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पंजाबी
उपन्यास(धारावाहिक-8)
रेत
हरजीत अटवाल
अनुवादः सुभाष नीरव
(आपने अब तक पढ़ा -
भाग
एक
/
भाग दो
/
तीन
/
चार/पाँच/छः/सात) आगे पढ़िए-संपादक
‘इंदर
सिंह,
यह रहा तेरा घर।’
घर की चाबी मिलने पर मैंने स्वयं से कहा था। गाँव में दो मरले
के घर को कभी भी घर कहने को दिल नहीं करता था। कई बार एक ही
कमरे में सारा टब्बर सोता। बापू जी की उम्रभर की सूबेदारी भी
घर का बहुत कुछ नहीं संवार सकी थी। छोटे-से उस घर में अपने अलग
कमरे का कभी सपना भी नहीं आया था। यह तो शुक्र था कि मैं और
प्रितपाल भाई भी थे और दोस्त भी। रात में इकट्ठे सो जाते। कभी
लड़ते नहीं थे। एक दूसरे की मदद करते थे और हमारा समय अच्छा
गुजर रहा था। इंग्लैंड आकर इतनी जल्दी घर खरीद सकने के बारे
में सोचा तक नहीं था।
मैंने चाबी एजेंट से ली और सीधा
‘रोज़बरी
गार्डन’
आ गया। यह पूरा रोड ही ऊँची जगह पर था। दो मिनट चलकर आर्च-वे
स्टेशन और साथ ही बस-स्टॉप भी। शॉपिंग सेंटर भी नज़दीक ही था।
मतलब यह कि सभी सुविधाओं के बीच में था यह घर। जब एजेंट मुझे
यह घर दिखाने लाया था तो इसकी बड़ी तारीफ कर रहा था। एक कमरे
की खिड़की खोलकर उसने कहा था,
“मि.
ढिल्लन,
नजारा देख।”
मैं हैरान रह गया था। खिड़की में से दूर तक फैला लंदन दिखाई दे
रहा था। ऊँची-ची इमारतें बहुत खूबसूरत लग रही थ। एजेंट कहने
लगा,
“ची
जगह पर घर है और इसी दृश्य के कारण ही इसकी बीस हजार पौंड कीमत
अधिक होनी चाहिए,
पर मैंने तेरा लिहाज किया है। तू शरीफ बन्दा है। दूसरी बात यह
कि इस मकान के मालिक ने अमेरिका जाकर बसना है,
इसलिए जल्दी बेचना चाहता है। फिर,
मकानों की कीमतों में आये ठहराव के कारण हमारा काम भी ठंडा
पड़ा हुआ है। इसीलिए तुझे यह घर बहुत सस्ता मिल रहा है।”
मुझे एजेंट की बातें सच लगी थी,
पर मैंने मज़ाक में कहा था,
“मि.
स्मिथ,
लंदन का मौसम साफ होगा,
तभी तो इस दृश्य का लुफ़्त उठाया जा सकेगा न।”
वह मेरी बात को समझकर हँसा था। मैं सोच रहा था कि मुफ़्त में एक
और खुशी थी यह भी मिली।
कंवल ने इस घर को बाहर से ही देखा था। अन्दर से देखने की उसने
ज़रूरत नईं समझी। डैडी-मम्मी से मैंने कहा भी कि चलो घर दिखा
लाऊँ,
पर उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दी। डैडी तो चाहते ही नहीं थे
कि मैं इतनी दूर घर लूँ। फिर,
मैंने उनकी कोई सलाह भी नहीं ली थी। मैं घर उनसे दूर लेना
चाहता था ताकि उनकी मेरी ज़िन्दगी में दख़लअंदाजी कम हो जाये।
बहुत सारा सामान वह गोरा घर में ही छोड़ गया था। सामान बढ़िया
था। कुछ सामान मैंने पैसे देकर उससे खरीद भी लिया। कुछ नया ले
लिया। कुछ मम्मी के घर में जो हमारा अपना था,
उसे उठा लाये और घर रहने लायक हो गया। घर को पूरी तरह तैयार
करके मैंने कंवल को उसके काम पर से लिया और नये घर में ले आया।
घर के सामने खड़ा करके उसे चाबी थमायी और कहा,
“ये
सारी चाबियाँ घर की मालकिन के लिए।”
चाबियाँ लेकर उसने दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते समय बहुत प्यार
से मेरी ओर देखती रही। फिर बोली,
“अब?”
