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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। नवगीत ।।

 

 

यह घर अपरिचित-सा हुआ

 

जाने कहाँ गायब हुई

घर से घरेलु-सी महक ।

 

तू थी यहाँ तो गंध थी, तू क्या गई, ख़ुशबु गई,

घर के उजाले पाख में मुझको अमावस छू गई,

सुनसान आँगन टोहता

ख़ामोश चिड़ियों की चहक ।

 

तू थी अभी, तू अब नहीं, कैसे भरोसा हो भला,

तेरी उपस्थिति है अभी, चाहे हुआ हो फ़ैसला,

तू है नहीं, यह है पता

मन ही गया शायद बहक ।

 

उन्माद बेचैनी, कसक, एकांत विह्वलता, तृषा,

चिंता, विकलता, स्वप्नछल, उद्विग्नता मृगजल, मृषा,

इस सर्द चुप्पी में घुली

चुपचाप भीतर की दहक ।

 

तू क्या गई मैके कि, यह मन बेवजह कातर हुआ,

किस खिन्नता ने यों मुझे भीतर छुआ, बाहर छुआ,

यह घर अपरिचित-सा हुआ

घर में बना मैं आव्रजक ।

    योगेन्द्र दत्त शर्मा

कवि कुटीर, के.बी.-47, कवि नगर

गाज़ियाबाद, उ.प्र. - 201002

 ◙◙◙

 

माह के छंदकार

योगेन्द्र दत्त शर्मा

-  आहत सब दृश्य हुए

- मंगल-घट फूट गया

- सहमी हुई मन की नदी

- यह घर अपरिचित-सा हुआ

- अपनी यही यात्रा-कथा

ग़ज़ल

ज़हीर कुरैशी

रमेशचन्द शर्मा 'चन्द्र'

विजय किशोर मानव

विनीता गुप्ता

श्याम सखा 'श्याम'

नवगीत

अनिरूद्द नीरव

मुक्तक

देवमणि पांडेय

प्रवासी क़लम

कमल किशोर सिन्ह

 अजय गाथा

उमरिया कैसे बीते राम

 

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