SRIJANGATHA.COM
साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच
सृजनगाथा
ई-पताः srijangatha@gmail.com
वागर्थ प्रतिपत्तये
वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008
अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण कथोपकथन भाषांतर संस्कार
मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक
बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ
।। कविता ।।
बादल
धूप सोयी है
सूरज की याद में
जा चुकी हैं तितलियाँ ऊबकर
गुलाबों की पुस्तकें खुली पड़ी हैं
आँगन अपने इकलौते वसंत की मृत्यु पर
शोक गीत गाता है
हवा फटे हुए क़ागज-सी लगती है
उमस की मुट्ठियों में
कितनी दुखहाल है दुनिया
आओ तोड़ लें
आकाश पर डोलते मधु छत्ते
निचोड़ लें सबके लिये,
फिर गाएँ
शहदीले हो जाएँ
इंदिरा परमार
पीटर कॉलोनी, टिकरापारा,
धमतरी, छत्तीसगढ़
◙◙◙
कवि
स्मरणीय
- नरेश मेहता
- धूमिल
समकालीन कवि
- जितेन्द्र श्रीवास्तव
- स्वप्निल श्रीवास्तव
- जसवीर चावला
- सुभाष नीरव
प्रवासी कलम
- सत्येंद्र श्रीवास्तव
माह का कवि
- इंदिरा परमार
... कछारों पर शाम
... आषाढ़ की धूप
... वर्षा का एक दिन/ सत्य
... गंध फूल
... बादल
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
तकनीकः प्रशांत रथ