वह क्यूं करता... । बाद में उसके पास स्वयं उसका  उत्तर नहीं रहता । ऐसा नहीं कि वह अपने ऐसे कृत्य पर पछताता हो । वह ऐसा करने के बाद कभी पछताता नहीं । भीतर से विचलित ज़रूर हो जाता । ऐसे ही वक्त वह घड़ी देखता... और फिर वह एकांत के लिए चल पड़ता । वह जब बेहद अतिवादी स्थिति में होता तो अपने तयशुदा सभी कार्यक्रम रद्द कर देता....और भविष्य में उन कार्यक्रमों को अपनी दिनचर्या की अगली सूची में कभी रिपीट नहीं करता । ऐसे वक्त उसे सिर्फ़ निशि भर की फटकार झेलनी पड़ती । सिर्फ़ यही कार्यक्रम उसकी दैनिक सूची में रिपीट होता । रद्द होने के बाद रिपीट । रिपीट शब्द से ही उसे चिढ़ थी । ... या तो काम हो जाए पूरा..या फि र्द्द...। पर, निशि के लिए रिपीट - रिपीट - रिपीट  जैसा शब्द उसकी सूची में हज़ार बार भी आये तो वह कुछ कह नहीं सकता था । बल्कि, एक माह पहले उसके कार्यक्रम रद्द हुए तो पर्सनल फ़ोन पर उसने निशि से गुस्से वाली स्थिति में डाँट खाई थी और माफ़ी माँगनी पड़ी थी । वह आधी रात को गाड़ी उठाकर भागा था और सुबह सबसे पहले निशि के सामने हाथ जोड़े खड़ा था । इसके बाद उसने अपने दफ़्तर के सभी लोगों को वार्न किया था कि निशि के कार्यक्रम में पहले हाईरैड से मार्क करें और फिर दोनों किनारों पर ग्रीन ऐरो लगायें...। वह जानता है कि इस मार्क के बाद दिनिया इधर से उधर हो जाऐ, वह अपना यह कार्यक्रम नहीं बदल सकता ।

 

....कहाँ से चला था और वह आज कहाँ आ गया । और,...वह कल, ... हाँ कल, कहाँ पहंचेगा...। उसने यह सोचा तो कल शब्द आँखों के सामने विस्तार लेकर फैलने लगा । फिर मन में आया कि कल वह अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर देगा । आज दिन भर के आठ घंटे बचे हैं ।जरुरी सभी काम अभी...और बाक़ी पेंडिंग,...लौटकर देखेंगे । वह अपने भीतर लौटने लगा । उसे अतीत याद आने लगा । आख़िर कब तक काम करता रहेगा वह ? पूरी ताकत लगाने के बावजूद भी क्या उसका काम कभी ख़त्म हो पाता है ?  सुबह चार, साढ़े चार बजे से लेकर रात एक से दो बजे तक वह काम ही करता रहता है । कभी प्लनिंग, तो कभी मीटिंग और कभी प्रोजेक्ट रिपोर्ट की दफ़्तर में मानीटरिंग तो कभी फील्ड में जायजा । उस पर भी घर पर मिलने वालों की भीड़ और दिन भर आमंत्रित करने वालों की अर्जियाँ । कभी-कभी वह इन सबसे ऊब भी जाता । पर, ठीक उसी समय मन को समझाता कि इसी-सब के लिये तो वह सारी कसरत करता रहा है । अब इससे छुटकारा नहीं है...और, उसे छुटकारे का प्रयास भी नहीं करना चाहिए । ...वह छुटकारे का प्रयास नहीं करेगा । उसने तो यह तय कर रखा है कि वह रूक-रूककर नहीं, बल्कि लगातार चलता रहेगा । चलना ही उसकी पहचान है । वह तो ज़्यादा से ज़्यादा पाकर भी कभी ठहरा नहीं । उसने हमेशा यही समझा कि जो पा लिया है वह अब अपना कहाँ रहा...? जो नहीं पाया है- उसे पाना चाहिए । हासिल की गई सभी चीज़ें...बातें, अनुभव उसके स्टोर की सामाग्री ही तो हैं...। वह अपनी रफ़्तार भले तेज़ न करे...पर उसे कम भी नहीं करेगा ।

 

