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(पद्मश्री
मेहरुन्निसा
परवेज़
की कहानी
पासंग का शेषांश क्रमश...)
''मजे
कर रही है,
दूल्हे के संग।
अच्छा तू बानो आपा की शादी को लेकर नाराज है न?
यह तो बडे लोगों ने तय किया है।
देख,
तू यह नहीं सोचती बानो आपा यहाँ रहेंगी तो रोज़ आती रहेंगी।
दूर गाँव चली जाती
तो कैसे आतीं?
कौन आने देता?
हम दोनों मिलकर बानो आपा का ख्याल रखेंगे न,
चल गुस्सा
थूक दे।''
''हाँ,
बात तो ठीक है,''
कनी के मन का उफान कुछ कम हुआ।
''देखा
बानो आपा के दादा और अब्बा कितने बुरे थे। वह तो समझो अब्बा
ठीक समय पर पहुँचे गये
थे,
वरना वह तो बानो आपा को बन्दूक की गोली से हिरनी की तरह मार
देते,''
कुलसुम
अपनी बहन जैसी आँखे घुमाते बोली।
''इससे
तो ठीक था न,
मार ही देते। ऐसे भी जीना
किस काम का,
इसे कोई जीना कहते हैं?
जानवरों की तरह है ऐसी ज़िंदगी।''
''मगर
इन्सान को जानवर की तरह मारते भी तो देखा नहीं जा सकता न?
अच्छा बाहर क्या अब्बा
बैठे हैं?''
''हाँ?
तुने नहीं देखा?''
''नहीं
मैं तो पीछे से चुपचाप आई थी।
अब्बा को मत बताना मैं आई थी,
कल ही अम्माँ पर बरस रहे थे कि लड़की बड़ी हो रही है,
सारा दिन धींकमस्ती करते घूमतीं है। मुझे तो लगता है कनी अब यह
लोग मेरी पढ़ाई भी
बन्द करवा देंगे और मेरी भी
शादी कर देंगे। अब्बा सुना है रिश्ता देख रहे
हैं।''
''अरे?''
कनी का चेहरा भय से सफेद पड़ गया,
आँखों में पानी उतर आया,
''बानो
आपा चली जाएँगी,
तू भी चली जाएगी,
सोच मैं कैसे रह पाऊँगी?''
''तेरी
भी
तो कहीं न कहीं शादी होगी। कोई दूल्हा ज़रूर अल्लाह ने पैदा
किया होगा। अम्माँ कहती
हैं,
अल्लाह हर इन्सान का जोड़ा भी पैदा करता है। वह भी कहीं न कहीं
तो होगा
न?''
''बाप
रे,
इतना कहकर मुझे मत डरा,
चल बानो आपा के कमरे में चलते
हैं।''
दोनों उठकर बानो आपा के कमरे में चली गईं। कुलसुम ने बानो आपा
को जगाया।
बहुत मुश्किलों से बानो आपा उठ पाईं।
कनी पलँग की पाटी पर बैठी बानो आपा को तकती
रही। बानो आपा का बुझा-बुझा सा रूप उसे डस रहा था। काश! खुदा
ने इंसानों की तकदीर
लिखने का काम उसे दिया होता,
तो वह दुनियाँ की तमाम औरतों के नसीब सुनहरे अक्षरों
से लिख देती। बानो आपा का नसीब और अम्माँ का नसीब सबसे अच्छा
लिखती। ऐसी इबारत
लिखती कि वह सारी उम्र सोने के पालने में ही झुलतीं। अल्लाह से
लड़-लड़कर सारी औरतों
का नसीब माँगती। अल्लाह ने तो नसीब लिखने का काम छठी को सौंप
रखा है। वही तो
उल्टे-सीधे नसीब औरतों के लिखती है। ख़ुद औरत होकर बुरे नसीब
की इबारत लिखती है।
क्या अल्लाह को इनके काम का मुआयना नहीं करना चाहिए?
उल्टे-सीधे नसीब लिखकर यह लोग
अल्लाह को बदनाम नहीं कर रहे?
