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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

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।। दोहा ।।

 

 

रिश्तों में है रिक्तता

 

अरी व्यवस्था धन्य तू, रचती क्या-क्या रास।

रावण सत्त भोगते, और राम वनवास॥

 

डाकूजी मुखिया बने, चोर-उचक्के पंच।

अब सामाजिक न्याय का, खूब सजा है मंच॥

 

कुंठित है सब चेतना, लक्ष्यहीन संधान।

टेक बने हैं देश की, अब बौने प्रतिमान॥

 

अभयारण्य आज बना, सारा भारत देश।

संरक्षित शैतान हैं, संकट में दरवेश॥

 

गांव बने हैं छावनी, बस्ती-बस्ती जेल।

फिर भी होता है यहां, खुला मौत का खेल॥

 

आहत अपहृत रोशनी, अंधकार की क़ैद।

खड़ी घेरकर आंधियां, पहरे पर मुस्तैद॥

 

वट-पीपल के देश में, पूजित आज कनेर।

बूढ़ा बरगद मौन है, देख समय का फेर॥

 

बदले सभी विकास ने, जीवन के प्रतिमान।

घूंघट अब करने लगा, बिकनी का सम्मान॥

 

अब वह आल्हा की कहां, रही सुरीली तान।

कजरी, ठुमरी, फाग को, तरस गये हैं कान॥

 

बढ़ते-बढ़ते यूं बढ़े, जीवन में संत्रास

नियति आदमी की बने, सुरा और सल्फ़ास॥

 

रिश्तों में है रिक्तता, सांसों में संत्रास

घर में भी अब भोगते, लोग यहां वनवास॥ 

   डॉ. रामनिवास मानव

     706, सैक्टर-13,

हिसार-125005 (हरियाणा)

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ग़ज़ल

शकील ग्वालियरी

- हमारे पास कुछ होता तो

- किसी शै की कमी है

- कोई सूरज है तो आए

- कहाँ पड़ रहे हैं क़दम

- बाज़ारों में क्या रक्खा है

ख़याल खन्ना

मधुकर अष्ठाना

देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'

गीत

डॉ. अजय पाठक

महावीर शर्मा

डॉ. विद्यासागर शर्मा

जगत प्रकाश चतुर्वेदी

वचन श्रीवास्तव

दोहा

रामनिवास मानव

चुटकियाँ

अभिनव शुक्ला

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