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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-26, जुलाई, 2008

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

दो गीत

बेचैन मन तू मेघ बन

 

भटको भिखारी सा भूखा,

प्रदेश में प्यासा तरसो,

बेचैन मन तू मेघ बन,

हर जगह बेरोक बरसो।

 

अंतःस्तल बनालो आर्द्र शीतल,

तपते लोगों के ताप हर लो

जलधि-घन वितरित करो,

जो रिक्त उनको पूर्ण कर दो,

मृतप्राय मुरझाये हुओं को

हो सके तो हरित कर दो।

 

कर दो प्रवाहित प्रेम-जल,

हर जगह तुम चहक भर दो।

हो मगन कर गगन गुंजित,

तुम धरा धन-धान्य कर दो।

बेचैन मन तू मेघ बन,

हर जगह बेरोक बरसो।

अपनी व्यथा

 

अपनी व्यथा मुझको पता,

जग से छिपाता फिर रहा हूँ,

स्वयं घायल दूसरों को,

मलहम लगाता फिर रहा हूँ

 

घर में अंधेरा किन्तु बाहर,

दीपक जलाता फिर रहा हूँ,

है अश्रु आँखों में मगर,

मैं मुस्कराता फिर रहा हूँ।

 

चरमराते जोड़ पर,

व्यायाम करता फिर रहा हूँ,

कर रहा परहेज प्रतिदिन,

प्राणायाम करता फिर रहा हूँ।

 

है स्वेत केश कपाल पर जो

श्यामल बनाता फिर रहा हूँ,

जीर्णता मुख का  छिपाता,

यौवन जगाता फिर रहा हूँ।

 

कुछ आयुवर्द्धक औषधि भी,

आजमाता फिर रहा हूँ।

आपनी व्यथा मुझको पता,

जग से छिपाता फ़िर रहा हूँ।

    कमल किशोर सिन्ह

रिवर्हेड, न्युयार्क, यू.एस.ए

 ◙◙◙

 

माह के छंदकार

योगेन्द्र दत्त शर्मा

-  आहत सब दृश्य हुए

- मंगल-घट फूट गया

- सहमी हुई मन की नदी

- यह घर अपरिचित-सा हुआ

- अपनी यही यात्रा-कथा

ग़ज़ल

ज़हीर कुरैशी

रमेशचन्द शर्मा 'चन्द्र'

विजय किशोर मानव

विनीता गुप्ता

श्याम सखा 'श्याम'

नवगीत

अनिरूद्द नीरव

मुक्तक

देवमणि पांडेय

प्रवासी क़लम

कमल किशोर सिन्ह

 अजय गाथा

उमरिया कैसे बीते राम

 

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