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बात करें हम दीवारों से
अपनों ने मुँह फेर लिया तो,
बात करें हम दीवारों से ।
फूलों ने नाता तोडा है,
गुजर रहे हम अंगारों से ।।
करते आये मदद सभी की,
होम किया और हाथ जलाए ।
छोडो बातें उन गैरों की,
धोखा
खाया है यारों से ।।
गैरों को अपने लगते थे,
गैर हो गए हम अपनों में ।
तलवारों से हुए न घायल,
आहत फूलों की मारों से ।।
वादों की दुनियाँ में
जीते,
आश्वासन कोरे झाँसे हैं ।
सुनते सुनते कान पक गए,
पेट नहीं भरता नारों से
।।
थैली में आटा आता है,
किल्लत गैस सिलैंडर की भी ।
गिन गिन कर रोटी बनती
है,
कौन खिलाए मनुहारों से ।।
ऊँची बहुत हवेली होती,
आसमान से बातें करते ।
अर्श फर्श पर गिर गया अब तो,
नीचे आए चौबारों से ।।
दीखा नहीं सूर्य वो दिन
भर,
काली रात घनेरी आयी ।
पूनम का चन्दा गायब है,
आसमान खाली तारों से ।।
समीकरण कुछ ऐसे बैठे,
कथनी करनी के अन्तर में ।
दुश्मन तो नजदीक दिख रहे,
दूर हो रहे हैं प्यारों से ।।
मिशन नहीं प्रोफेशन सब में,
मूल्य तथा आदर्श
लुप्त हैं ।
देश भक्त ढूँढे ना मिलते,
घिरे हुए हैं गद्दारों से ।।
डॉ. विद्यासागर शर्मा
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