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अमेरिका की आधी दुनिया
रचना
श्रीवास्तव
प्रकृति
के रचयिता भगवान ने स्वयं के अतिरिक्त सृजन करने की शक्ति
मात्र नारी को ही दी हैं । ये सृजनहारी नारी स्वयं अपनी
अस्मिता के लिए सदियों से संघर्ष करती आई है। वैसे तो उसकी
लड़ाई जन्म से ही प्रारम्भ होती है पर इतिहास में इसका उल्लेख ४
थीं शताब्दी से मिलता है जब उसको पग-पग पर अवहेलना का सामना
करना पड़ा तो नारी मन चीख उठा और प्रारम्भ हुआ उसका संघर्ष
विश्व के मानचित्र पर यदि देखें तो दुनिया के हर कोने में नारी
आपने आप को मुख्य धारा में लाने के लिए प्रयत्नशील है ।
ग्रीक में नारी को बुराईयों और ग़लत
इच्छा का स्त्रोत माना गया,
रोमन क़ानून में औरतों की तुलना बच्चों से की गई और उसे सदैव
ही पुरूषों से कमजोर माना गया ।
4थीं
शताब्दी में धार्मिक गुरूओं ने कहा था की औरत शैतान (नरक ) का
द्वार हैं और बुराई का रास्ता है । औरतों के बारे में ऐसी
धारणा रखने वाला समाज उसको कानूनी अधिकार क्या देता ।
इंग्लैण्ड में अविवाहित महिला को सम्पत्ति रखने का अधिकार था
पर विवाह के बाद उसकी सम्पत्ति पति के अधिकार में आ जाएगी ऐसा
कानून था और विवाहित स्त्री अपने लिए अलग से सम्पत्ति नहीं
खरीद सकती थी । इस के लिए उसे पति की आज्ञा लेना ज़रूरी था ।
इंग्लैंड में इकुइटी लाँ बनाया गया
जिसमें महिलाओं को बराबर का अधिकार देने की बात कही गई थी । इस
कानून ने क्रांति ला दी । अमेरिका में भी इसका असर पड़ा और यहाँ
के विभिन्न प्रदेशों में कमशः
1839
मिसीसिप्पी,
1848 न्यूयार्क,
1854 मेंनचेस्टर में ये क़ानून लागू कर दिया गया । अब महिलायें
अपने लिए सम्पत्ति ख़रीद सकती थीं,
आपने पति को उस की ग़ल्तियों के लिए न्यायालय के कटघरे में भी
ले जा सकती थीं ।
23
साल की एलिजाबेथ कैंडी स्टेनटन और 55 साल की लुक्रेटिया मॅट 5
अन्य महिलाओं से चाय पर सेनिका फॉल न्यूयार्क में मिली और यहीं
पर सभी ने मिल के पहला वीमेंन्स राइट कन्वेंशन बनाया । इसने
महिलाओं के अधिकार के लिए बहुत काम किया । 19 वीं शताब्दी
में महिलाओं ने जब घर से बाहर क़दम रखा, तो उनके लिए काम की
कोई भी अवधि निर्धारित नहीं थी,
ये पुरुषों से ज़्यादा काम करती पर वेतन कम ही मिलता । इसी समय
1847 में इग्लैंड में और 1990 में अमेरिका में काम की समय सीमा
निर्धारित कर दी गई । यही नहीं 1960 में इंग्लैण्ड में समान
वेतन एक्ट पास हुआ और ये 1965 में अमेरिका में भी लागू हुआ ।
अब महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने लगी,
पर समाज में अभी भी बहुत से मामलों में भेदभाव किया जाता था ।
जैसे बहुत-सी दुकाने महिलाओं को अलग से क्रेडिट कार्ड नहीं
देती थी । तलाक़शुदा या अकेली महिला के लिए घर,
कार आदि के लिए लोन आसानी से नहीं मिलते थे । कुछ क़ानून भी
दोहरी नीति अपनाते थे । जैसे यदि महिला के द्वारा पति का ख़ून
हो जाए तो इसे अपराध माना जाता था । जबकि यदि पति पत्नी का
ख़ून करे तो उसे ""पैशन शूटिंग " माना जाता था ।
इस तरह के और भी बहुत से दोहरे मापदंडों
के बावजूद स्त्रियों ने अपनी पढ़ाई जारी रखी, संघर्ष जारी रखा
। पर यहाँ भी उनका साथ परेशानियों ने नहीं छोड़ा । 1980 में
अमेरिका में महिला चिकित्सक का औसत 17 प्रतिशत था,
जर्मनी में 19 प्रतिशत था फ्रांस में 20 प्रतिशत, इसराइल में
32 प्रतिशत था । इतना ही नहीं 1995 तक अमेरिका मेडिकल
