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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। गीत ।।

 

 

गीत तो गाये बहुत

 

गीत तो गाए बहुत जाने अजाने
स्वर तुम्हारे पास पहुँचे या ना पहुँचे कौन जाने!

 

उड़ गए कुछ बोल जो मेरे हवा में
स्यात् उनकी कुछ भनक तुम को लगी हो,
स्वप्न की निशि होलिका में रंग घोले
स्यात् तेरी नींद की चूनर रंगी हो,

भेज दी मैं ने तुम्हें लिख ज्योति पाती,
सांझ बाती के समय दीपक जलाने के बहाने।

 

यह शरद का चांद सपना देखता है
आज किस बिछड़ी हुई मुमताज़ का यों,
गुम्बदों में गूंजती प्रतिध्वनि उड़ाती
आज हर आवाज़ का उपहास यह क्यों?

संगमरमर पर चरण ये चांदनी के
बुन रहे किस रूप की सम्मोहिनी के आज ताने।

 

छू गुलाबी रात का शीतल सुखद तन
आज मौसम ने सभी आदत बदल दी,
ओस कण से दूब की गीली बरौनी,
छोड़ कर अब रिमझिमें किस ओर चल दीं,

किस सुलगती प्राण धरती पर नयन के,
यह सजलतम मेघ बरबस बन गए हैं अब विराने।

 

प्रात की किरणें कमल के लोचनों में
और शशि धुंधला रहा जलते दिये में,
रात का जादू गिरा जाता इसी से
एक अनजानी कसक जगती हिये में,

टूटते टकरा सपन के गृह-उपगृह,
जब कि आकर्षण हुए हैं सौर-मण्डल के पुराने।

स्वर तुम्हारे पास पहुँचे या न पहुँचे कौन जाने!

    महावीर शर्मा

7 Hall Street

London

N12 8DB, U.K.

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ग़ज़ल

शकील ग्वालियरी

- हमारे पास कुछ होता तो

- किसी शै की कमी है

- कोई सूरज है तो आए

- कहाँ पड़ रहे हैं क़दम

- बाज़ारों में क्या रक्खा है

ख़याल खन्ना

मधुकर अष्ठाना

देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'

गीत

डॉ. अजय पाठक

महावीर शर्मा

डॉ. विद्यासागर शर्मा

जगत प्रकाश चतुर्वेदी

वचन श्रीवास्तव

दोहा

रामनिवास मानव

चुटकियाँ

अभिनव शुक्ला

 

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