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नीरो
नीरो
फिर अपनी लय-ताल-धुन बजा रहा
सपनों
का रोम जल रहा, वह दिखा रहा
कितना
था विस्तृत साम्राज्य
स्नेह-प्यार का
पावन
संस्पर्शों के
ऊष्मित
संसार का
निभृत
विस्फोटों को वह बाहर ला रहा
पट्टों-स्तंभों पर
अंकित
इतिहास था
दुर्ग
थे उपलब्धि के
मन का
प्रकाश था
नीरो अब
इन सबकी ईंट-ईंट गिरा रहा
यह नीरो
- जो न हुए हम,
उसका
दर्द है
गहरे
अभावों की आँधी की गर्द है
अब वह
अहसासों की कीलें चुभा रहा
स्वप्न
जहाँ होते हैं
नीरो भी
होता है
जो न
उसे जान सका, जीवनभर खोता है
नीरो
विश्वासों की धज्जियाँ उड़ा रहा
सत्येन्द्र
श्रीवास्तव
Flat No.25, 8 Newton Street
London WC2B 5EG, UK
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