“अब
अन्दर चलकर अपना घर सम्भाल।”
“रवि,
पश्चिम में तो तू आ बसा है,
पर अभी भी तू पूरी तरह यहाँ के रस्म-रिवाज का नहीं जान पाया।”
“कौन
से रस्म-रिवाज?”
“यहाँ
की ट्रेडिशन है कि जब कोई कपल नया घर खरीदता है तो हसबैंड अपनी
वाइफ को उठाकर पूरा घर दिखाता है।”
मैंने उसे बांहों में उठाया और सारे घर का चक्कर लगा दिया।
पहले पूरा घर नीचे से दिखाया। दोनों कमरे,
रसोई,
गार्डन आदि और फिर ऊपर बैडरूम में ले गया। खिड़की से दिखते
दृश्य को देखकर वह बहुत खुश हुई। तीनों बैडरूम दिखाकर मैंने
उसे उसके बैड पर बैठा दिया। मेरी सांस फूल गयी थी। मैंने कहा,
“मैंने
पति वाली रस्म पूरी कर दी,
तू अब पत्नी वाली पूरी कर।”
वह मुस्कराती हुई मुझसे लिपट गयी।
000
घर,
मेरी खुशियों की कतार में एक और जुड़ी खुशी की तरह था,
जो कि मुझे बग़ैर मेहनत के मिल गयी थी। मैंने कभी नहीं सोचा था
कि इंग्लैंड में घर लेना इतना आसान होगा कि थोड़ा-सा डिपोजिट
दो और बाकी की किस्तें करवा लो। डिपोजिट देने के लिए भी कंवल
के पास पैसे पड़े थे,
उसमें कुछ और मिलाये और घर हाथ में आ गया। अब किस्तें उतारने
का मसला अलग था। घर की चाबी मिल गयी,
घर के मालिक बन गये। घर हमारे नाम चढ़ गया। मुझे घर की मालिकी
का इतना शौक था कि बाहर बोर्ड लिखकर लगा दिया–‘यहाँ
ढिल्लों रहते हैं।’
बगै़र मेहनत से मिली खुशी से डर लगने लगता था। पर जो खुशी तुम
तक पहुँच ही गयी,
उसका क्या करोगे। मंजूर करनी ही पड़ेगी।
मैं एम.ए. में पढ़ रहा था,
तब लोग बाहर के देशों की तरफ जा रहे थे। लेकिन,
हमारे पास किराया तक भरने की हिम्मत नहीं थी। फिर,
हमारा कोई रिश्तेदार भी बाहर नहीं रहता था,
जो मुझे बुलाता या मेरे बाहर जाने का इंतजाम करता। एक ही राह
दिखती थी कि इन देशों में बस रही लड़की से मेरा रिश्ता हो जाये,
किसी भी तरह हो जाये। अंधी,
कानी,
लंगड़ी या विधवा,
परित्यक्ता कोई भी हो,
बस एकबार चला जाऊँ। यहाँ की गुरबत से छुटकारा मिल जाये। पर
हमारे परिवार की इतनी बड़ी ज़मीन-जायदाद नहीं थी कि बाहर के
रिश्ते आते। फिर भी,
मैं सोचे बग़ैर न रहता। मेरे बापू का एक दोस्त कंवल का रिश्ता
लेकर आया तो विश्वास ही नहीं हुआ। खुशी ही इतनी थी कि
बताने-पूछने का मौका ही नहीं मिला कि लड़की कैसी थी। कंवल की
तस्वीरें आई थीं,
पर मुझे कंवल से अधिक इंग्लैंड दिखाई दे रहा था। इस रिश्ते के
सच पर यकीन तो मैंने यहाँ पहुँचकर ही किया था। यहाँ पहुँचकर
मैंने कंवल को देखा तो एक और खुशी मिल गयी कि वह बहुत खूबसूरत
थी। सूरत में भी,
सीरत में भी।
अब मैं छोटे भाई प्रितपाल और बहन कुलवंत कौर के बारे में सोचने
लगा कि उनका कुछ करुँ। उन्हें भी किसी तरह इधर बुला लूँ। आते
ही मुझे काम मिल गया था और कुछ पैसे भी घर को भेज दिये थे ताकि
