vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। विचार-वीथी।।

 

 

इलेक्टॉनिक दुनिया में पुस्तकों की नियति


मनोज कुमार श्रीवास्तव

 

ह एक ऐसा दौर है जब बहुत से बंधु और मित्र परदे को पुस्तक का विकल्प बताकर प्रकाशकों और पाठकों के सामने नास्त्रोदॉमसी निराशा का मंज़र पेश करने में मुब्तिला हैं। भिन्न-भिन्न क़िस्म की मृत्यु घोषणाएँ हो रही हैं। परदे के हाथों में किताब की मृत्यु, प्रिंट मीडिया का देहावसान, पाठक की मौत और पठन-पाठन का महाप्रयाण जैसी कितनी ही बातें और शिगूफ़े, कल्पना और केसांड्रा-क्रंदन इस बीच सामने आए हैं।

 

यह परदा दूरदर्शन का छोटा परदा और सिनेमा का बडा परदा नहीं है। इन दोनों परदों से इतनी हानि किताबों के संसार को अवश्य हुई कि उनके पाठक को छवियों और छायाओं की श्वेत-श्याम या रंगीन फंतासी का दर्शक बनने में समय का निवेश करने की सुविधा मिली, लेकिन वह कोई बडा ख़तरा नहीं था, क्योंकि ये परदे बिंब का अंतरण करते थे, पाठ्यवस्तु (टेक्स्ट) का नहीं। कम्प्यूटर का परदा सिर्फ़ इमेज़ का प्रतिप्रेषण नहीं करता है, वह इतिवृत्त को भी संचरित करता है और इस अर्थ में पुस्तक के सामने खडी हुई एक वास्तविक चुनौती का प्रतिनिधित्व करता है। पाठ्यवस्तु के जिस विनिमय पर किताब की विशिष्टता और अद्वितीयता आधारित थी, उसी को आज इलेक्ट्रॉनिक परदे द्वारा विनियोजित किया जा रहा है। दूरदर्शन और सिनेमा के परदे जब पाठ्यवस्तु को छवियों में परिणत करते थे तो वे अपनी तरह का सृजन भी थे। जब वे सफल होते थे तो तमस, भारत एक खोज, गाइड या गोन विद द विंड बनते थे। जब वे असफल होते थे तो राग दरबारी। लेकिन सफलता का प्रतिकल्प भी मूल कृति का मान बढाया करता था और असफलता से भी मूल कृति की असाधारणता के प्रति श्रद्धा-भाव जागृत होता था। यह बात इलेक्ट्रॉनिक परदे के साथ नहीं है। यह तो पुस्तक के टेक्स्ट को पूरा का पूरा जस का तस परोसने की क्षमता रखता है। यह सृजन नहीं है, पुनरुत्पादन है। इसलिए इसके कद्रदां पुस्तक की मृत्यु घोषणा करने के प्रति बडे उत्साही प्रतीत होते हैं। उन्हें लगता है कि आज से तीस-चालीस साल बाद हम मुद्रित पुस्तकों को ऐसे ही देखेंगे जैसे अभी ताँगों और भाप के इंजनों को देखते हैं। उनके पास आँकडे भी हैं।

 

 थामस जैफ़रसन ने कभी जॉन एडम्स को कहा था कि मैं किताबों के बिना ज़िंदा नहीं रह सकता। उसी अमेरिका में अब बहुत से ऐसे लोग हो गए हैं, जो यह कर दिखा रहे हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार जहाँ १९७८ में केवल ८ प्रतिशत ऐसे थे जिन्होंने पिछले एक साल में कोई पुस्तक नहीं पढी थी, वही १९९० तक १६ प्रतिशत अमेरिकी इस अधोगति को प्राप्त हो चुके थे। १९४६ में ३८ प्रतिशत लोग दिन में कोई न कोई पत्रिाका पढते थे, १९५८ में वे घटकर २८ प्रतिशत तक ही रह गए। कल का अखबार पढा कहने वाले लोग १९४६ में ८५ प्रतिशत थे, १९६५ में ७३ प्रतिशत और १९८५ में ५५ प्रतिशत। परदे की दीवानी अमेरिकी युवा पीढी का पतन और भी ज़्यादा घातक है। टाइम्स मिरर के हाल के एक अध्ययन के मुताबिक ३५ साल के कम उम्र के सिर्फ़ ३० प्रतिशत अमेरिकी युवाओं ने पिछले दिन का अखबार पढा था, जबकि १९६५ में उनकी संख्या ६७ प्रतिशत थी। पढ़ने की आदत पर ज्ञान ग्रहण की आधुनिक वैकल्पिक इलेक्ट्रॉनिक प्रविधियों का प्रभाव पड रहा है। यह इसी से स्पष्ट है कि खाडी युद्ध की समाचार पत्रों से जानकारी प्राप्त करने वाले अमेरिकियों की संख्या मात्रा ८.९ प्रतिशत पाई गई थी। १९६५ से १९८५ के दो दशकों में प्रति सप्ताह ४.२ घंटे (पुस्तक, पत्र-पत्रिका) की पाठन अवधि घटकर २.८ घंटे रह गई है।