एसोशियेशन महिलाओं को अपना सदस्य भी नहीं बनाता था । अमेरिका
की महिलाओं ने इतनी परेशानियों के बाद भी बहुत से क्षेत्र में
अपना नाम रौशन किया है, उन में से कुछ का उल्लेख मै यहाँ कर
रही हूँ जो निम्नवत हैः-
0 1968 - जनिसी ली यार्क - वह
पहली महिला थीं जिन्हें ओलंपिक में अमेरिका का झंडा ले जाने का
सम्मान मिला ।
0 1978 - मरे क्लार्के - अमेरिका
की आर्मी में पहली मेजर जनरल बनी ।
1993 - जनेट रिनो - अमेरिका की पहली
अटॉर्नी जनरल बनी ।
इसी वर्ष जोनी मोर्रिसों को साहित्य का
नोबल पुरस्कार मिला (अमेरिका की पहली )
0 1999 - एलीन कॉलिन्स - पहली
अमेरिकी -अंतरिक्ष यात्री बनी (अमेरिका में पहली )
0 2000 - हेलरी रोधाम क्लिंटन -
पहली महिला चुनी हुई सेनेटर बनी ।
0 2007 - नैन्सी पिलोसी - पहली
स्पीकर ऑफ़ हॉउस ।
अमेरिका को आधुनिक देश माना जाता है पर
कितनी अजीब बात है कि 1920 तक तो स्त्रियों को वहट देने का भी
अधिकार नहीं था । इसके लिए यहाँ की महिलाओं ने बहुत लंबा
संघर्ष किया है ।इस मुहीम की शुरूआत 1820 से ही हो गई थी पर इस
मुहीम को बल तब मिला जब 1869 में सूसन बी अन्थोनी,
एलीना और एलिजाबेथ कैडी स्टानटन ने
नेशनल वूमेंन स्फरेज अस्सोशियेशन बनाया । बहुत सालों की लम्बी
लड़ाई के बाद 26 अगस्त 1920 में 19 वां अमेंडमेंट पास हुआ और
महिलाओं को मिला उनका वहट करने का अधिकार ।
हालाँकि समान वेतन एक्ट 10 जून 1963 में
ही लागू हो गया था पर आज भी बहुत-सी जगहों और प्रतिष्ठानों में
समान काम के लिए औरतों को पुरूषों से कम
वेतन मिलता है । यू एस सेंसस ब्यूरो के एक सर्वेक्षण के
अनुसार 2002-2003 में समान काम के लिए आदमियों के एक डॉलर पर
औरतों को 75.5 सेन्ट्स मिलता था । सन् 2007 में ये अंतर कम हो
के 76 सेन्टस हो गया पर अंतर आज भी है ।
आज की स्थिति तो यही बयान करती है कि
अमेरिका के इतिहास में आज तक कोई भी महिला राष्ट्रपति नहीं है
। कौन जाने हेलरी क्लिंटन के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी न
पाने के पीछे भी उनका महिला होना ही हो । इतनी क्रांति के बाद
बहुत से क्षेत्र में अपना अधिकार पाने वाली युरोपीय नारी आज
अनेक मानसिक और शारीरिक परेशानियों से गुज़र रही है । हर
क्षेत्र में स्वतंत्रता इस देश की परम्परा है, पर इसकी वजह से
ही छोटी उम्र की माँओं की संख्या भी बढ़ी है और तलाक की संख्या
भी। इसी कारण अकेले अभिभावकों की गिनती भी बढ़ गई है । अकेले
अभिभावकों में पुरुषों के बजाय महिलाओं की तादाद अधिक है । ऐसे
में अपनी पढ़ाई,
घर ख़र्च के लिए काम करना और ऊपर से बच्चों की ज़िम्मेदारी इन
सभी के बीच नारी पिस के रह जाती है ।
अमेरिका में, जहाँ मै रहती हूँ वहाँ पर
बहुत-सी अकेली माँयें हैं उनका दर्द मैंने उनकी बातों में
अनुभव किया है । बात-बात पर झुँझलाना,
बच्चों को कोसना, उनकी करूण मानसिक स्थिति को दर्शाता है । एक
स्त्री तो अपनी 4 साल की बेटी को ज़रा-सी ग़लती पर बेल्ट से
मारती थी, जबकि यहाँ यदि यह कॉप (पुलिस) को पता चल जाए तो वह
माँ को गिरफ्तार कर लेगी और बच्ची को बाल-घर में भेज देगी पर
ऐसी परेशानी के ख़िलाफ किसी ने भी शिकायत नहीं की । इस बात का
मैने यहाँ इसलिए उल्लेख किया कि इतने सख़्त क़ानूनवाले इस देश
में भी ऐसी चीज़ें देखने को मिल जाती है । मानसिक अशांति का
इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है
?
