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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

आधुनिक भारतीय साहित्य के शीर्षस्थ कवि

किरन-धेनुएँ

 

उदयाचल से किरन-धेनुएँ

हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला ।

 

पूँछ उठाए चली आ रही

क्षितिज जंगलों से टोली

दिखा रहे पथ इस भूमा का

सारस, सुना-सुना बोली ।

 

गिरता जाता फेन मुखों से

नभ में बादल बन तिरता

किरन-धेनुओं का समूह यह

आया अंधकार चरता,

नभ की आम्रछाँह में बैठा बजा रहा वंशी रखवाला

 

ग्वालिन सी ले दूब मधुर

वसुधा हँस-हँस कर गले मिली

चमका अपने स्वर्ण सींग वे

अब शैलों से उतर चलीं ।

 

बरस रहा आलोक-दूध है

खेतों खलिहानों में

जीवन की नव किरन फूटती

मकई औ' धानों में

सरिताओं मे सोम दुह रहा वह अहीर मतवाला ।

(दूसरा सप्तक से)

    नरेश मेहता

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कवि

स्मरणीय

- नरेश मेहता

- धूमिल

समकालीन कवि

- जितेन्द्र श्रीवास्तव

- स्वप्निल श्रीवास्तव

- जसवीर चावला

- सुभाष नीरव

प्रवासी कलम

- सत्येंद्र श्रीवास्तव

 माह का कवि

- इंदिरा परमार

... कछारों पर शाम

...  आषाढ़ की धूप

...  वर्षा का एक दिन/ सत्य

...  गंध फूल

...  बादल

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