vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। मुक्तक ।।

 

 

देवमणि पांडेय के दस मुक्तक

(1)

साथ तेरा मिला तो मुहब्बत मेरी

दिल के काग़ज़ पे उतरी ग़ज़ल हो गई

तुमने हँस के जो देखा मेरी ज़िंदगी

झील में मुस्कराता कँवल हो गई

(2)

मुश्किल सफ़र है फिर भी मंज़िल तुम्हें मिले

मझधार में हो नाव तो साहिल तुम्हें मिले

हमने ख़ुदा से रात दिन माँगी है यह दुआ

दुनिया को प्यार कर सके वो दिल  तुम्हें मिले

(3)

भटकी रही हमेशा ये लहरों  के दरमियाँ

इस ज़िंदगी की नाव को साहिल नहीं मिला

जो धूप में बादल की तरह हमको छुपा ले

ऐसा तो एक दोस्त भी क़ाबिल नहीं मिला

(4)

कोई फूल अगर खिलना चाहे

वीराने में खिल सकता है

दिल प्यार अगर करना चाहे

दिलदार उसे मिल सकता है

 (5)

इक महकती सी शाम लिख दूँगा

तुझको ख़ुशियां तमाम लिख दूँगा

तेरे दिल की किताब में इक दिन

देखना अपना नाम लिख दूँगा

(6)

भीड़ में भी हम अकेले रह गए

दर्द को ख़ामोश रहकर सह गए

रात तेरी याद क्या आई मुझे

आँख से आँसू छलककर बह गए

(7)

याद करने से उसे अब फ़ायदा कुछ भी नहीं

मुझको हर दिन आने वालीं हिचकियाँ कम हो गईं

क्या बताएँ किस क़दर टूटा है दिल का आईना

अब मुहब्बत में मेरी दिलचस्पियाँ कम हो गईं

(8)

ज़िंदगी की मुश्किलों में साथ न छूटे कभी

हाथ में यूँ हाथ ले लो हाथ न छूटे कभी

बस यही हसरत है दिल की, बस यही आंखों का ख़्वाब

इस मुहब्बत के सफ़र में साथ न छूटे कभी

(9)

ग़ज़ल लिखने को जब भी मैं क़लम काग़ज़ उठाता हूँ

हमेशा सामने बैठा हुआ तुमको ही पाता हूँ

मुहब्बत फ़ासला दिल में कभी रहने नहीं देती

मैं तुमसे दूर रहकर भी तुम्हें नज़दीक पाता हूँ

(10)

हमको तुमको हर हालत में अपना फ़र्ज़ निभाना है

राह से भटके हर राही को मंज़िल तक पहुँचाना है

दिल से दिल तक राह बनाएँ हमने दिल में ठान लिया

दूर अँधेरा करे जो दिल का ऐसा दीप जलाना है

    देवमणि पांडेय

ए-2, हैदराबाद एस्टेट, मालाबार हिल,

नेपियन सी रोड, मुम्बई - 400 036

 ◙◙◙

 

माह के छंदकार

योगेन्द्र दत्त शर्मा

-  आहत सब दृश्य हुए

- मंगल-घट फूट गया

- सहमी हुई मन की नदी

- यह घर अपरिचित-सा हुआ

- अपनी यही यात्रा-कथा

ग़ज़ल

ज़हीर कुरैशी

रमेशचन्द शर्मा 'चन्द्र'

विजय किशोर मानव

विनीता गुप्ता

श्याम सखा 'श्याम'

नवगीत

अनिरूद्द नीरव

मुक्तक

देवमणि पांडेय

प्रवासी क़लम

कमल किशोर सिन्ह

 क

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google