घर के हालात कुछ बदल सकें। मैंने प्रितपाल के लिए हाथ-पैर
मारने चाहे। कंवल की बहन नीता अभी बहुत छोटी थी। इनके भी इधर
अधिक रिश्तेदार नहीं थे,
जिनके जवान लड़की होती। अभी कुछ महीने ही बीते थे कि प्रितपाल
को भी साउथाल में रहते किसी परिवार ने पसन्द कर लिया और रिश्ता
तय हो गया। उसके बाद,
शीघ्र ही कुलवंत की भी सगाई हो गयी। उसके ससुराल वाले बर्मिंघम
रहते थे और व्यापारी परिवार था। इन सबको फलीभूत होता देखकर डर
लगने लगता कि कहीं इन सारी खुशियों को कोई बड़ी चोट न लग जाये।
कहते हैं कि खुशियाँ के पीछे-पीछे तकलीफें भी आ रही होती हैं।
घर की खुशी के बाद प्रतिभा आ गयी। मेरी बेटी। यह भी एक बड़ी
खुशी थी। प्रतिभा के आ जाने से कंवल के मम्मी-डैडी सब ही खुश
थे। मम्मी का चेहरा अवश्य कुछ बदला,
पर फिर ठीक हो गया कि पहला बच्चा था,
लड़का फिर भी हो सकता था।
प्रतिभा का जन्म हमारी सोची-समझी योजना के अनुसार हुआ था। एक
दिन कंवल ने कहा,
“क्या
बढ़िया बात हो अगर बेटी का जन्मदिन तेरे या मेरे जन्मदिन वाले
दिन ही हो।”
“जान,
ट्राई कर लेते हैं,
पर अपने हाथ में ज्यादा कुछ नहीं है।”
हमने कोशिश की कि बेटी का जन्म मई माह में हो। सबकुछ सही हुआ,
पर अन्त में आकर एक दिन का फ़र्क़ पड़ गया। एक दिन पूर्व ही कंवल
को प्रसव-पीड़ा शुरू हो गयी। हमने डॉक्टर को अपनी योजना के
बारे में बताया था,
पर एक दिन प्रतीक्षा करना बच्चे के लिए खतरनाक था। उसे उसी दिन
आना था और वह आ गयी। प्रतिभा के जन्म के समय ही डॉक्टर ने बता
दिया था कि कंवल का स्वास्थ्य ठीक नहीं। अगले बच्चे के लिए कुछ
बरस इंतजार करना पड़ेगा।
बेटी का नाम रखने के समय मैं डैडी को कुछ नाराज कर बैठा था। वह
चाहते थे कि मैं गुरुद्वारे में जाकर
‘वाक’
लूँ,
पर मैं जाकर रजिस्टर करवा आया। मेरे द्वारा रखा गया नाम भी
उन्हें पसन्द नहीं था। मम्मी से प्रतिभा नाम का उच्चारण नहीं
होता था। उसने उसे परी कहना शुरू कर दिया था। डैडी के संग मेरी
बहस सहज ही हो जाया करती। मम्मी मुझसे कहती,
“पुत्त,
तू अपने डैडी की इन बातों के पीछे न जाया कर।”
असल में,
डैडी के संग मेरी कम बनती थी। पहले कुछ महीने ठीक निकले थे,
फिर उन्होंने मेरे से बग़ैर बात के बहस करना आरंभ कर दिया। जिन
बातों के विषय में मेरी जानकारी अधिक होती,
उनको लेकर बहसने लगते। जैसे कि किताबों के बारे में ही। मैं
किताबें इंडिया से भी मंगवाता था और यहाँ से भी खरीदता रहता।
हर समय मैं कुछ न कुछ पढ़ता रहता। वह किताबों को पढ़ने के
नफे़-नुकसान मुझे बताने लगते। कई बार तो कह देते,
“इंदर
सिंह,
इतना पढ़ना,
तेरा दिमाग भी खराब कर सकता है।”
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