 

कहाँ एक समय अब्राहम लिंकन को किताबी कीडा कहकर चिढाया जाता था, कहाँ आज उसी के देश में पढ़ने की संस्कृति को देखने की सभ्यता ने ग्रस लिया है और पुस्तक की मृत्यु-घोषणा के उत्साही भविष्यवक्ता उचके पड रहे हैं। शायद उनके उत्साह के पीछे आँकडों के सिवा कुछ वैज्ञानिक आधार भी हो, लेकिन जो मेरा अनुभवगत साक्ष्य है वह इस उत्साह का बहुत समर्थन नहीं करता। जब-जब भी मैंने इस इलेक्ट्रानिक परदे से पढ़ने की कोशिश की है तो उसके बहुत अच्छे परिणाम नहीं निकले हैं, मुझे याद पडता है कि किस तरह मैंने शिवाजी सावंत कीमृत्युंजय या प्रमोद कुमार सान्याल की विरागी भ्रमर या टामस हार्डी की टेस एक बैठक में पढ ली थी, किन्तु नेट पर एक पृष्ठ भी किंचित् असुविधा के बिना मुझसे पढा नहीं जा सका। बहुत ज़िद और आग्रहपूर्वक आयास करने पर भी दो पृष्ठों के बाद मुझे फाइल पर जाकर प्रिंट की कमांड को क्लिक करना पडा और इलेक्ट्रॉनिक को पुस्तक में बदलकर ही मेरा पठन-पाठन संभव हो पाया। इसलिए पाठ्य के फ़ार्मेट में हुआ।

 

ये परिवर्तन यूरोप में चौथी सदी में उस परिवर्तन जैसा नहीं है जब स्क्रोल की जगह कोडेक्स ने ले ली थी और हम पोथियों की जगह पुस्तकों से रूबरू हुए थे। बाद में रिनैसां के दौर में आई गुटेबर्न पिं्रटिंग भी लेखन की भौतिकी में परिवर्तन था, किन्तु उसकी कुछ इंद्रियातीत परिणतियाँ भी थीं। इसने हमें एक नए अभ्यास वर्ग की ज़रूरत का अहसास दिलाया। आदतों का पुनर्शिल्पन हुआ और आदतों का यह नया स्थापत्य किसी इंद्रिय की थकान को कारित नहीं करता था। वह श्रुति और स्मृति की वाचिक दुनिया से हमें अभिलेखन की उस दुनिया में अवश्य ले चला जहाँ केवल साक्षर ही सहृदय हो सकता था और इस प्रक्रिया में स्मृति का पूरा तंत्र ही क्षतिग्रस्त हो गया। यह कहा जा सकता है कि अभिलेखन में जिस स्मृति-भ्रंश को जन्म दिया, वह एक आध्यात्मिक घाव था, जबकि इलेक्ट्रॉनिक परदा सिर्फ़ हमारी कनीनिका को ही घायल करता है और उसके बदले में देता है पाठ्यवस्तु के साथ ध्वनियों और छवियों के निस्सीम और निरवधि विस्तार में हाइपररीडिंग का नौकायन। लेकिन क्या इलेक्ट्रॉनिक परदा अपने तरह की निरक्षरता पैदा नहीं करता।

 

यह निरक्षरता अक्षरों को पढ़ने की असामर्थ्य नहीं है, यह अक्षरों तक पहुँच न पाने की असामर्थ्य है। कम्प्यूटर पढाई की ही नहीं, पहुँच की समस्या पैदा कर रहा है, हो सकता है कुछ सालों बाद या दशकों बाद पहुँच की समस्या ख़त्म हो जाए। प्राविधिकी के प्ररूप जैसे-जैसे ज़्यादा से ज़्यादा प्रचलित होते जाते हैं, उनकी क़ीमत भी कम होती जाती है और वे अधिकाधिक इस्तेमाल में आने लगते हैं। हालाँकि मुझे यह कल्पना असंभव प्रतीत होती है कि टोनर कभी स्याही से सस्ता हो सकता है, लेकिन चलिए प्राविधिकी के चमत्कारों और वरदानों पर कुशंकाएँ न करें। फिर भी यह तो कहा ही जा सकता है कि उनके सामने असली चुनौती क़ीमतों की न होकर कोर्निया की होगी। कैसे उसके रक्षक के लिए कैथोड-किरण ट्यूब पर परदे की चकाचौंध को और परदे पर मुद्रण को प्रियतर बनाया जाए?

