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कोई सूरज
है तो आए
राते के दरया में जब डूबा
किनारा शाम का
हाथ भर ऊँचा रहा होगा सितारा
शाम का
आसमां उसने सजाया था हमारे ही
लिये
हम उठे तो पोंछ डाला रग सारा
शाम का
डूबते हैं रोज़ सूरज की तरह
इस झील में
वो जो वादा था कभी
हमसे तुम्हारा शाम का
उसको आना था नहीं आया जलाने को चराग़
रख लिया ख़ाशाक1
पर हमने शरारा शाम का
कोई सूरज है तो आए रौशनी के सामने
कोना-कोना जुगनुओं ने छान मारा शाम का
शाम होते ही नज़र आते हैं मस्जिद में 'शकील'
रिन्द
होते तो समझते भी इशारा शाम का
1 कुड़ा करकट
शकील ग्वालियरी
लोहागढ़,
लश्कर
ग्वालियर -
474001
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