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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

डस्टबिन

 

डालो, मुझमें डालो, मैं हूँ न

जूठनों-थूकों-छिलकों-उतरनों के लिए एक पात्र

कहीं कोने में दीवाल के साथ

अथवा रसोई में धुलाई-नांद के नीचे

कहीं दबा-छुपा के रखा

नज़रों से बचा

आलीशानता में मटमैला धब्बा

अन्यथा शालीनता का कवच

डालो, मुझमें डालो, मैं हूँ न

 

परम सौभाग्य समझ

अहो भाग्य उचर

महादान जान

ले लूँगा कूड़ा-कचरा-छितरन-बोटियाँ

रक्त-स्त्राव-चीथड़े-शीशियाँ

झड़े बाल, मुचड़ी चिट्ठियाँ, गिटके-गुठलियाँ

दरअसल कुछ भी जिन्हें हाथ रखने से घबराते,

उफ् न करूँगा, भर दो गरदन तक झाड़ियाँ

डालो, मुझमें डालो, मैं हूँ न

लताड़ा-लिथड़ा गुस्ताख सवाल

जीवित किसी जवाब की आशा-बिन

तुम्हारा डस्टबिन,

आपका अपना डस्टबिन

भवदीय डस्टबिन

    जसवीर चावला

108/43 बी, चंडीगढ़ - 160022

 ◙◙◙

 

कवि

स्मरणीय

- नरेश मेहता

- धूमिल

समकालीन कवि

- जितेन्द्र श्रीवास्तव

- स्वप्निल श्रीवास्तव

- जसवीर चावला

- सुभाष नीरव

प्रवासी कलम

- सत्येंद्र श्रीवास्तव

 माह का कवि

- इंदिरा परमार

... कछारों पर शाम

...  आषाढ़ की धूप

...  वर्षा का एक दिन/ सत्य

...  गंध फूल

...  बादल

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