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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। नवगीत ।।

 

 

देह पीली हो गई

 

गाँव की वह आम्रणीं कितनी रसीली हो गई

जो गया उसके लिए, डाली लचीली हो गई ।

 

साँवला तन मन गुलाबी, जामुनों की क्या कहें

जब कुँआरी कदलियों की

देह पीली हो गई ।

 

कटहलों की गंध की मदिरा पिये आई हवा

मानिनी सौंगंध की

हर गाँठ ढीली हो गई ।

 

मेढ़ पर हमने फ़सल के साथ बोया था मिलन

हम हरे ही रह गए

बाली कटीली हो गई ।

 

नींद का बनवास माँगे, दर्द का राज्याभिषेक

कैकेयी-सी यामिनी

कितनी हठीली हो गई ।

 

स्वप्न खटमिठिया संजोए ऐंठ इमली की लिए

वह नई छवि छरहरी

कितनी छबीली हो गई ।

 

फूल में उफ़ना निमंत्रण, भृँग में उफ़नी तृषा

शूल में उफ़नी चुभन

फिर आँख गीली हो गई ।

    अनिरूद्ध नीरव

शिल्पायन, सदर रोड़, अंबिकापुर

सरगुजा, छत्तीसगढ़ - 01

 ◙◙◙

 

माह के छंदकार

योगेन्द्र दत्त शर्मा

-  आहत सब दृश्य हुए

- मंगल-घट फूट गया

- सहमी हुई मन की नदी

- यह घर अपरिचित-सा हुआ

- अपनी यही यात्रा-कथा

ग़ज़ल

ज़हीर कुरैशी

रमेशचन्द शर्मा 'चन्द्र'

विजय किशोर मानव

विनीता गुप्ता

श्याम सखा 'श्याम'

नवगीत

अनिरूद्द नीरव

मुक्तक

देवमणि पांडेय

प्रवासी क़लम

कमल किशोर सिन्ह

 अजय गाथा

उमरिया कैसे बीते राम

 

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