|
पीढ़ा
किसी समय
पीढ़ा बहुत ज़रूरी समझा जाता था रसोईघर के लिए
पीढ़े पर बैठकर ही खाते है घर
के छोटे-बड़े
पीढ़ा प्रतीक था सम्मान का
घर आए मेहमान को ऊँचा पीढ़ा
मिलता था
दुश्मन को भी
मेरे घर में अब भी एक पीढ़ा
चुपचाप पड़ा है बार्जे पर
यह माँ के विवाह का पीढ़ा है
यह पिता के सपनों का पीढ़ा है
इसी पर बैठे पिता इसी पर बैठी
माँ
यह पीढ़ा आधार बना पीढ़ा का
इस पीढ़े को बनाया था बढ़ई ने
उन्नीस सो बावन के आम चुनावों
के दिनों में
लकड़ी ओल्ली मियाँ के घर से
आई थी
वही ओल्ली मियाँ जिनका एक
बेटा
सैंतालिस में पाकिस्तान चला
गया था
अब भी देखिए इस पर
माँ की उँगलियों के निशान
होंगे जहाँ-तहाँ
माँ इसे जब भी देखती है
उसकी आँखों में पिछले बावन
साल उभर आते हैं
दीदी का जन्म, भइया का जन्म,
बासठ की लड़ाई
इकहत्तर की लड़ाई, इमरजेंसी
और न जाने क्या-क्या
!
यह पीढ़ा महज लकड़ी का टुकड़ा
नहीं
मेरी माँ की सबसे प्रिय किताब
है
जितेन्द्र श्रीवास्तव
हिंदी संकाय,
मानविकी विद्यापीठ
ब्लॉक एफ,
इग्नू मैदानगढ़ी, नई दिल्ली - 110068
◙◙◙
|