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उमरिया कैसे बीते राम!
भ़ूख,
पीठ पर चाबुक मारे,
तृष्णा कसे
लगाम,
उमरिया कैसे
बीते राम!
तपता सूरज
धौंस दिखाये,
डाँट
गई पुरवैया।
दिन भर तोड़ा
हाड़,
मज़ूरी,
पाया बीस
रूपैया।
ख़ून-पसीने से
महँगे हैं,
नून-तेल के दाम।
उमरिया कैसे
बीते राम!
तन पर चिथड़े
खुली हथेली,
पैरों
फटी
बिवाई।
चले संगिनी
जैसी काले-
क़िस्मत
की परछाई।
जाने किन कर्मों
के फल के,
भोग रहे परिणाम।
उमरिया कैसे
बीते राम!
टूटे सपने,
बिखरे जीवन
के संकल्प
अधूरे।
महा-सनीचर
तिरछी आँखों
से
जीवन को घूरे।
ख़ुशियों के आगे
संबोधन,
पीछे पूर्ण
विराम।
उमरिया कैसे
बीते राम!
लेकर सबको साथ
समय के,
रथ का पहिया
दौड़े।
जिसका हो
गंतव्य,
उसे वह
उस मंजिल तक
छोड़े।
बीच राह में थका
सारथी,
रथ का चक्का-जाम।
उमरिया कैसे
बीते राम!
पत्थर तोड़े और
पसीने
का जो अर्ध्य
चढ़ाये।
वक्त कहाँ
जो
मूरत पूजे,
मंदिर-मठ को
जाये।
रोटी उसकी
काबा-काशी,
रोटी तीरथ-धाम।
उमरिया कैसे
बीते राम!
अजय पाठक
बिलासपुर,
छत्तीसगढ़
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