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देह पीली
हो गई
गाँव की वह आम्रणीं
कितनी रसीली हो गई
जो गया उसके लिए, डाली लचीली हो गई ।
साँवला तन मन गुलाबी, जामुनों की क्या कहें
जब कुँआरी कदलियों की
देह पीली हो गई ।
कटहलों की गंध की मदिरा पिये आई हवा
मानिनी सौंगंध की
हर गाँठ ढीली हो गई ।
मेढ़ पर हमने फ़सल के साथ बोया था मिलन
हम हरे ही रह गए
बाली कटीली हो गई ।
नींद का बनवास माँगे, दर्द का राज्याभिषेक
कैकेयी-सी यामिनी
कितनी हठीली हो गई ।
स्वप्न खटमिठिया संजोए ऐंठ इमली की लिए
वह नई छवि छरहरी
कितनी छबीली हो गई ।
फूल में उफ़ना निमंत्रण, भृँग में उफ़नी तृषा
शूल में उफ़नी चुभन
फिर आँख गीली हो गई ।
अनिरूद्ध नीरव
शिल्पायन, सदर
रोड़, अंबिकापुर
सरगुजा,
छत्तीसगढ़ - 01
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