इस तरह की और भी बहुत-सी घटनाएँ मुझे देखने सुनने को मिली ।
अतः यहाँ की महिलाओं के बारे में जो धारणा मेरी अमेरिका आने से
पहले थी वह पूरी तरह बदल चुकी है । आधुनिकता की कितनी बड़ी
क़ीमत चुका रही हैं ये महिलाएँ!
यहाँ की नारियों में भी बहुत से प्रकार
मिल
जायेंगे ।
मैं आपने कुछ अनुभवों का उल्लेख यहाँ पर
करना चाहूँगी - मेरी एक महिला मित्र हैं (नाम गुप्त रखा है)
उनकी उम्र 50 साल की है । जब वह युवती थी तो अपने काम, अपने
यौवन सुख और अपनी स्वतंत्रता को उसने ज़्यादा महत्त्व दिया ।
बच्चे के बारे में सोचा भी नहीं पर अब उम्र जब ढलने लगी तो
उसने बहुत प्रयास किया पर अब तो बहुत देर हो चुकी थी । सच है
उन्होंने वह सबकुछ पाया जो उसने सही समय पर चाहा पर नारीत्त्व
का सम्पूर्ण सुख नहीं पा सकी क्योंकि बहुत देर हो चुकी थी । यह
एक रूप है यहाँ की नारी का ।
मेरी एक और सहेली है जो मेरे पास अपनी
बच्ची के साथ हिन्दी पढने आती थी । इन्होंने बहुत से लोगों से
प्यार किया और सभी से सन्तान पाई । प्यार तो अपनी अपनी राह चल
दिए बच्चे इनकी जिम्मेदारी बन गए । उसने बच्चों को अच्छी
शिक्षा दी और उनकी अच्छी परवरिश भी की । मुझे अच्छा भी लगा
और दुःख भी हुआ । अच्छा इसलिए कि एक माँ अपने बच्चों को किसी
भी हाल में छोड़ती नहीं अकेले । बच्चों को बड़ा करना बहुत ही
कठिन काम है पर फ़िर भी हर माँ करती है और दुःख इसलिए की बच्ची
को पिता का सुख नहीं मिला । ये दूसरी तरह की महिलाएँ है जो
स्वयं चाहे जो करें पर आपने बच्चों को फूल-सा सम्भाल के रखती
हैं यह यहाँ की महिलाओं का दूसरा रूप है ।
यहाँ त्याग और समर्पण के उदाहरण कम
देखने को मिलते हैं, पर अभी कुछ दिनों पहले मैंने अपना शहर और
आवास दोनों बदले । जिस नए घर में मैं आई उसकी देखभाल एक 35-40
साल की महिला करती है । बातचित से मालूम हुआ की उसके पति को
4-5 साल पहले कैन्सर हो गया था । शहर के सभी डॉक्टर ने कह
दिया कि अब इनका बचना मुश्किल है जीवन के इस कठिन समय में
जबकि इलाज़ के लिए बहुत पैसे चाहिए थे और यहाँ की इन्शोरेन्स
कम्पनी ने कुछ खास मदद नहीं की,
डाक्टर तो पहले ही सॉरी बोल चुके थे, इस महिला ने हिम्मत नहीं
हारी और आज उसके पति जीवित हैं स्वस्थ भी । नारी शक्ति ने अपने
पति को यमराज से भी छीन लिया । यह भी एक रूप है यहाँ की नारी
का ।
यहाँ के अस्पताल में बच्चे के जन्म पर
हर जगह सिर्फ़ माँ का नाम ही लिखा जाता है, जबकि आपने देश में
सदैव पिता का नाम ही लिखा जाता है । बच्चे की पहचान माँ से ही
होती है । ये सब देख के मैं बहुत ख़ुश हुई । नारी को यह सम्मान
पर दूसरे ही पल लगा कि यहाँ शायद इसलिए ऐसा है कि बच्चे का
पिता बच्चे के जन्म पर वहाँ होता नहीं या फ़िर माँ बच्चे के
पिता का नाम जानती ही नहीं । ख़ैर जो भी हो नाम माँ का ही चलता
है ।
नवीन सोच और आधुनिक विचारधारा का होना
बुरा नहीं है पर यदि ये फ़ंदे-सी गले में कसने लगे या जीवन से
शान्ति छीनने लगे तो इस की सीमा निर्धारित करना भी बहुत आवश्यक
है । अपने देश से यहाँ आके बसे परिवारों की महिलाओं की स्थित
क़शमक़श की है । भारतीय परम्पराओं और पाश्चात्य विचारधारा के
बीच अपनी जगह तलाशने में अपनी सीमायें निर्धारित करने में
उन्हें बहुत-सी कठनाईयों का सामना करना पड़ता है । इस बड़ी और
