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सृजनगाथा

 

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वर्ष-3, अंक-25, जून, 2008

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।। भाषांतर ।।

 

 पंजाबी उपन्यास(धारावाहिक-7)

रेत


हरजीत अटवाल

अनुवादः सुभाष नीरव

 

(आपने अब तक पढ़ा - भाग एक / भाग दो / तीन / चार/पाँच/छः) आगे पढ़िए-संपादक

 

दूसरा हार्ट-अटैक हुआ तो डैडी को साथ ले गया। हम पीछे रोते रह गये। उनका शरीर बहुत कमजोर हो चुका था। इतने वर्षों की बीमारी ने सारी ताकत छीन ली थी। डैडी हर समय अपने आप को नदी किनारे का पेड़ कहते रहते। कभी-कभी मुझे भी लगने लगता कि डैडी अब अधिक दिन नहीं निकालेंगे। जब कभी भी डैडी के बग़ैर मैं अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचती, तो मेरा रोना निकल पड़ता कि कैसे जीऊँगी।

नीता के विवाह पर वह बहुत खुश थे। नीता का विवाह किसी दूर के रिश्तेदार के परिवार में हो गया था। उस समय कई बार कहने लगते, अब तो बेशक भगवान उठा ले, ऐसी ज़िन्दगी से तो...।"

फिर, वह बिन्नी के विवाह की फिक्र करने लगते। मृत्यु से एक सप्ताह पहले ही मुझसे कहा था, बिन्नी इक्कीस साल का हुआ तो ब्याह देना है। बेटे, अगर मैं न हुआ तो यह काम कर देना।"

यूँ ही बैठे हुए हम गम्भीर बातें करने लगते। मम्मी शोर मचाती कि शुभ-शुभ बोलो।

डैडी के बाद हम सब उदास हो गये। क्रिया-कर्म की सारी रस्म संधू अंकल ने पास खड़े होकर करवाई। गुरुद्वारे में ही पाठ रखवाकर भोग डाला। भोग पड़ने तक घर में रोना-धोना होता रहा। मैंने तो इतना रोना कभी देखा ही नहीं था। जब कोई औरत मिलने आती, तो मम्मी और मेरे गले लगकर रोना शुरू कर देती। कुछ दिनों के बाद मेरा तो रोना निकलना ही बन्द हो गया था। कोई आता तो मैं परी को लेकर ऊपर जा चढ़ती। परी भी डैडी से बहुत जुड़ गयी थी। उसने भी रो-रोकर बुखार चढ़ा लिया था। मुश्किल से ठीक हुई।

हम सब डैडी की अस्थियाँ लेकर इंडिया गये। नीता भी जाना चाहती थी, पर उसे महिंदर ने जाने नहीं दिया। इंडिया पहुँचने पर फिर रोना-धोना शुरू हो गया। गाँव की औरतों ने मम्मी को बीच में बैठाकर, रुला-रुलाकर उसका बुरा हाल कर दिया। वे तरह-तरह के कीरने (नाम ले-लेकर विलाप करना) डालने लगतीं, जो मेरी समझ में ही न आते। मम्मी का तो सिर दुखना ही था, मेरा भी सिर दिनभर चकराता रहता। मातम के लिए लोगों का आना खत्म हुआ, तब जाकर कहीं सांस आया।

तभी, मैं बुआ के साथ बातों में व्यस्त रहने लगी। वैसे तो मुझे बुआ का हमेशा ही ख़याल रहता था, इंडिया आकर सबसे पहले उसी के गले लगी थी। उसके गले लगकर मुझे चैन आया था, पर इतने लोगों के बीच बहुत-सी बातें नहीं हो सकी थीं। रात में मैं बुआ के पास ही सोती। रात भर हम बातें करती रहतीं। बुआ अब पहले जैसी सेहतमंद नहीं रही थी। उसका शरीर ढल रहा था, पर उसमें रौब पहले जैसा ही था। घर के बच्चे उससे डरते थे। जब वे लड़ते तो उनमें से लड़कियाँ बुआ के पास आकर आसरा खोजतीं। मैंने एक दिन उससे कहा, बुआ, मैं तुझे बहुत याद किया करती हूँ।"

क्यों भई, तू किसलिए मुझे याद किया करती है ?  तूने क्या लेना है मेरे से ?  तू अपना घर सम्भालती है, हीरे जैसी बेटी (परी) को बाप के प्यार से दूर कर दिया।" कहते हुए वह ढुसकने लगी। मुझे हैरानी हुई कि मम्मी की तरह यह भी मेरे सिर ही इल्ज़ाम लगा रही थी। मुझे तो आस थी कि बुआ मेरे साथ खड़ी होगी। वह फिर कहने लगी, आदमी से एक पैर दूर होओ तो आदमी सौ पैर दूर हटता है... हमें तो वो आदमी अच्छा लगता था भई।"

इंग्लैंड में पक्का हो गया, उसे और क्या चाहिए था।"

पर तूने छोड़ा क्यों ?