उसने ध्यान से घड़ी देखी । तीनों काँटों पर नज़र फेरी । तारीख वाले हिस्से पर निगाह डाली । सत्ताइस तारीख । नौ बजकर बाइस मिनट और उसके ऊपर से घूमता सेकेण्ड़ का लयबद्ध तरीके से आगे बढ़ता काँटा । दिन, महीना और साल उसे याद है । वह इन सबको नापता हुआ ही तो आगे बढ़ रहा है । उसे पहले अपने पिता याद आये । फिर उसने महसूस किया कि वह छोटा बच्चा हुआ जा रहा है । वह बाबू के साथ ऊँगली पकड़ कर चल रहा है । ऊँगली पकड़ कर चलते-चलते वह बार-बार ऊँगली के बंधन से अपने को मुक्त करके आगे-पीछे हो जाता । बापू उसे देखते, पर न तो उसे डाँटते...और,न ही उसे फौरन पकड़ने का प्रयास करते । वह कई बार काफी दूर तक अकेले चला जाता । कभी-कभी तो वह लगभग खो-सा जाता । बाबू जानते कि वह आसपास ही कहीं होगा...और वे उसे ढ़ूँढकर निकाल लोते । वह जान-बूझकर कभी छुपता नहीं । बाबू और वह एक-दूसरे का बर्ताव समझने लगे थे । वह बाबू के साथ अक्सर घूमने जाया करता । बाबू की याद उसे हमेशा आती है । और, जब वह घड़ी के पट्टे पर नज़र डालता...,या फिर, काँटों को ध्यान से देखता तो उसे बाबू याद आ जाते । आज वह पिता हो गया है । आज बाबू की जगह उसने ले ली है । पिता तो वह हो गया है, पर उसके पास आज बाबू नहीं हैं, बाबू नहीं है...। उनकी ऊँगली हथेली के भीतर नहीं है । बाबू की ऊँगली से उसकी हथेली फिसल गई है । वह आगे निकल आया है...। वह बाबू से बहुत आगे निकल आया है ।...नहीं-नहीं ...। वह नहीं, बल्कि बाबू आगे निकल गये हैं । वह तो पीछे चल रहा है । उसकी हथेली से बाबू की ऊँगली फिसल गई है । वह बाबू को ढूँढ़ रहा है । चारों तरफ़ बेचैनी से ढूँढ़ रहा है । बाबू उसे कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं, तो कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं । फिर, उसे लगता है कि नहीं...बाबू तो उसके पास हैं । उसके साथ चल रहे हैं । लगातार साथ । वह बाबू के साथ क्रमशः चलते हुए दृश्यों, चित्रों और वर्षों में खो गया । सात वर्ष, बारह वर्ष, पन्द्रह वर्ष, बीस वर्ष.... और बाइस वर्ष का हो गया, वह बाबू के साथ चलते-चलते । पर, उसे पता ही नहीं चला कि यह समय कैसे बीत गया । से बाबू याद आये तो दूसरी तरफ़ निशि भी याद आई । उसके व्यस्तता के कारण निशि उसे कितना मिस करती है । उसे निशि को इतना मिस नहीं करना चाहिए । उसे तेज़ी से अहसास होता है कि वह बाबू के साथ नहीं चल रहा, बल्कि वह स्वयं बाबू हो गया है । और, उसकी ऊँगली पकड़कर निशि चल रही है । निशि कितनी बड़ो हो गई, व्यस्तता जानती है वह उसकी... वह कभी कड़ा सवाल नहीं करती, पर जब पूछेगी तो वह क्या जवाब देगा ? और...कैसे जवाब देगा ? उसे कुछ समय में नहीं आ रहा । जब यह विचार उसके सामने गंभीरता से खड़ा होता तो वह उसे समय के हवाले कर देता वह मन ही मन सोचता है कि जब सवाल का हल तुरंत न निकलता नज़र आये तो उसे समय के हवाले कर देना चाहिए । वह ऐसा ही करेगा ।

 

भावना, हाँ अपने भीतर की भावना... भाषा और व्याकरण से कहीं ऊँची है । तभी तो भावना के बाद वेदना का पता चलता है । जब आदमी को अपने दुःख का पता चलता है, तभी वह दूसरे के दुःख में सहभागी हो सकता है । सम्-वेदना का इजहार कर सकता है वह सोचता है कि निशि कुछ कहती नहीं, पर क्या उसे उसकी वेदना का पता नहीं है । आज वह अपने सभी ज़रूरी काम तेज़ी से निपटाकर निशि की तरफ़ निकल जाएगा । पहाड़ो की सैर...। और, पंछियों के साथ रहना निशि को अच्छा लगता है । उसे भी तो पंछियों का साथ बहुत भाता है । ...वह भी तो बाबू का हाथ पकड़कर दूर तक निकल जाता था । उसे कई बार लगता था कि हाथ बढ़ाकर किसी पंछी को पकड़ लेगा...। पर, आश्चर्य उसकी हथेली...और यहाँ तक कि ऊँगलियों के दायरे में आने के बावजूद उसके हाथ कोई पंछी कभी नहीं आया । उसकी हथेली और ऊँगलियाँ वैसी की वैसी बनी रहीं । ऐसा नहीं कि इस प्रयास में असफल हो जाने के बाद वह दुःखी हो जाता, बल्कि उसे तो इस केल में मजा आता था । वह तो बढ़-बढ़कर और चारों तरफ़ दौड़कर इस खेल में देर तक खोया रहता, जब तक बाबू उसे आवाज़ नहीं दे देते- रमा...अब चलो भी...। वह बाबू की आवाज़ सुनकर फौरन खेल बंदकर उनकी तरफ़ लौट पड़ता । उसने किसी बात के लिए बाबू को कभी दुबारा आवाज़ नहीं देने दी । ...चाहती तो निशा भी ऐसा कर सकती थी । पर, निशा ने कभी उसकी आवाज़ नहीं सुनी । वह भावना नहीं समझी । निशा ने तो निशि तक ख्याल नहीं किया। उसने तो आवाज़ पर ध्यान ही नहीं दिया...। उसने बार-बार बताने पर भी पर एक बात का बुरा माना । बातों का अर्थ वह अपने ढ़ंग से निकालती रही । वह सोचता है कि जब किसी को कोई बात नहीं मानना है तो वह बात का अर्थ भी फिर, अपने हिसाब से निकालता है...। उसे नये-नये अर्थ देकर परिभाषित करता है ।

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