 

जैकब्सन ने एक इलेक्ट्रानिक स्याही का अविष्कार किया है। आगे और भी संभावनाओं के आकाश खुल सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक परदा अपने ऑडियो डाटा का भी साथ-साथ उपयोग कर अक्षरों के आगे अनजान लोगों को साहित्यास्वादन का वह मौका उपलब्ध करा सकता है, जो साक्षरता की माँग करने वाली पुस्तकों ने छीन लिया था। ऐसे समय पुस्तक के भविष्य का प्रश्न कैसे निर्धारित होगा, यह एक वैश्विक प्रश्न है। यह प्रश्न ऐसा भी नहीं है कि जो हमें अपनी भारतीयता के आश्वस्त होने की सुविधा दे दे।

 

इलेक्ट्रॉनिक क्रांति भौगोलिक खिडकियों-दरवाजों-प्रचीरों की परवाह नहीं करती, यह तो फैलती जाती है। स्वयं संयुक्त राज्य-अमेरिका में आज से छः साल पहले इंटरनेट का नाम कितनों ने सुना था, आज वह उनकी दिनचर्या का अंग है। लेकिन अभी भी वहाँ पुस्तकों का प्रकाशन दुष्प्रभावित होता नहीं दिख रहा। सन् २००० में एक लाख तैंतीस हजार एक सौ छियानवे नई पुस्तकें छपीं। ४० साल पहले की स्थिति से १६ गुना ज़्यादा। प्रकाशकों की चाँदी अभी है। १९९० में २ बिलियन किताबें बिकीं जो १९८५ की तुलना में ११ प्रतिशत ज़्यादा थीं। बुक स्टोर्स के खुलने की दर और गति फशस्टफूड रेस्तराँ के बाद ठीक दूसरे क्रम का है। इसका एक अन्य प्रमाण उन लोगों की बढती हुई संख्या से लगाया जा सकता है, जो पुस्तक यदि ख़रीद नहीं सकते तो उसे पुस्तकालय से लेकर पढ सकते हैं। अमेरिका में भी यह ध्यान देने योग्य वृद्धि का संकेत है। यदि पब्लिक लाइब्रेरी सर्कुलेशन १९८० में ४.७ यूनिट-पर-कैपिटा था तो १९८९ में यह बढकर ५.१ हो गया।

 

सैंडर्स ने एक समय कम्प्यूटरों को बौद्धिक फ़ासिस्ट कहा था, क्योंकि उनका इस्तेमाल करने से पूर्व हमें प्राधिकारों, नियमों और अनुशासनों के एक अनदेखे पैटर्न के सामने समर्पण करना पडता है। रचनाकार को तो शायद इस युग में भी इन बंदिशों का अहसास उतना सघन और तीव्र रूप से न हो, लेकिन पाठक के सामने तो ये चुनौती आएगी ही। अभी तक उसके सामने कृति का टेक्स्ट ही रहता था, जिसे पढकर आस्वाद और साधारणीकरण की प्रक्रियाओं से वह गुजरता था, लेकिन अब उसे सिस्टम सिन्टेक्स की व्यवस्था की वाक्य रचना को भी समझना पडेगा। मशीन का सदाचार-तंत्र पाठक को अपने तईं एक अलग तरह से विवश करेगा। लेकिन क्या पुराने समय में पोथियों को छूने और खोलने और पढ़ने और रखने का अपना एक प्रोटोकॉल नहीं था? यह अवश्य है कि वह उतना यांत्रिक नहीं था, बल्कि एक हद तक मांत्रिक था। उसका बीज था, कीलक था, देवता था, विनियोग का प्रोटोकाल था।

 

सैंडर्स जिन पूर्व स्थापित और अपरिवर्त्य नियमों की कम्प्यूटर के संबंध में बात करते हैं वे संभवतः पुराने शास्त्रों के वचन में किसी न किसी रूप में रहकर आए। बाद के लौकिक समय में सांस्कृतिक प्राधिकार के ये शिष्टाचार गायब हो गए हैं। पुस्तक-पाठक के प्रत्यक्ष साक्षात्कार के समक्ष किसी भी तरह के अवरोध को हटा दिया गया। यह बडे-बडे पुस्तकालयों और किताब महलों का दौर था। अब इंटरनेट पर एक वैश्विक लाइबरी हो सकेगी। किसी पुस्तक की हजारों लाखों प्रतियों को रेल के वैगनों से भेजने की स्थिति अब ख़त्म हो जाएगी। बारंबार आने वाली संस्करणों की भी संभावनाएं अब पुस्तक की सफलता के लिए अपरिहार्य नहीं रह जाएँगी। अभी ज़रूर हम कम्प्यूटर पर प्रिंट आर्डर के ज़रिए कागज पर छापित किताब निकालते हैं तो हमें ई-पाठन की तथाकथित पर्यावरण मित्रता की प्रति आश्वस्ति नहीं होती, लेकिन भविष्य में जब ई-पाठन ज़्यादा रुचिकर और सहज हो जाएगा तो हो सकता है कि पेपर के मुकाबले हमें चिप्स में पेड़ ज़्यादा सुरक्षित नज़र आएँ।

   मनोज कुमार श्रीवास्तव

आयुक्त, जनसंपर्क

मध्यप्रदेश शासन, भोपाल

 ◙◙◙

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीë