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वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008
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।। कविता ।।
आधुनिक भारतीय साहित्य के शीर्षस्थ कवि
किरन-धेनुएँ
उदयाचल से किरन-धेनुएँ
हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला ।
पूँछ उठाए चली आ रही
क्षितिज जंगलों से टोली
दिखा रहे पथ इस भूमा का
सारस, सुना-सुना बोली ।
गिरता जाता फेन मुखों से
नभ में बादल बन तिरता
किरन-धेनुओं का समूह यह
आया अंधकार चरता,
नभ की आम्रछाँह में बैठा बजा रहा वंशी रखवाला
ग्वालिन सी ले दूब मधुर
वसुधा हँस-हँस कर गले मिली
चमका अपने स्वर्ण सींग वे
अब शैलों से उतर चलीं ।
बरस रहा आलोक-दूध है
खेतों खलिहानों में
जीवन की नव किरन फूटती
मकई औ' धानों में
सरिताओं मे सोम दुह रहा वह अहीर मतवाला ।
(दूसरा सप्तक से)
नरेश मेहता
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कवि
स्मरणीय
- नरेश मेहता
- धूमिल
समकालीन कवि
- जितेन्द्र श्रीवास्तव
- स्वप्निल श्रीवास्तव
- जसवीर चावला
- सुभाष नीरव
प्रवासी कलम
- सत्येंद्र श्रीवास्तव
माह का कवि
- इंदिरा परमार
... कछारों पर शाम
... आषाढ़ की धूप
... वर्षा का एक दिन/ सत्य
... गंध फूल
... बादल
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