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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कहानी ।।

 

 

एक और द्रौपदी


शेर सिंह

 

पूरे पच्चीस साल बीत चुके हैं ! आधुनिकता यहाँ भी दस्तक दे चुकी है । पूरे अँचल में पहले की अपेक्षा स्थितियाँ, परिस्थितियाँ बहुत बदल गई हैं । संयुक्त परिवार यहाँ भी टूटते जा रहे हैं । लेकिन यहाँ की संस्कृति, रीति- रिवाज़, रस्में , मान्यताएं कोई अधिक नहीं बदली हैं । हाँ, कमज़ोर ज़रूर हुई हैं । खेत - खलिहान में काम करने वालों की संख्या और कम हुई है । खेती करना लोगों को रास नहीं आ रहा है । बहुत खटने के पश्चात भी  पल्ले कुछ अधिक नहीं पड़ता है । नई पीढ़ी हाड़ तोड़ मेहनत से बचती है । आराम पसंद अधिक हो गए हैं । नेपाली, बिहारी और झारखंड़ी मज़दूर आसानी से मिल जाते हैं । खेती से संबंधित सब कार्य उन्हीं के भरोसे चल रहा है । पैसा दो काम लो का फंडा !

 

लेकिन जो कहानी आप पढ़ने जा रहे हैं , वह पच्चीस साल पुरानी हो कर भी नई है । क्योंकि रीति-रिवाज खत्म नहीं होते हैं । रस्मों के रूप बदल सकती है लेकिन स्वरूप नहीं । इसलिए अब मैं कहानी और आप के बीच अधिक बाधक नहीं बनना चाहता हूँ । आप कहानी को पढ़ने, जानने के लिए उत्सुक हो रहे होंगे । तो, अपनी उत्सुकता को व्यग्रता में न बदलने दें ।

 

नाम उस का बंतो है । तीन भाइयों में अकेली बहन । तीनों भाइयों में सब से छोटी है वह । इसलिए सब की लाड़ली और दुलारी है। शक्ल-सूरत भी बुरी नहीं है । गोरा, उजला रंग। अण्डाकार चेहरे पर दो बड़ी-बड़ी आँखें, किंचित भूरापन लिये । जब हँसती-खिलखिलाती तो लगता जैसे आँखों से भी हँसी छूट रही हो। लंबे काले बाल । वेणी पर हमेशा लाल रंग की रिबन बाँधे रखती । तरह- तरह के पहनावा पहनती । कभी कुर्त्ती -पजामा, कभी सलवार-कमीज़ और कभी कुर्त्ती-पजामे के ऊपर परंपरागत परिधान यानी चौडू डालती । सहज सौंदर्य, कोई बनाव नहीं कोई श्रृंगार नहीं ! पर, पल भर में किसी को भी बाँध लेने में समर्थ । माँ-बाप, सभी भाई तो उसे ख़ूब प्यार, स्नेह करते ही हैं, भाभी की भी वह बहुत लाड़ली और प्रिय है । भाइयों और उस की उम्र में लगभग दस-पन्द्रह वर्षों का अंतर है। उस की भाभी भी लगभग भाइयों की उम्र की ही है। भाभी उसे ननद कम बेटी की तरह अधिक चाहती है, उस से स्नेह रखती है। उस की उम्र अब इक्कीस-बाइस वर्ष के क़रीब हो गई है। विवाह योग्य तो कब की हो गई है। लेकिन उन के ख़ानदान के हिसाब से अब तक उपयुक्त लड़का नहीं मिल पा रहा था। सब की लाडली, दुलारी होने के कारण वह ज़िद्दी भी काफ़ी थी। कई ऐसी बातें जो नहीं मानी जा सकती थी उन्हें भी कभी लाड़ और कभी अपनी ज़िद से मनवा लेती थी ।

 

इधर कई दिनों से उस के रिश्ते के लिए लड़के वाले आने की बातें चल रही थी । उस का बूढ़ा बाप विनय बहुत सख़्त मिज़ाज़ का था। अपने उसूलों का पक्का ! इसलिए जो भी उन की जान-पहचान के थे, वे अपने बेटों का रिश्ता इस घर में नहीं करना चाहते थे । न जाने बूढ़ा क्या-क्या माँगे रख दे ? क्या-क्या शर्तें लगा ले ? वे सोचते ।

 

लेकिन आज पंडित मंगत राम यानी मंगतू अपने मंझले लड़के के लिए दो और व्यक्तियों को साथ लिए बंतो को देखने और रिश्ता तय करने के लिए आ रहे थे । बंतो आज आवश्यकता से अधिक ही चहक़, फुदक रही थी । मुख पर वनावटी गम्भीरता ओढ़े हुए । लेकिन मन ही मन वह ख़ुशी से खिली जा रही थी । वह उम्र की उस डगर पर खड़ी थी, जहाँ ज़रा सी भी हवा चलने, पत्ते हिलने मात्र से जी चिहुँक-चिहुँक उठता है । अनायास सिहरन दौड़ जाती । वह अपने आप को छोटे से आइने में बार-बार देखने लगती थी । फिर अपने आप में लजाने लगती । जब कभी उस के भाई छुळी पर घर आते, वह भाभी के कमरे से उठती आवाज़ों, सिसकारियों से सिहर-सिहर उठती थी । कमरे में चोरी छिपे ताकने-झाँकने के लोभ को संवरण नहीं कर पाती थी ।

 

पंडित मंगत राम अपने दो अन्य साथियों सहित शाम को अंधेरा होते-होते उन के घर पहुँचा । काफी बड़ा, दोमंज़िला पक्के मकान को ध्यान से देखते हुए वे अंदर आए । - राम राम पंडित जी!

