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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

थकी दुपहरी साँझ ढ़ली रे

 

श्रम का सूरज अस्ताचल में,
बैठ गया जाकर सुस्ताने ।
दूर क्षितिज के तारा पथ से,
लगी चाँदनी आने-जाने ।
ठंडी-ठंडी वहा चली रे,
थकी दुपहरी, साँझ ढली रे ।

लौट चले हैं थकन भुलाने,
परदेशी पंछी बेचारे ।
कलरव का नवताल मुखर है,
डाल-डाल बैठे हैं सारे ।
लगती यह गुंजार भली रे,
थकी दुपहरी, साँझ ढली रे ।

राह-राह पर अब लगती है,
पगध्वनियों की आहट मद्धिम ।
जैसे तोड़ रहा है कोई,
साँसों की सीमाएँ अंतिम ।
मौन रही सुनसान गली रे,
थकी दुपहरी, साँझ ढली रे।


 
 
  डॉ. अजय पाठक

लेन-3, विनोबा नगर

 बिलासपुर, छत्तीसगढ़


 ◙◙◙

 

ग़ज़ल

शकील ग्वालियरी

- हमारे पास कुछ होता तो

- किसी शै की कमी है

- कोई सूरज है तो आए

- कहाँ पड़ रहे हैं क़दम

- बाज़ारों में क्या रक्खा है

ख़याल खन्ना

मधुकर अष्ठाना

देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'

गीत

डॉ. अजय पाठक

महावीर शर्मा

डॉ. विद्यासागर शर्मा

जगत प्रकाश चतुर्वेदी

वचन श्रीवास्तव

दोहा

रामनिवास मानव

चुटकियाँ

अभिनव शुक्ला

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