बुआ, मैंने नहीं, उसने छोड़ा मुझे।"

अच्छा, तेरे चाचा लोग गये थे उसके बाप के पास। वह कहता था कि लड़की ही तलाक दे रही है। इन्होंने तेरे डैडी को चिट्ठी भी लिखी थी, पर उसने जवाब ही नहीं दिया।"

मैं कुछ कहना चाहते हुए भी चुप रही। बुआ भी और कुछ न बोली। एक अजीब-सी खामोशी कि अगर समय से मम्मी न आ जाती तो पता नहीं क्या हो जाता। शायद, मैं और बुआ दोनों ही बुक्का फाड़ कर रोने लगतीं। मम्मी आकर बुआ की चारपाई पर बैठ गयी और परी की ओर इशारा करते हुए बोली, अब थोड़ा खेल रही है, नहीं तो मेरे साथ ही चिपटी फिरती थी।"

परी खेलती-खेलती मेरे पास आ गयी। बुआ ने उसे अपने पास बुला कर सिर पर हाथ फेरा और मुझसे पूछा, इसका बाप इसे देखने तो आता ही होगा ?

मैं कुछ न बोली। मम्मी ने मेरी ओर देखकर उसे बताया, बीबी, तेरी गुड़ती ने मेरी बेटी की लैफ तबाह कर दी।"

हाय भाभी ! मैंने क्या किया ?

तूने अपनी सारी हेकड़ी इसमें भर दी, नाक पर मक्खी नफ़ीं बैठने देती, अच्छा-भला घर उजाड़ कर रख दिया।"

मम्मी रोने लगी। बुआ भी। मैंने बुआ को दिलासा देते हुए कहा, बुआ, तू मम्मी के कहे पर गुस्सा न हो, इसे पता नहीं चलता कि कौन-सी बात करनी है, कौन-सी नहीं। डैडी के बाद तो यह वैसे ही रह गयी।"

नहीं बेटी, तेरी माँ इतनी सीधी भी नहीं, यह भी सच है। अगर मेरी किस्मत का साया तेरे ऊपर पड़ गया तो बता मैं क्या करूँ।"

नहीं बुआ, ऐसा कुछ नहीं हुआ। रवि ही मेरे साथ नहीं रहना चाहता था। अब तुझे सारी बातें क्या बताऊँ, डैडी के साथ उसका व्यवहार ऐसा था कि सुनकर शर्म आ जाये, ऐसे बन्दे के साथ मैं कहाँ रह सकती थी। मैं इसी तरह अधिक खुश हूँ, मम्मी को क्या।"

हाँ-हाँ, मुझे क्या !  मैं तो माँ हूँ, आंतें तो मेरी अन्दर से झुलस गयीं, तू कहती है मुझे क्या।"

बेटी, अगर कोई सबब बनता है तो बना ले, आदमी के बगै़र औरत की इज्ज़त नहीं।"

बुआ, इंग्लैंड में ऐसा नहीं होता। वहाँ अकेली औरत को कुछ नहीं होता। और फिर, मेरी ज़िन्दगी तो परी को पालने में ही निकल जाएगी।"

ज़िन्दगी सिर्फ़ बाल-बच्चे पालना ही नफ़ीं ... ।" बुआ कुछ कहते-कहते रुक गयी। अब बुआ मेरे संग और भी खुलकर बातें करने लगतीं। रवि के बारे में बहुत से सवाल पूछती। जब मैंने बताया कि रवि मुझे मारा-पीटा करता था तो बुआ को बहुत गुस्सा आया। उसकी तेज चलती सांसें बता रही थीं कि वह कितना दु:खी हुई थी। फिर, उसने रवि को लेकर कई दिनों तक कोई बात नहीं की थी।

एक दिन मैंने बुआ से पूछ ही लिया, बुआ, तू मुझे बहुत सलाहें देती है, तुझे कभी मर्द की ज़रूरत महसूस नहीं हुई ?

चल, पगली कहीं की। ऐसा नहीं सोचते... मैं तो पाठ करने लगती थी, पूरा पाठ मुँह-जुबानी याद है। और फिर, बाप की पगड़ी का भी तो ध्यान था।"

मेरे चाचा, ताऊ और उनके बच्चों को मिलाकर बहुत बड़ा परिवार बन जाता था। शोक की रस्में खत्म होने के बाद फिर से चहल-पहल वाला माहौल बन गया। जवान लड़कियाँ और घर की बहुएँ मेरे इर्द-गिर्द बैठी रहतीं। बुआ से वे कुछ झिझकती थीं, पर मेरे साथ मज़ाक करती रहतीं। घर के आदमी एक तरफ बैठकर विचार-विमर्श करने लगते। बिन्नी के लिए रिश्ते आने लग पड़े थे। हम डैडी की अस्थियाँ लेकर आये थे, इसलिए हम सभी इस शगनों वाले काम को अगली बार के लिए रख रहे थे। एक दिन बुआ ने बताया, भाई, सबने सलाह की है, तेरा चाचा सुरजीत चला है सूबेदार सतनाम सिंह से बात करने।"

वह कौन है ?

