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आँख होती
है छत में
आज के मुक्त-बाज़ार में ।
जुट गए लोग व्यापार में ।
सोचना होगा हर कोण से,
जो भी जाएगा विस्तार में ।
झुक रही है भवन की क़मर,
खोट है कुछ तो आधार में ।
कल थी जिनकी पुलिस को तलाश,
आह हैं वे ही सरकार में ।
होगी शामिल मिसाइल कोई,
दूर से दूर तक मार में ।
आँख होती है छत मे कहीं,
कान होते हैं दीवार में ।
बूढ़े सागर से मिल कर नदी,
घिर गी ख़ुद-ब-ख़ुद ज्वार में
।
ज़हीर कुरैशी
समीर काटेज,
बी 21, सूर्य नगर
शब्द प्रताप
आश्रम के पास, ग्वालियर, म.प्र. - 474012
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