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आचार्य
हजारी प्रसाद द्विवेदी जन्मशतवार्षिकी पर
राष्ट्रीय संगोष्ठी
संपन्न
साहित्य
अकादमी, नई दिल्ली का विशिष्ट आयोजन
वाराणसी।
प्रख्यात चिंतक,
आलोचक,
उपन्यासकार, आचार्य हजारी प्रसाद
द्विवेदी जन्मशतवार्षिकी के मौक़े पर इस अप्रतिम पुरखे को याद
करते हुए साहित्य अकादमी नई दिल्ली,
के तत्वाधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी वाराणसी
के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन सभागार में
संपन्न हुआ। इस आयोजन में देश के तमाम साहित्यकार,
समालोचक, आलोचक
आदि ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई।
इस मौके पर पहले दिन प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में
प्रख्यात साहित्यकार व आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी संस्कृत की शास्त्रीय परंपरा के
हिन्दी आलोचक थे,
जिनकी आलोचना की भाषा जीवंत हिन्दी है।
उनमें सोना व कसौटी दोनों का रंग था। सोना का संदर्भ पंडित जी
की रचना से है तो उनकी आलोचनाओं में सर्जना दिखाई देती है।
उन्होने यह भी कहा कि अधिकांशत: साहित्यकार द्विवेदी जी के
बारे में ग़लत दृष्टि डालते है। विशेषकर काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय में ऐसा होता है। संस्कृत के अध्यापकों को ध्यान
में रखकर उनके बारे में बात करना ग़लत होगा। उनकी रचानाओं में
दोहरा चरित्र दिखता है। अपनी ही रचनाओं की वह आलोचना भी करते
हैं। 'अनाम दास का पोथा'
उनके उपन्यासों की पराकाष्ठा लगती है।
इसमें वह विवाह नहीं उद्वाह की बात करते हैं जो मुख से होता
है। उनकी आलोचना में भी सर्जनात्मक प्रतिभा दिखती है।
मुण्डकोपनिषद की एक उक्ति का हवाला देते हुए उन्होंने कहा
द्विवेदी जी के भीतर दो व्यक्ति परिलक्षित होते हैं,
जिसमें एक रचाता है और दूसरा देखता-परखता
है। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी में कारयत्री व भावयत्री
प्रतिभा का अद्भुत समन्वय था। वह पं. रामवतार शर्मा,
राहुल सांस्कृत्यायन व पं. चन्द्रधर शर्मा
गुलेरी की परंपरा के साहित्यकार थे जो मूलत: संस्कृत के
विद्वान होते हुए भी हिन्दी प्रेमी थे। द्विवेदी जी ने अपने
उपन्यासों की आधार समाग्री कालिदास व बाणभटट् से ली है,
उसमें अपभ्रंश व प्राकृत की लोक कलाओं का
सम्मिश्रण है। सबसे पहले उनके साहित्य में ही स्त्री व दलित
विमर्श दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने यह भी कहा की रामचन्द्र
शुक्ल जी ने उपन्यास के संबंध में जो विचार दिए,
उससे द्विवेदी जी प्रभावित नज़र आते है।
शुक्ल जी ने कादंबरी और हर्षचरित से हिन्दी कथाकारों को
प्रेरणा लेने का सुझाव दिया है और द्विवेदी जी ने इसे किया है।
अध्यक्षता करते हुए कवि व आलोचक अशोक
वाजपेयी ने कहा कि द्विवेदी जी से पहले कोई सार्वजनिक आलोचक
नहीं हुआ उन्होंने अपनी कृतियों में परंपरा व आधुनिकाता के
द्वैत का अतिक्रमण किया है। इस लिए उनकी रचनाओं में परंपरा व
आधुनिकाता के साथ निर्भयता दिखती है। उन्होंने 'साहित्य
गल्पता' की बात की है। उनके चिंतन
में पश्चिम से अनाक्रांता आधुनिक व्यक्ति मौज़ूद था। यह ख़ूबी
बनारस के जयशंकर प्रसाद और त्रिलोचन शास्त्री की रचनाओं में ही
दिखती है। उनमें भारतीय परंपरा के केन्द्रीय भाव-अभयता की
भावना विद्यमान थी। बाजपेयी ने यह भी कहा कि द्विवेदी जी से
पहले हिन्दी में कोई सार्वजनिक बुध्दिजीवी नहीं था। उनका
व्याख्यान सुनने केलिए लोग लालायित रहते थे। वह श्रोताओं को
बाँध लेते थे।