ऐसे ही देखो मौत का फरिश्ता मलकूम-मौत किसी का भी घर
उजाड़ कर चला जाता है। अब्बा को जवानी में ले गया,
पूरा घर उनका उजड़ गया। काश! यह
लोग कहीं मिल जाते तो उनसे ज़रूर पूछती वह लोग इतने बेरहम
क्यों हैं?
अल्लाह तो रहम
करता है पर यह लोग उसकी नाफरमानी क्यों करते हैं?
लोगों का घर क्यों उजाड़ देते हैं?
दुनियाँ में बुरे नसीब लेकर पैदा होने से क्या फायदा?
कुछ तो सुख-चैन,
अपनों का
प्यार लिखना चाहिए न?
सबको बराबर से सुख और दुःख बाँटना चाहिए न?
कहीं तो सुख ही
सुख और कहीं दुःख ही दुःख ऐसा क्यों?
क्या अल्लाह को कुछ पता नहीं होता?
दादी कहती
हैं अल्लाह शबरात की रात पहले आसमान पर आते हैं और दुनियाँ के
सारे बन्दों की
किस्मत का हिसाब-किताब देखते हैं। पूरे बरस का दुःख और सुख
देते हैं,
इसलिए बन्दों
को इस रात इबादत करके खुदा से माँगना चाहिए। तो अल्लाह सिर्फ़
साल में एक बार पहले
आसमान पर आते हैं,
बाकी दिन सातवें आसमान पर रहते हैं?
ऐसा क्यों?
तभी तो उन तक
दुआएँ नहीं पहुँचती,
उनके फरिश्ते इन्सानों की बात ठीक से नहीं लिखते।
काश!
अल्लाह मियाँ हमेशा पहले आसमान पर होते और देखते इन्सान कितने
दुःख में पागल हो रहे
हैं। उनके फरिश्ते माँ को बेटे से और बेटे से माँ को छीन रहे
हैं। ऐसी बदइन्तेजामी
से दुनियाँ कैसे चलेगी?
कहीं किसी ने बानोआपा के लिए जादू-टोना तो नहीं किया है?
दादी बताती हैं कि पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब पर भी दुश्मनों
ने जादू किया था,
वह
बीमार रहने लगे थे। तब एक जादू के जानकार आदमी ने अपने अमल की
बैठक की थी और उससे
उसने पता लगाया था कि एक अंधे कुएँ में पत्थर के नीचे ग्यारह
गिठान बाँधकर जादू
किया था। उस व्यक्ति ने अपने अमल से जादू को तोड़ किया।
जैसे-जैसे अमल पढ़ते गए
वैसे-वैसे गिठान टूटती गई। टूट-टूट कर गिरती गई। लोग तो इतने
बुरे हैं कि पैगम्बरों
को भी नहीं छोड़ा तो बानो आपा तो एक लड़की ही हैं।
दादी बताती हैं पहले अल्लाह ने
इन्सान नहीं बनाया था,
जिन्नात बनाये थे। वही दुनिया में रहते थे। उन्हीं का राज्य
था। खुदा ने जिन्नातों को एक ही ताकत दी थी और रूहानी ताकत थी
और इनकी यही ताकत
बहुत तगड़ी थी,
जिससे यह किसी को भी डरा कर अपने बस में कर लेते थे। इनका
राज्य
पाताल में था,
जो अभी भी है। इनसे परेशान होकर अल्लाह ने इन्सान बनाये और इसे
दोहरी
ताकत दी। एक रूहानी और दूसरी जिस्मानी याने आत्मा और शरीर। दो
ताकतों के बावजूद भी
इन्सान जिन्नातों के आगे,
जादू-टोने के आगे,
शैतानी ताकतों के आगे हार जाता
है।
बानो आपा पर भी किसी ने जादू तो नहीं कर दिया?
एक के बाद एक मुसीबतें उन्हीं
पर क्यों आ रही हैं?
वह बगावत क्यों नहीं करती?
हार क्यों जाती हैं?
टूटती क्यों
हैं?
जब भी कभी बानो आपा रात को चुपचाप कनी से अपने बच्चे के बारे
में पूछतीं कि
वह कैसा दिखता था?
क्या उसकी शक्ल पाकिस्तान गये लोगों से मिलती है?
