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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

नीरो

 

नीरो फिर अपनी लय-ताल-धुन बजा रहा

सपनों का रोम जल रहा, वह दिखा रहा

कितना था विस्तृत साम्राज्य

स्नेह-प्यार का

पावन संस्पर्शों के

ऊष्मित संसार का

निभृत विस्फोटों को वह बाहर ला रहा

पट्टों-स्तंभों पर

अंकित इतिहास था

दुर्ग थे उपलब्धि के

मन का प्रकाश था

नीरो अब इन सबकी ईंट-ईंट गिरा रहा

यह नीरो - जो न हुए हम,

उसका दर्द है

गहरे अभावों की आँधी की गर्द है

अब वह अहसासों की कीलें चुभा रहा

स्वप्न जहाँ होते हैं

नीरो भी होता है

जो न उसे जान सका, जीवनभर खोता है

नीरो विश्वासों की धज्जियाँ उड़ा रहा

    सत्येन्द्र श्रीवास्तव

Flat No.25, 8 Newton Street

London WC2B 5EG, UK

 ◙◙◙

 

कवि

स्मरणीय

- नरेश मेहता

- धूमिल

समकालीन कवि

- जितेन्द्र श्रीवास्तव

- स्वप्निल श्रीवास्तव

- जसवीर चावला

- सुभाष नीरव

प्रवासी कलम

- सत्येंद्र श्रीवास्तव

 माह का कवि

- इंदिरा परमार

... कछारों पर शाम

...  आषाढ़ की धूप

...  वर्षा का एक दिन/ सत्य

...  गंध फूल

...  बादल

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