लो बताओ तो भला, तुझे अपने ससुर का नाम भी नहीं पता?"  कहती हुई वह हँसने लगी। फिर, मुझे बांहों में भरकर बोली, देख बेटी, अब बुआ की गुड़ती को कोसते हैं सब, इसी गुड़ती की खातिर तू लड़के के साथ समझोता कर ले।"

अब तो बुआ, बहुत साल हो गये।"

अगर तू और वह, दोनों सच्चे हो तो सालों से कुछ नहीं होता।"

इन बातों के विषय में सोचकर मुझे लग रहा था कि यह असंभव था, पर जैसे-जैसे सोचती गयी तो लगने लगा कि यह बहुत संभव भी था। रवि को यहाँ बुला लें, अगर रवि को न ही बुलाएँ, फिर भी तो सब ठीक हो ही सकता था। रवि को मैं अच्छी तरह जानती थी। कितना भी दूर था हमसे, पर दिल से दूर नहीं हो सकता था। सोचते-सोचते मुझे चाव चढ़ने लगा। मैं रवि के बारे में सोचने लगी। इतना सोचा कि रात में सपने भी उसके ही आये। सपने में बैठा किताब पढ़ रहा था। मैंने उससे किताब छीनकर कहा, एक तो हमें लेने नहीं आता, दूसरा अब किताब पढ़े जा रहा है।"

जिस दिन से मैं यहाँ आयी थी, मर्दों में से कभी किसी ने मेरे संग रवि को लेकर बात नहीं की थी। एक दिन, किसी ने मेरे सामने आपस में बातचीत करते हुए कहा था कि ये दुआबिये हमें बिलकुल भी रास नहीं आये। बिन्नी के विवाह को लेकर ज़रूर मेरे साथ सलाह की जाती।

अगले दिन, चाचा सीधे ही जालंधर चला गया। उसके जाते ही, उसकी प्रतीक्षा आरंभ हो गयी। चाचा रवि के पिता से कई बार मिल चुका था। वह यह यकीन दिलाकर गया था कि रवि का पिता उनकी किसी बात को मना नहीं करेगा। बुआ और मम्मी मेरे सामने ही सलाह-मशवरा कर रही थी, अगर लड़के का बाप मान जाये तो इसे यह ससुराल भेज दें। लड़का कहाँ अपने बाप की बात टालने वाला है।"

मैं भी स्वयं को रवि के गाँव जाने के लिए तैयार करने लगी। विवाह के समय वहाँ गयी थी। उस समय उनका घर छोटा-सा था। फिर तो रवि ने बहुत से पैसे भेजे थे। ज़रूर बड़ा कर लिया होगा। रवि की माँ जब इंग्लैंड आयी, तभी हमारा झगड़ा हुआ था, पर उसने कभी कुछ नहीं कहा था। मेरे साथ तो बहुत प्यार किया करती थी। मैंने स्वयं को मानसिक तौर पर तैयार करते हुए परी से कहा, पॉसीबल है, हमें तेरे डैडी के मम्मी-डैडी मिलने आयें।"

रीयली ! व्हेयर दे लिव ?

यहीं, इंडिया में ही।"

डैडी भी आएँगे ?

मे बी।"

फिर डैडी गुड हो जाएँगे ?

हाँ-हाँ।"

जब कभी भी परी रवि के बारे में पूछती तो मैं कह दिया करती थी कि वह बुरा आदमी था, इसलिए हमसे मिलता नहीं था।

शाम के वक्त हम चाचा के घर में ही जा बैठ। हमारा सारा ध्यान चाचा के आने की तरफ ही था। घर में सबको मालूम था कि चाचा कहाँ गया था। इसलिए सबकी निगाह मेरे ऊपर ही घूम रही थी। कभी-कभी मुझे यह सब बहुत बुरा लगता। चाचा लौटकर आया और आते ही बैठक में चला गया। हम दालान में बैठी थीं। मम्मी और बुआ उठकर चाचा के पीछे-पीछे चली गयीं। मैं सांसें रोकर उनकी प्रतीक्षा करने लगी।

कुछ देर बाद वे लौटीं। उन्हें देखकर मेरे पास बैठी लड़कियाँ उठकर चली गयीं। मम्मी मेरी ओर कितनी देर तक देखती रही और फिर रोने लग पड़ी। बुआ ने भी रोना आरंभ कर दिया और मुझे छाती से लगाकर कहने लगी, तेरी किस्मत खोटी है बेटी, लड़के ने तो दूसरा विवाह करवा लिया।"

एकबारगी तो मुझे झटका-सा लगा। संभलकर मैंने कहा, तो क्या हुआ बुआ, इसमें रोने वाली कौन-सी बात है ?  कहकर मैं भी रोने लगी। हमें रोता देखकर परी भी हमसे लिपटते हुए रो पड़ी। फिर, घर की दूसरी औरतें भी इस रोने-धोने में शामिल हो गयीं। मम्मी ने डैडी को याद करके विलाप किया तो बुआ ने उसे झगड़कर चुप करवाया। दो पड़ोसिन औरतें भी हमारे बीच आकर बैठ गयीं। फिर, हम सब मिलकर डैडी की बातें करने लगीं।

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