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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

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।। गीत ।।

 

 

बात करें हम दीवारों से

 

अपनों ने मुँह फेर लिया तो, बात करें हम दीवारों से ।
फूलों ने नाता तोडा है, गुजर रहे हम अंगारों से ।।


करते आये मदद सभी की, होम किया और हाथ जलाए ।
छोडो बातें उन गैरों की, धोखा खाया है यारों से ।।


गैरों को अपने लगते थे, गैर हो गए हम अपनों में ।
तलवारों से हुए न घायल, आहत फूलों की मारों से ।।


वादों की दुनियाँ में जीते, आश्वासन कोरे झाँसे हैं ।
सुनते सुनते कान पक गए, पेट नहीं भरता नारों से ।।


थैली में आटा आता है, किल्लत गैस सिलैंडर की भी ।
गिन गिन कर रोटी बनती है, कौन खिलाए मनुहारों से ।।


ऊँची बहुत हवेली होती, आसमान से बातें करते ।
अर्श फर्श पर गिर गया अब तो, नीचे आए चौबारों से ।।


दीखा नहीं सूर्य वो दिन भर, काली रात घनेरी आयी ।
पूनम का चन्दा गायब है, आसमान खाली तारों से ।।


समीकरण कुछ ऐसे बैठे, कथनी करनी के अन्तर में ।
दुश्मन तो नजदीक दिख रहे, दूर हो रहे हैं प्यारों से ।।


मिशन नहीं प्रोफेशन सब में, मूल्य तथा आदर्श लुप्त हैं ।
देश भक्त ढूँढे ना मिलते, घिरे हुए हैं गद्दारों से ।।

      डॉ. विद्यासागर शर्मा

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ग़ज़ल

शकील ग्वालियरी

- हमारे पास कुछ होता तो

- किसी शै की कमी है

- कोई सूरज है तो आए

- कहाँ पड़ रहे हैं क़दम

- बाज़ारों में क्या रक्खा है

ख़याल खन्ना

मधुकर अष्ठाना

देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'

गीत

डॉ. अजय पाठक

महावीर शर्मा

डॉ. विद्यासागर शर्मा

जगत प्रकाश चतुर्वेदी

वचन श्रीवास्तव

दोहा

रामनिवास मानव

चुटकियाँ

अभिनव शुक्ला

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