बिल्कुल अलग दुनिया में पहचान बनाना और उसे को बनाये रखना एक
चुनौतीपूर्ण कार्य है पर इसमें भारतीय महिलाएँ बहुत हद तक सफल
भी हैं।
इस सन्दर्भ में मैं यहाँ की स्त्रियों
को 3 भागों में बाँटती हूँ -
पहली वह जो पूरी तरह से यहाँ के रंग में
रंग गई हैं – वेशभूषा, खान पान,
भाषा सभी क्षेत्रों में पाश्चात्य हो चुकी हैं । परिवर्तित
मानसिकता की महिलाएँ मैने यहाँ देखी हैं जो आधुनिकता के नाम पर
उन वस्त्रों को भी धारण करने में संकोच नहीं करती जो शरीर को
ढकते कम और दिखाते ज़्यादा हैं,
पार्टी में मदिरा से भरा गिलास भी उठाने से पीछे नहीं रहती,
यदि कुछ पूछो या कहो तो बड़े सुंदर तरीके से कहती हैं कि यदि
मुख्यधारा में शामिल होना ही तो ये सब करना होगा । यह तो थीं
पहले तरह की महिलाएँ, जिनकी संख्या कम है ।
दूसरी तरह की महिलाएँ वह हैं जिन्हें
अपनी परम्पराएँ जान से भी अधिक प्यारी हैं । यह अच्छी बात है
पर ये ज़रूरी नहीं की हमारी सारी बातें ठीक ही हों । ये उस तरह
की महिलाएँ हैं जो अपने आप ने को ज़रा भी नहीं बदलती,
गाऊन में ही बाहर निकल जाती हैं (घर के सामने ही ) घर में हर
समय खाने की महक आती रहती है (यहाँ के बंद घर में महक बाहर
नहीं जाती है )थोड़े से प्रयास से इसको रोका जा सकता है पर
नहीं
(यहाँ
मै एक बात बता देना चाहती हूँ सिंगापुर में बहुत से मकान मालिक
(सारे नहीं ) भारतीयों को अपना घर देना नहीं चाहते । साफ़-साफ़
लिख देते हैं - भारतीय नहीं (नो इंडियन) । दफ़्तर में काम में
सब से आगे रहती हैं और बहुत अच्छा काम भी करती है पर अपने
तौर-तरीक़े नहीं बदलती ।
तीसरी तरह की महिलाएँ वह हैं जो समय की
माँग पर स्वयं को बदलती भी हैं और अपने मूल्यों अपनी परम्पराओ
को भूलती भी नहीं हैं । अपनी अस्मिता को खोने भी नहीं देतीं और
मुख्य धारा में शामिल भी हो जाती हैं । इस तरह की महिलाओं की
संख्या अधिक है ।
जब मै यहाँ की स्त्रियों की तुलना
भारतीय स्त्रियों से करती हूँ तो लगता हैं की शायद हमारे
संस्कार ही हैं जो हमें इनसे अलग करते हैं । त्याग,
प्रेम, सहनशक्ति,
विश्वास ही वे मूलमन्त्र हैं जो एक परिवार को चलने के लिए
आधारस्तम्भ का काम करते हैं जो अमेरिनकन स्त्रियों में नहीं
हैं । यदि ये भी यही मूलमन्त्र सीख जायें तो शायद बिखरे
परिवारों को समेटा जा सकता है । भारतीय महिलाएँ अधिकतर अपने
परिवार को सर्वोपरि रखती हैं उसके बाद बाक़ी चीज़ें आती हैं
चाहे वह काम हो या सहेली । इस तरह से वे घर और बाहर की दुनिया
में सामंजस्य बैठाती हुई आगे बढ़ती जाती हैं ।
अन्तः मै इतना कहना चाहूँगी की
स्त्रियों की स्थिति कर्मगत बदली है पर जन्मगत नहीं । आज भी
अपनी अस्मिता की लड़ाई महिलाओं को लड़नी पड़ती है, चाहे देसी
महिलाएँ हों या विदेशी पर उम्मीद यही है की एक दिन हर क्षेत्र
में हमें बराबरी का अधिकार मिल के रहेगा ।
देस में रहे या विदेश में/छल
गया हमें हर भेष में/लड़ी
हम ने ख़ुद/
अपनी लड़ाई/पहचान
बनने की खातिर/बनाईं
अपनी परछाई/दिया
ख़ुद को सहारा हमने/
मिली महफ़िल या तन्हाई/सीखा
रहना हर परिवेश में/कमी
बेसी या विशेष में/देश
में रहे या विदेश में/छला
गया हमें हर भेष में
रचना श्रीवास्तव
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USA
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