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डस्टबिन
डालो,
मुझमें डालो, मैं हूँ न
जूठनों-थूकों-छिलकों-उतरनों के लिए एक पात्र
कहीं
कोने में दीवाल के साथ
अथवा
रसोई में धुलाई-नांद के नीचे
कहीं
दबा-छुपा के रखा
नज़रों
से बचा
आलीशानता में मटमैला धब्बा
अन्यथा
शालीनता का कवच
डालो,
मुझमें डालो, मैं हूँ न
परम सौभाग्य समझ
अहो भाग्य उचर
महादान जान
ले लूँगा
कूड़ा-कचरा-छितरन-बोटियाँ
रक्त-स्त्राव-चीथड़े-शीशियाँ
झड़े बाल, मुचड़ी चिट्ठियाँ,
गिटके-गुठलियाँ
दरअसल कुछ भी जिन्हें हाथ
रखने से घबराते,
उफ् न करूँगा, भर दो गरदन तक
झाड़ियाँ
डालो, मुझमें डालो, मैं हूँ न
लताड़ा-लिथड़ा गुस्ताख सवाल
जीवित किसी जवाब की आशा-बिन
तुम्हारा डस्टबिन,
आपका अपना डस्टबिन
भवदीय डस्टबिन
जसवीर चावला
108/43
बी, चंडीगढ़ - 160022
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