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उनके ही
अख़बार
कुनबों के दरबार हमारी बस्ती
में ।
उनके ही अख़बार हमारी बस्ती
में ।
आज राजधानी जाने की ज़ल्दी
में,
मिलता हर फ़नकार हमारी बस्ती
में ।
पक्की फ़र्श दुधमुँहों के
घुटने छीले,
कच्ची है दीवार हमारी बस्ती
में ।
मुस्कुराहटें सेंसर हों तो
क्या चीखें,
पड़े चोट पर मार हमारी बस्ती
में ।
सुने हवा की या आँखों की
फ़िक्र करें,
तिनके हैं लाचार, हमारी बस्ती
में ।
घास-फूस के घर, अलाव दरवाज़े
पर,
आँधी के आसार हमारी बस्ती में
।
विजय
किशोर मानव
एसोशियेट
एड़ीटर, दैनिक हिंदुस्तान
नई दिल्ली
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