 

मंगतू ने अपने होने वाले समधी को प्रणाम किया । बंतो के बूढ़े बाप ने उन्हें ध्यान से देखा । लंबा कद, पतला ज़िस्म, गोरवर्ण, माथे पर बड़ा सा तिलक और सिर पर गोल कुल्लवी टोपी । तंबाकू से पीले हुए दाँत । लंबी और उलझी लेकिन पतली मूँछे । आँखों में अनुभव की चमक । पजामा, कमीज़ और आसमानी रंग का बंद गले का ऊनी गर्म कोट ।  - बैठो जी .. . बैठो । बंतो के बूढ़े बाप ने उन्हें फ़र्श पर करीने से बिछाए मोटे-मोटे लेकिन आकार में छोटे-छोटे गद्दों की ओर इशारा करते हुए उन्हें बैठने के  लिए कहा ।

 

बुड्ढ़े के दोनों बड़े बेटे नौकरी में हैं । बाहर रहते हैं । और आज तीसरा वाला छोटा लड़का भी नहीं था । उस ने चिलम में तंबाखू भरा और हुक्का मेहमानों की ओर बढ़ा दिया । बंतो की अम्मा कभी देगची, कभी पतीले को दोनों हाथों में उठाए अंदर-बाहर वैसे ही चक्कर काट रही थी । मेहमान जो आ गए थे । उन के लिए चाय-पानी का इंतज़ाम तो करना ही है। बुड्ढ़े के छोटे-छोटे पोते, पोतियाँ उत्सुकता से मेहमानों को देख रहे थे ।

 

कुछ समय तक यूँ ही इधर उधर की औपचारिक बातें होती रही । फसल की, पानी की, बारिश कम होने की, बढ़ती महँगाई की, इमारती लकड़ी की कमी आदि-आदि की । लेकिन फ़ालतू बातें आख़िर कब तक चलती । जब कि ख़ास मक़सद सामने हो ! घर की सभी औरतें और बच्चे बैठे-बैठे बारी-बारी से पाहुनों को देख रहे  थे । - आप के दोनों बड़े लड़के नौकरी करते हैं ? मंगतू ने बात जारी रखते हुए अपने होने वाले संबंधी से पूछा ।

- हाँ  ! बड़ा वाला पुलिस में है । उस से छोटा वाला क्लर्क है । ज़्यादा नहीं पढ़ा है न । तीसरा घर में ही है । उसे अभी नौकरी नहीं मिली है ।

- दरअसल हम आप के घर से नाता जोड़ने आए हैं । रूक-रूक कर मंगतू ने अपनी बात सामने रखी ।

- अच्छा ! कैसा नाता ?

- अपने दूसरे बेटे के लिए आप की बेटी का हाथ माँगने आए हैं । यदि आप राजी हों तो ? मंगतू सीधे ही मूल विषय पर आते हुए बोला । बुड्ढ़े ने दोनों हाथ अपने गालों से टिकाए बैठी अपनी बूढ़ी घरनी की ओर देखा और उस से पूछा,-  क्यों ...तुम्हारा क्या ख्याल है ? मंगतू क्या कह रहा है ?

- जैसा तुम ठीक समझो । बूढ़ा छोटी-छोटी बातों के लिए अपनी घरनी से पूछता नहीं था। सलाह-मशवरा नहीं करता था । लेकिन आज बेटी का मामला था । कल को कुछ हो जाए तो सभी उसे ही कोसेंगे । बेशक मन ही मन । लोगों के साथ अपने दिल की भड़ास निकालेंगे । लेकिन उस के सामने कुछ नहीं कहेंगे । यह बुड्ढ़े को मालूम था । फिर भी उस ने घर आए मेहमानों से लड़के के बारे जानकारी लेनी शुरू कर दी । - आप का लड़का क्या करता है ? कितना पढ़ा है ?

- पढ़ा तो ज़्यादा नहीं है जी । पर चम्बा में दुकान चलाता है । दुकान अपनी ही है । अच्छी आमदनी हो जाती है ।

- लड़के की उम्र क्या है ?

- यही कोई चोबीस ...पच्चीस के लगभग का होगा ।

- आप के कितने बेटे हैं ? बंतो का बाप संतुष्ट नहीं था ।

- चार लड़के हैं जी । सब से बड़ा लड़का नौकरी करता है । उस की शादी हो गई थी । लेकिन उस की घरवाली उसे छोड़ गई है ।

छोड़ गई ! लेकिन क्यों छोड़ गई ? क्या उस के बच्चे भी हैं ?

- हाँ जी ...तीन लड़कियाँ हैं । उन को भी वह अपने साथ ही ले गई है ।

- बाक़ी दोनों लड़के क्या करते हैं ?

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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