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आहत सब
दृश्य हुए
टूटे रथ, अश्व थके,
छूट गई वल्गाएँ ।
धूँध के सिवानों को लौट गई
पगडंडी,
शेष रही एक थकन, एक यातना
ठंडी,
एक जलन, एक चुभन
छोड़ गईं यात्राएँ ।
मंगल-ध्वनि, शंखनाद, तोरण,
बंदनवारें,
ज्योति-कलश, रक्त-तिलक,
सिंदूरी मनुहारें,
आहत सब दृश्य हुए
टूट गिरीं उल्काएँ ।
बीते संदर्भ सभी, अलगोजा,
इकतारा,
ओझल वे राम-धुनें, चंदन-तन
गलियारा,
पारे में बदल गई
इस्पाती आस्थाएँ ।
योगेन्द्र दत्त शर्मा
कवि कुटीर,
के.बी.-47, कवि नगर
गाज़ियाबाद,
उ.प्र. - 201002
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