तब कनी बौखला
जाती,
सन्न-सी रह जाती थी। क्या जवाब दे?
कब तक झूठ कहकर बानो आपा को तसल्ली दे?
झूठ-झूठ ही वह बच्चे के बारे में बताती रहती। उसकी नाक बानो
आपा जैसी है,
होंठ-आँख
एकदम उनके जैसे हैं। सच तो यह था कि उसने भी बच्चे को नहीं
देखा था,
ज़रा सी झलक भर
देखी थी। कल्पना में वह किसी बच्चे की सूरत उतारती और बानो आपा
उस तस्वीर को सच मान
लेतीं थीं। उसकी आँखों में झाँक कर अपने बच्चे की सूरत देखने
की कोशिश करती थीं।
क्या यह सारी बातें अल्लाह को पता होंगी?
और अगर वह जानता है तो अनजान क्यों है?
अपने रहमत के फरिश्तों को राहत-सुकून पहुँचाने क्यों नहीं
भेजता?
या मेरे अल्लाह!
अपने रहमत के फरिश्तों को ज़ल्दी भेज,
देख बानो आपा कितनी बीमार हैं। मन ही मन कनी
अल्लाह से दुआ माँगती रही।
परीक्षाओं के दिन सर पर थे। पढ़ाई करते-करते कनी कब
पढ़ते-पढ़ते औंधी हो जाती,
पता ही नहीं चलता था। जब बानो आपा आकर उसे किताबों पर से
उठातीं और लालटेन उठाकर तिपाई पर रखतीं तब हड़बड़ाकर वह जागती थी
और उठकर अपने कमरे
में जाकर पलंग पर सो जाती। बानोआपा उसकी किताबें-कापियाँ
समेटती रहतीं।
आज भी वह
पढ़ाई में व्यस्त थीं। कुलसुम भी साथ पढ़ रही थी। आज दोनों ने तय
किया था कि जब वह
खिड़की से धूप का गोला उतर कर उन तक नहीं पहुँचेगा,
तब तक उठना नहीं है। आधी दोपहर
तक पढ़ना था। दोनों सब कुछ भूलकर पढ़ाई में व्यस्त थीं। अगले माह
परीक्षा जो होने
वाली थी।
इतिहास की पुस्तक थी,
उसमें एक पुराने महाराजा का चित्रा छपा था जो
देखने में काफी मोटा और भद्दा था। उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें भवों को
छू रही थीं। वह
महाराजा कम किसी रामलीला का मसखरा ज़्यादा लग रहा था। पेट भी
मटके की तरह फूला हुआ
था। दोनों एक-दूसरे को दिखा-दिखाकर लोट-पोट हो रही थीं। अचानक
कमरे में कोई परदा
उठाकर आया तो दोनों एकाएक चुप हो गईं।
सामने मोटी सी काया वाली बिस्मिल्लाबाई
खड़ी थीं। दोनों चौंक गईं। बिस्मिल्लाबाई की सूरत पुस्तक के
चित्रा से काफी मिल रही
थी। मोटी थी वह वैसी ही थीं। सब लोग उन्हें बिस्सों कहते थे।
हर घर में शादी ब्याह
में ढोलक बजाना और ब्याह के गीत गाना उनका काम था। ठिगनी और
मोटी सी थीं,
आँखें
धँसी सी थीं। मुँह में तम्बाकू वाला पान हमेशा ठुँसा रहता,
पान की पीक होठों के
किनारे से बहती ठुड्डी तक उतरती,
तो उसे वह अपने अँगूठे से पोंछती रहती थीं।
हाथ-हाथ भर चूड़ियाँ पहने रहतीं थीं। हँसी-ठिठोली करने वाली
हँसमुख औरत थीं। बिस्सो
बाई का चूड़ियों वाला मोटा हाथ जब छनाकेदार ढोलक पर पड़ता तो
उसकी थाप सारे मोहल्ले
के कोने-कोने में सुनाई देती। बिस्सो बाई की ढोलक सारे मोहल्ले
को मुनादी कर देती
थी कि ब्याह का शगुन शुरू हो गया है। वह चलती थीं तो ठुमकी
लगाकर चलती
थीं।
क्रमशः आगे पढें....
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