बीजभाषण करते हुए कवि डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि
द्विवेदी जी की रचनाएं व्यक्ति के आत्यंतिक चित्ता को ध्यान
में रखकर की गई है। उनका व्यक्तित्व कबीर से प्रभावित था। उनके
जीवन की बाती दोनों सिरों पर जलती है,
जिसका एक सिरा परम्परागत ज्ञान है तो दूसरा
ज्ञान-विज्ञान। उनके एक तरफ से आधुनिकता तो दूसरी ओर परंपरा
गुज़रती है। उन्हे हर पीढ़ी के लोग इसलिए स्वीकार करते हैं
क्योंकि अपनी कृतियों के माध्यम से वह कबीर की तरह चौराहे पर
खड़े दिखते है। उनकी कृतियाँ मॉडर्न क्लासिक्स हैं।
विशिष्ट अतिथि व आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के पुत्र
मुकुंद द्विवेदी ने अपने पिता की रचनाओं का ज़िक्र करते हुए
कहा कि साहित्य में पिता जी की स्थिति लगभग अजातशत्रु जैसी है।
वहीं उन्होंने अपने पिता द्विवेदी जी के शांति निकेतन प्रवास
के दौरान के कई संस्मरण सुनाए। जो काफी दिलचस्प रहा। साहित्य
अकादमी के उप सचिव ब्रजेंद्र त्रिपाठी ने गोष्ठी का संचालन
करते हुए कहा कि द्विवेदी जी कबीर को हाशिये से उठाकर समाज के
सामने लाने का काम किया। साहित्य अकादमी के सचिव अग्रहार
कृष्णमूर्ति ने स्वागत भाषण में कहा कि द्विवेदी जी ने हिन्दी
निबंध को नया आयाम दिया।
संगोष्ठी का पहाला सत्र 'उपन्यास
की भारतीय अवधारणा और हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास'
व दूसरा सत्र 'हजारी
प्रसाद द्विवेदी के निबंध' पर
केन्द्रित विषय पर क्रमश: काशीनाथ सिंह,
शंभूनाथ,
रवींद्र त्रिपाठी, गंगाप्रसाद विमल,
प्रो. अवधेश प्रधान ,
प्रो. बलिराज पाण्डेय,
प्रो. चन्द्रकला त्रिपठी,
डॉ. अरविंद त्रिपठी व यतींद्र मिश्र ने
अपने-अपने विचार व्यक्त किए।
दूसरे दिन समापन के अवसर पर संगोष्ठी की
शुरुआत तृतीय सत्र से हुई। जिसमें 'हजारी
प्रसाद द्विवेदी की इतिहास दृष्टि'
विषय पर अध्यक्षता करते हुए डॉ. रमेश कुंतल मेघ ने कहा कि
द्विवेदी जी इंडोलॉजी ट्रेडीशन व व्यास परंपरा के रचनाकार थे।
वह मिथकीय काल से चलकर कई काल की कल्पना करते हैं। डॉ. भगवान
सिंह ने द्विवेदी जी की रचना प्रक्रिया पर कई पहलुओें से अपनी
दृष्टि डाली। कहा इतिहास की बातों में द्विवेदी जी की रचनाओं
में सटीकता नहीं मिलती। लेकिन इतिहास के बारे में उनकी दृष्टि
नकारात्मक नहीं है। वह इतिहस को अपने ढंग़ से देखते हैं वह
गंभीरता व तथ्यपरकता का उपहास करते हैं। परंतु गहरे स्तर पर
मर्म दृष्टि के रूप में समर्थन करते भी दिखते है।
संगोष्ठी के समापन सत्र में बतौर मुख्यवक्ता साहित्य अकादमी के
पूर्व सचिव इंद्रनाथ चौधुरी ने कहा कि द्विवेदी जी में सत्य की
आकांक्षा थी। वह शास्त्र व लोक को एक दूसरे के अनुपूरक रूप में
देखते हैं। अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात रंगकर्मी नंदकिशोर
आचार्य ने कहा कि द्विवेदी जी की इतिहास दृष्टि अरविंद की जीवन
दृष्टि से मेल खाती है। यह मनुष्य की चेतना का विकास है,
इसमें से ही परंपरा विकसित होती है।
साहित्यकार गिरीश पंकज व ज्योतिष जोशी ने भी अपने विचार व्यक्त
किए। धन्यवाद भाषण कवि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने किया। इस के
पूर्व 'हजारी प्रसाद द्विवेदी की
इतिहास दृष्टि व उनके लालित्य चिंतन पर आधारित तीन सत्रों में
गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिनकी अध्यक्षता क्रमश: रमेश कुंतल
मेघ, वागीश
शुक्ल व कमलेश दत्ता त्रिपाठी ने किया।
(सुभाष
कुमार गौतम,
हिन्दी पत्रकारिता,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी 05)
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