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यह घर अपरिचित-सा हुआ
जाने कहाँ
गायब हुई
घर से घरेलु-सी महक ।
तू थी यहाँ तो गंध थी, तू क्या गई, ख़ुशबु गई,
घर के उजाले पाख में मुझको अमावस छू गई,
सुनसान आँगन टोहता
ख़ामोश चिड़ियों की चहक ।
तू थी अभी, तू अब नहीं, कैसे भरोसा हो भला,
तेरी उपस्थिति है अभी, चाहे हुआ हो फ़ैसला,
तू है नहीं, यह है पता
मन ही गया शायद बहक ।
उन्माद बेचैनी, कसक, एकांत विह्वलता, तृषा,
चिंता, विकलता, स्वप्नछल, उद्विग्नता मृगजल, मृषा,
इस सर्द चुप्पी में घुली
चुपचाप भीतर की दहक ।
तू क्या गई मैके कि, यह मन बेवजह कातर हुआ,
किस खिन्नता ने यों मुझे भीतर छुआ, बाहर छुआ,
यह घर अपरिचित-सा हुआ
घर में बना मैं आव्रजक ।
योगेन्द्र दत्त शर्मा
कवि कुटीर,
के.बी.-47, कवि नगर
गाज़ियाबाद,
उ.प्र. - 201002
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