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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

जब हम दुखी होते हैं

 

जब हम दुखी होते हैं

गाते हैं उदास गीत

अपनी बेचैनी को दूर

करने के लिए हँसते हैं

 

कुछ लोग दुःख सहते-सहते

पाथर हो जाते हैं

 

हमने लोगों को दुःख में

पहाड़ बनते हुए देखा है

उन पर धूप बतास का कोई

असर नहीं पड़ता

 

पहाड़ होना मुहावरा है

लेकिन आदमी मुहावरा नहीं है

वह इस दुनिया में आता है

बड़ा होता है,

उसे पहाड़ बना देती है

तकलीफ़ें

    स्वप्निल श्रीवास्तव

510, अवधपुरी, कॉलोनी

फ़ैजाबाद, उ.प्र. - 224001

 ◙◙◙

 

कवि

स्मरणीय

- नरेश मेहता

- धूमिल

समकालीन कवि

- जितेन्द्र श्रीवास्तव

- स्वप्निल श्रीवास्तव

- जसवीर चावला

- सुभाष नीरव

प्रवासी कलम

- सत्येंद्र श्रीवास्तव

 माह का कवि

- इंदिरा परमार

... कछारों पर शाम

...  आषाढ़ की धूप

...  वर्षा का एक दिन/ सत्य

...  गंध फूल

...  बादल

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